“मेरे पास बस शहद का एक कटोरा है!”

आज नाजिम हिकमत की पुण्‍यतिथि है

♦ प्रकाश के रे

Nazim Hikmet Imageमकालीन इतिहास की एक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि इसमें विचारधारात्मक संकीर्णताएं रचनाकारों और रचनात्मकता को अक्सर निशाना बनाती रही हैं और इस प्रवृत्ति के शिकार न सिर्फ वे रचनाकार होते हैं, जो विचारधारा-विशेष के विरोधी होते हैं, बल्कि वे भी होते हैं जो उस विचारधारा के उत्कृष्ट एवं उद्दात आदर्शों के लिए हर तरह की कठिनाइयां उठाते रहते हैं। बीसवीं सदी के सबसे महत्वपूर्ण कवियों में शुमार नाजिम हिकमत के साथ भी उनके ही साथी कम्युनिस्टों ने कुछ ऐसा ही बर्ताव किया था। जबकि इस महाकवि को साम्यवादी विचारों के समर्थन और तुर्की में जनवादी संघर्षों से जुड़े होने के कारण बरसों जेल रहना पड़ा था, और अंततः देश छोड़ कर निर्वासन वरण करना पड़ा था। नाजिम हिकमत की पुण्यतिथि पर उनके जीवन के उस दौर को याद करना बहुत जरूरी हो जाता है, जब उन्हें कॉमरेडों के दुष्प्रचार से दो-चार होना पड़ा था और उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी से निकाल दिया गया था। ऐसा करना इसलिए जरूरी है कि यह हिस्सा उनकी वैचारिकी के साम्यवादी और उनकी पहचान के राष्ट्रवादी उत्सव की चकाचौंध में कहीं दब-सा गया है। इस प्रकरण को खंगालना इसलिए भी जरूरी है कि राजनीतिक और सांस्कृतिक वर्तमान कहीं अधिक क्रूर संकीर्णताओं की जद में है। शायद हिकमत की बातें बेहतर सृजनात्मक परिदृश्य बनाने में हमारी मदद कर सकती हैं।

नाजिम हिकमत ने मध्यकालीन तुर्की के एक महत्वपूर्ण धार्मिक-राजनीतिक व्यक्तित्व शेख बद्रेदीन पर 1936 में महाकाव्य प्रकाशित किया था। वामपंथियों द्वारा संभावित हमले का अंदेशा करते हुए उन्होंने इस रचना के साथ एक संक्षिप्त आलेख भी लिखा था, जिसमें उन्होंने आलोचकों का जवाब देने की कोशिश की थी। हिकमत का यह अंदेशा बेवजह नहीं था। तुर्की की कम्युनिस्ट पार्टी के कई प्रभावशाली सदस्य लगातार उनकी आलोचना कर रहे थे और उनकी कई रचनाओं को साम्यवाद-विरोधी मान रहे थे। उल्लेखनीय है कि उन्हीं रचनाओं के कारण बाद में हिकमत को ‘रूमानी क्रांतिकारी’ की संज्ञा दी गयी। इस रचना के प्रकाशन से पूर्व ही उन्हें ‘स्टालिन-विरोधी’ होने का आरोप लगाकर पार्टी से निकाल दिया गया था। हिकमत और उनके साथियों द्वारा बनाये गए अन्य संगठन को सोवियत रूस की पार्टी ने मान्यता देने से मना कर दिया था। बहरहाल, तुर्की पार्टी जल्दी ही भयानक सरकारी दमन के कारण जल्दी ही खत्म हो गयी। इसके बाद बरसों तक किसी पार्टी से बिना संबद्ध रहे हिकमत राजनीतिक और रचनात्मक रूप से सक्रिय बने रहे।

शेख बद्रेदीन पर केंद्रित महाकाव्य के साथ अपनी टिप्पणी में नाजिम हिकमत ने लिखा था: ‘इन पंक्तियों को लिखते हुए खुद को वामपंथी कहनेवाले उन युवाओं को कुछ ऐसा कहते हुए देख सकता हूं…

“देखो, वो मस्तिष्क और हृदय को अलग-अलग कर रहा है, कह रहा है कि उसका मस्तिष्क तो ऐतिहासिक, सामाजिक और आर्थिक तथ्यों को तो स्वीकार कर रहा है, पर हृदय दर्द से पीड़ित है। इस मार्क्सवादी को तो देखो… मैं उन्हें वैसे ही देख रहा हूं, जैसे मैं इतिहास-लेखन के विशेषज्ञ को देख पा रहा हूं, जो मेरे लेखन के शुरुआत को पढ़ कर हंस रहा है।

और मैं यह जो स्पष्टीकरण दे रहा हूं, वह उनके लिए नहीं है, बल्कि उनके लिए है जो मार्क्सवाद से अभी परिचित हुए हैं और उनमें वैसा वामपंथी दंभ नहीं है।

क्या एक चिकित्सक यक्ष्मा के कारण मृत अपने बच्चे की मृत्यु पर शोक इसलिए नहीं करेगा क्योंकि उसे पहले से ही पता था कि बच्चे की मृत्यु निश्चित है? क्या मार्क्स पेरिस कम्यून के मृतकों के लिए दुखी नहीं हुए थे – खुद में उन्हें ‘दर्द के गीत’ की तरह महसूस करते हुए – इसके बावजूद कि उन्हें पता था कि कम्यून को नष्ट कर दिया जाएगा? और, क्या ‘कम्यून नहीं रहा, कम्यून जिंदाबाद’ के नारे लगाते लोग दुखी नहीं थे?

एक मार्क्सवादी मशीन या यंत्र-मानव नहीं, बल्कि हाड़-मांस, स्नायु, मस्तिष्क और हृदय से बना एक ऐतिहासिक, सामाजिक, और ठोस मनुष्य होता है।”

हिकमत की मित्रता सादुल्लाह, स्वत दरविश, महमूद येसारी, नजफ, सबीहा जैसे लेखकों-पत्रकारों से थी, जो बिना किसी पार्टी के सदस्य होते हुए भी फासीवाद और नस्लभेद के विरुद्ध सक्रिय थे और अपने को राष्ट्रवादी कहते थे। मौके की तलाश में लगे विरोधी कॉमरेडों ने उनके इन संबंधों का बहाना बनाकर वामपंथी पत्रों में नाजिम हिकमत के खिलाफ लेख लिखे, जिसमें उन्हें ‘राष्ट्रवादी’, ‘बुर्जुआ’ आदि कहा जाता था।

हिकमत ने अपनी टिप्पणी में ‘छलिया वामपंथी’, ‘वामपंथी दंभ’ जैसे शब्दों का प्रयोग कर अपने क्षोभ को स्पष्ट कर दिया है। उन्होंने यह भी कह दिया है कि ऐसे तत्वों के साथ संवाद संभव नहीं है। नाजिम हिकमत उन वामपंथी-जनवादी लोगों से मुखातिब हैं जो ऐसे अमानवीय दर्प से अछूते हैं। एक कविता में वे कहते हैं:

मेरे पास चांदी की लगाम वाला घोड़ा नहीं है
पुरखों की छोड़ी हुई कोई संपत्ति नहीं जिसपर बसर कर सकूं,
न धन, न कोई जायदाद –
मेरे पास बस शहद का एक कटोरा है
शहद का एक कटोरा
आग की तरह लाल!

(प्रकाश कुमार रे। सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता के साथ ही पत्रकारिता और फिल्म निर्माण में सक्रिय। दूरदर्शन, यूएनआई और इंडिया टीवी में काम किया। फिल्म शोधार्थी भी। फिलहाल वे वी शांताराम पर शोध में लगे हैं और बीआर चोपड़ा पर केंद्रित उनकी पुस्तक जल्‍दी ही प्रकाशित होने वाली है। उनसे pkray11@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)

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