तब मेरी कलम युवा थी और उन्‍होंने उसे हड़प ली!

♦ अविनाश

यह संस्‍मरण (आपबीती) कल जनसत्ता में छपा। दिनभर फेसबुक पर इसको लेकर आरोप-प्रत्‍यारोप, पंथ और इस्‍तेमाल-मोहरा जैसी गतिविधियां छायी रहीं। मेरे हिस्‍से का जो सच है, मैंने उसे ही लिखा। कोई विश्‍वास करे न करे, मुझे खुद पर पूरा विश्‍वास है, लिहाजा मैं उसे यहां भी शेयर कर रहा हूं: अविनाश

न सत्तानबे की गर्मियों में एक दिन गांधी शांति प्रतिष्‍ठान में अनुपम (मिश्र) जी ने मुझसे कहा कि असल अखबारनवीसी दिल्‍ली में रह कर नहीं होगी। उन्‍होंने मुझे राजस्‍थान के अलवर जिले की थानागाजी तहसील के एक गांव भीकमपुरा भेज दिया। इस गांव का नाम पास के ही एक और गांव के नाम के साथ उस इलाके में ज्‍यादा परिचित है, भीकमपुरा-किशोरी। जिन सज्‍जन के साथ दोपहर को दिल्‍ली से चल कर रात को हम भीकमपुरा पहुंचे, वे राजेंद्र सिंह थे। तरुण भारत संघ के संस्‍थापक और पानी आंदोलन के शीर्ष व्‍यक्तित्‍व।

वहां पहुंच कर हमने दाल-रोटी खायी और सो गये। जो कमरा मुझे सोने को दिया गया, वह अगले लगभग एक साल तक “मेरा कमरा” होकर बना रहा।

सुबह पांच बजे ही किसी ने दरवाजा खटखटा कर जगा दिया। फिर हम जिस खुले-से हॉल में पहुंचे, वहां पंद्रह-बीस साथी और थे। वह रसोई थी और एक बड़े से डोंगे में चाय उबल रही थी। कहा गया कि चाय पीने के बाद श्रमदान करना है।

हम तो अपनी कलम के भरोसे यहां आये थे, लेकिन खेतों से मिट्टी और पत्‍थर निकालने के काम से हर दिन की शुरुआत करनी थी। मेरे लिए कठिन था, लेकिन रचना-बसना था, सो थोड़े ही दिनों में खुद को ऐसी ही सुबह के काबिल बना लिया। कभी सोये रह गये, तो राजेंद्र सिंह खुद चादर खींचने आ जाते थे। मशहूर छायाकार रजनीकांत यादव ने, जिन्‍होंने अमृतलाल वेगड़ की चित्रकारी के साथ नर्मदा पर अपने छायाचित्रों की जुगलबंदी की थी, उस वक्‍त की मेरी कुछ तस्‍वीरें उतारीं। उन तस्‍वीरों को कभी-कभार देखता हूं, जिसमें मैं श्रमिक लगता हूं; भीकमपुरा में मैंने बाल संवारना छोड़ दिया था, दाढ़ी बनानी भी छोड़ दी थी।

इंदिरा गांधी की हत्‍या जिस दशक में हुई थी और मंडल कमीशन का ऐतिहासिक रेकॅमंडेशन जिस दशक में आया था, उसी दशक के आखिर में राजेंद्र सिंह अपने कुछ दोस्‍तों के साथ इस इलाके में आये थे। भीकमपुरा के पास ही गोपालपुरा गांव में रात गुजारी थी। उन दिनों अरावली पर्वत शृंखला के सैकड़ों गांव पानी के भीषण संकट से त्राहि-त्राहि कर रहे थे। सरकारी फाइलों में ये इलाका डार्कजोन था, जहां कुंआ खोदने की मनाही थी। ऐसा करने पर लोगों को कानूनी कार्रवाइयों से गुजरना पड़ता था।

गोपालपुरा भी ऐसे ही गांवों में से एक था। राजेंद्र सिंह रुक गये और गांव वालों की मदद से गोपालपुरा में चांद की शक्‍ल का एक जोहड़ (तालाब) बनाया, ताकि बारिश का पानी रोका जा सके। यह पहला तालाब था। अगले कुछ सालों में गांव-गांव जाकर राजेंद्र सिंह ने पूरे इलाके में सैकड़ों तालाब बना डाले।

मैं जिस साल वहां पहुंचा, उस साल तक पांच हजार तालाब बनाये जा चुके थे और राजेंद्र सिंह को ईश्‍वर की तरह लोग सम्‍मान देने लगे थे। पत्‍थर पर पानी उगाने की उनकी जिद का नतीजा ये हुआ कि अरावली की कई नदियां, जो मुल्‍क की आजादी के बाद प्रकृति से हुए खिलवाड़ के चलते मर गयी थीं, जीवित हो उठीं।

मैंने सोचा, क्‍यों न इन नदियों के पुनर्जीवन की कहानी लिखी जाए। फिर महीनों गांव-गांव जाकर नदियों के कैचमेंट एरिया में पसरे दुख और संघर्ष के दस्‍तावेज इकट्ठे किये और पांच हिस्‍सों में सात नदियों के मरने और जीने का वृत्तांत लिखा। आठवीं नदी “बूजगंगा” पर एक रपट अनुपम जी ने ‘गांधी मार्ग’ में छापी थी और मनीऑर्डर के जरिये मुझे पांच सौ रुपये भेजे थे।

राजेंद्र सिंह के सामने जब मैंने अपनी पांच पांडुलिपियां रखीं, तो बहुत खुश हुए और उन्‍होंने कहा कि हम इन्हें छापेंगे। थोड़े ही दिनों बाद एक बुजुर्गवार से उन्‍होंने मिलवाया, जो जयपुर की मानसरोवर कॉलोनी से आए थे। राजेंद्र सिंह ने कहा कि ये मोहन श्रोत्रिय हैं, प्रोफेसर हैं और डाक्‍युमेंटेशन में इनका नाम है। तब तक मैं नहीं जानता था कि वे लेखक भी हैं। खुद उन्‍होंने बताया कि वे एक जमाने में अलवर से “क्‍यों” नाम की एक पत्रिका निकालते थे। यह भी कि वे वामपंथी हैं। उनसे मिल कर मैं खुश हुआ और जल्‍दी ही हम काफी घुलमिल गये।

एक दिन अचानक राजेंद्र सिंह ने मुझे अपने कमरे में बुलवाया। मैं गया तो मोहन श्रोत्रिय भी वहां बैठे थे। राजेंद्र सिंह ने मुझे कहा कि तुमने जो लिखा, वह हम छाप रहे हैं, लेकिन इन सभी किताबों पर नाम इनका (मोहन श्रोत्रिय का) छपेगा। मोहन श्रोत्रिय के सामने ही यह कहा गया था, जाहिर उनकी इसमें सहमति थी। मैं सन्न रह गया। ऐसा लगा जैसे मेरे कानों ने सिर्फ सन्नाटा सुना। यों भी सुनने, न सुनने से कोई फर्क नहीं पड़ता, क्‍योंकि मुझे पता था कि राजेंद्र सिंह अपने इरादों में अटल रहते हैं। मैं बिना कुछ कहे, बगैर कोई प्रतिवाद किए चुपचाप बाहर आ गया। लाचारी के दिन भी बहुत अजीब होते हैं।

मैं कमरे में लौट कर लेट गया। बुखार-सा चढ़ आया था। उसी रात उम्‍मीद का एक अंतर्देशीय मैंने अनुपम जी को लिखा। वे तब तरुण भारत संघ के अध्यक्ष थे, हालांकि बाद में अलग हो गए थे। अगले हफ्ते उनका जवाब आ गया। अनुपम जी ने लिखा था, उन नदियों का जीवन जिन्‍होंने फिर से रचा, वे सब तुम्‍हारी पांडुलिपियों के लेखक हैं। जब किताबें छपें, तो उनमें गोपाल जी से लेकर दृकपाल तक, उन सभी लोगों के नाम लेखक के रूप में छपें, जिन्‍होंने तालाब बनाये और नदियां उगायीं।

मुझे लगा कि एक ऐसे आदमी को, जिसका उन नदियों के जीवन और कथा-लेखन में कोई योगदान नहीं है, श्रेय देने के बजाय अनुपम जी का सुझाया विकल्प मौलिक और मानवीय है। मैंने राजेंद्र सिंह के सामने अनुपमजी का विचार रख दिया। वे तब तो कुछ नहीं बोले, लेकिन जब किताबें छप कर आयीं, तो उन किताबों पर एक लेखक की जगह दो नाम प्रकाशित थे: मोहन श्रोत्रिय और अविनाश। किताबों के नाम थे – “फिर से बहने लगी रूपारेल”, “सम्‍मान का पानी लाने वाली भगाणी-तिलदेह”, “जी उठी जहाजवाली”, “सरस गयी सरसा” और “अरवरी के पुनर्जन्‍म की कहानी”।

इन किताबों का जिक्र उन्‍हीं दिनों ‘कथादेश’ पत्रिका में “मैं और मेरा समय” लिखते हुए वरिष्‍ठ कथाकार स्‍वयं प्रकाश ने भी किया था। मोहन श्रोत्रिय को इस तरह साहित्यिक पत्रिका में भी प्रतिष्ठा मिली, जबकि उन्होंने पांचों किताबों का एक शब्द नहीं लिखा था।

किताबों की चर्चा होने से मेरा सदमा थोड़ा कम हुआ, लेकिन टीस रह गयी। एक दिन जब ‘प्रभात खबर’ से हरिवंशजी का पत्र आया कि इधर आ जाओ, तब मैंने भीकमपुरा छोड़ दिया। हालांकि उसके बाद भी मैं भीकमपुरा गया, जब राजेंद्र सिंह को ‘द वीक’ ने “मैन ऑफ द इयर” चुना। मैगसेसे अवार्ड के वक्‍त भी उनसे मेरी बात हुई। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में भी हम मिले। एक बार देवघर में हमारी मुलाकात हुई और एक बार दिल्‍ली में भी। उनके प्रति सम्‍मान में कभी असावधानी नहीं बरती, लेकिन मोहन श्रोत्रिय को माफ करना मैंने कभी मुनासिब नहीं समझा।

उस अनुभव की तल्‍खी मेरे भीकमपुरा के प्रवास की स्‍थायी निशानी है। और एक कैमरा और एक टेपरिकॉर्डर भी, जो मेरे काम के सिलसिले में मुझे दिया गया था।

यह बात भी वक्‍त-बेवक्‍त याद आती रही कि मोहन श्रोत्रिय ने पहली मुलाकात में अपने आप को गर्व से वामपंथी कहा था। कोई वामपंथी कैसे किसी युवा कलम की कमाई हड़प सकता है? साझे में सही, दूसरे की मेहनत और दूसरे के काम को इस तरह अपने नाम कर लेने की हरकत मेरे लिए नया अनुभव थी। इन दिनों फेसबुक पर क्रांति, मूल्‍य और नैतिकता की बातें करते मोहन श्रोत्रिय को देखता हूं तो भीकमपुरा के दिन मेरी आंखों के सामने छा जाते हैं।

(अविनाश। मोहल्‍ला लाइव के मॉडरेटर। प्रभात खबर, एनडीटीवी और दैनिक भास्‍कर से जुड़े रहे हैं। राजेंद्र सिंह की संस्‍था तरुण भारत संघ में भी रहे। उनसे avinash@mohallalive.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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