सिनेमा की मनोहर कहानी से अलग है ‘शिप ऑफ थीसियस’

♦ श्‍याम आनंद झा

हिंदुस्तान में फिल्म बनाने के पीछे कई गैर सिनेमाई मकसद काम कर रहे होते हैं। जैसे ब्लैक मनी को व्हाइट करना, हिंदुस्तानी पर्व-त्यौहार का व्‍यावसायिक दोहन करना, विशिष्ट लोगों की अति विशिष्ट संतानों को लाउंच करना, आदि-इत्यादि। उत्तर भारत के कुछ धनपशु तो इसलिए भी फिल्म बनाने मुंबई पहुंच जाते हैं, क्योंकि उन्हें कोई खास हीरो-हीरोइन बहुत ज्यादा पसंद होते हैं, और वे उनके लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। ये दीगर बात है कि इन धनपशुओं की ज्यादातर कहानियां और योजनाएं पांचसितारा होटलों के मलमली बिस्तरों तक आते-आते दम तोड़ देती हैं।

मतलब यह कि अमूमन किसी फिल्म को देखकर यह अनुमान लगाना कि इस फिल्म के निर्माण के पीछे निर्माता का उद्देश्य निर्देशक के विचारों को पर्दे पर लाने के अलावा और कुछ नहीं था, हास्यास्पद लगता है। इस सबके बावजूद हमारे समय के सिनेमा के महान जानकार यह साबित करने पर तुले रहते हैं कि तमाम व्‍यावसायिक दबाव के बावजूद हिंदी सिनेमा ने एक से एक कैसे कैसे अद्भुत प्रतिभाशाली निर्देशकों की फौज तैयार की है … उनके लेखों- विश्लेषणों से लगता है कि यह भारतीय सिनेमा का स्वर्ण काल है… कि देशी बर्गमैन, फेलिनी, फोर्ड और टैरेंटिनो से इंडस्ट्री भरा-पड़ा है। ब्लॉगियों के लिए हर शुक्रवार को कोई न कोई महान फिल्म रिलीज होती है।

सिनेमा के ज्यादातर ज्ञानियों के लिए सिनेमा की समझ मनोहर कहानी में छ्पी कहानियों की नाप तौल से ज्यादा नहीं होती। वे आपको बताएंगे कि अमुक फिल्म की कहानी में अमुक सूत्र को बीच में छोड़ दिया गया, अमुक सूत्र का विकास ठीक से नहीं हो पाया, नाटकीयता का स्तर ये था या वो था, पात्र के हिसाब से परिवेश नहीं था या परिवेश के हिसाब से पात्र। संवाद में प्रभावोत्पादकता थी (या नहीं थी)। थोडा ज्यादा गंभीर गुरु बताएंगे कि अभिनय कैसा था, संगीत कैसा था। और जो गुरु घंटाल आलोचक हैं, वो आप को कभी-कभी सेट और कैमरा मूवमेंट के बारे में एक-दो बातें ऐसी कर देंगे कि आपको उनके ज्ञानी होने का आभास दूर से ही लग जाए। ऐसे गुरु घंटालों के बारे में प्राय: किंवदंतियां चलती हैं कि फिल्म तो इनका शौक है, पेशे से तो ये दूसरे फन के फनकार हैं।

लेकिन इनमें से ज्यादातर (बल्कि लगभग सभी) के लिए सिनेमा अंधों का हाथी है। जिसकी पकड़ में जो आता है, वह उसी को लेकर कूदने लगता है। अभी एक फिल्म आयी थी ‘रांझणा’। उस फिल्म पर जितने भी लोगों ने लिखा, उनमें से ज्यादातर लोग इस बात से बाग-बाग नजर आ रहे थे कि फिल्म ने क्या तो बनारस की आत्मा को पकड़ लिया और जिन कुछ लोगों ने फिल्म की आलोचना की, उन्होंने भी इसलिए की कि फिल्म जेएनयू को ठीक से पकड़ नहीं पायी, कि फिल्म की कहानी मध्यांतर के बाद भटक गयी! मतलब फिल्म का लेखा-जोखा फिल्म की कहानी और फिल्म के लोकेशन के आधार पर कर दिया गया। किसी ने यह सवाल नहीं उठाया कि प्रेम और दीवानगी की जैसी चासनी ‘रांझणा’ में तैयार की गयी थी, वैसी तो पूरे सूफी और भक्ति प्रेम को एक साथ घोंट देने पर भी तैयार नहीं होती। सतही प्रेम के ऐसे नकली उत्पाद पर भी हमारे सिनेमा गुरु बोलने से हिचके! हिचके क्योंकि उन्हें लगा होगा कि कहीं लोग उन्हें प्रेम विरोधी, सिनेमा विरोधी या आधुनिकता-उत्तर आधुनिकता विरोधी न समझ लें। अब ये हमेशा खराब को खराब कहने में हिचकते हैं। अब ये हर फिल्म को तरन आदर्श की तरह महान और परिघटनात्मक मानते हैं। हिचक इनका स्थायी भाव बन गया है। आलोचना इनके हिसाब से कुंठित कर्म है। अस्तु। हम यहां ‘रांझणा’ की समीक्षा के गुण-दोष की चर्चा करने नहीं आये हैं।

Ship of Theseus 570

ज्यादतर समय एक सजग संवेदनशील दर्शक के नाते हम फिल्म को देखते हुए पर्दे पर चलने वाले तमाशा से उतना ही दूर खड़े रहते हैं, जितना बाघ के साथ खेलते सर्कस के जोकर से। हमें पता होता है कि पर्दा पर चलने वाला यह नाटक उतना ही झूठ है, जितना कि उस अदने से जोकर और बाघ के बीच का रिश्ता – जिसमें न तो असली भय होता है और न ही असली प्रेम। यह वह वांछनीय वैराग्य नहीं है, जिसकी मांग बर्तोल्‍त ब्रेख्त अपने नाटक के दर्शकों से करते हैं। यह एक किस्म की स्वआरोपित अर्ध मूर्च्छ्ना है, जो हम पर एक खास किस्म के अभ्यास के कारण उतर आयी है।

कला के नाम पर कलाबाजी कर रहे इन समीक्षकों ने Ship of Theseus देखने के बाद फिर से आलोचना नामक अपनी कुदाल उटायी और फिल्म को समझने के लिए इसे मनोहर कहानी की कहानी शैली में समझने के सिलसिले में पूरी फिल्म को खोद डाला। नतीजतन फिल्म के बारे में आप की जो समझ बनी होगी, वो कुछ इस तरह की कि इस फिल्म में तीन कहानिया हैं, सबसे अच्छी कहानी सबसे आखिरी कहानी है और सबसे कमजोर बीच वाली। और तीनों कहानियों को आखिर में खूबसूरती से जोड़ दिया गया है।

नहीं, मैं जोर से, बेहद जोर से किसी फिल्म को देखने के इस तरीके का प्रतिवाद करता हूं। आप एक बार फिल्म में कहानी देखने के बजाय फिल्म देखने के लिए जाएं। हालांकि ऐसी फिल्में आजकल बनती ही बहुत कम हैं, जिनमें फिल्म नजर आये! लेकिन Ship of Theseus एक बेहतरीन फिल्म है जिसमें आप फिल्म देख सकते हैं… इसे देखते हुए एक पल के लिए आपको यह एहसास नहीं होगा कि यह फिल्म बनाने के पीछे निर्माता या निर्देशक का कोई और मकसद था… कि पर्दे के ऊपर चलने वाले नाटक दरअसल आपके अपने अंदर चलने वाले नाटक प्रतीत होंगे, वो भी बिना किसी भावनात्मत्क सम्मोहन-उच्चाटन के!

मैं जानता हूं, आप Ship of Theseus अब तक देख चुके होंगे। परंतु अगर किसी कारण से नहीं देखी है, तो जाकर जरूर देखिए। इस फिल्म पर कुछ समझदार और तमीजदार बातें करने का मेरा मन कर रहा है।

Shyam Anand Jha(श्‍याम आनंद झा। सिने कर्मी। लेखक, पत्रकार, पटकथाकार। डंबहेड के क्रिएटिव डायरेक्‍टर। ललित नारायण मिथिला विश्‍वविद्यालय और जवाहर लाल नेहरु विश्‍वविद्यालय से पढ़ाई-लिखाई। मुंबई में रिहाइश। उनसे jhashyamanand@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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