सिनेमा में स्त्रियों की नयी जगह उतनी नयी नहीं है

सिने बहसतलब : पहला सत्र : हिंदी सिनेमा में स्त्रियों की नयी जगह
वक्‍ता : स्‍वरा भास्‍कर, शिल्पा शुक्ला, उषा जाधव, विशाखा सिंह
मॉडरेटर : विभावरी

♦ स्वरा भास्कर

मेरी बातें मेरी सीमित समझ पर आधारित है। हमारे सिनेमा में नायक की पतंग कभी नहीं कटती। स्त्रियों की नयी जगह पर बात करने से पहले पुरानी जगह को जानना बहुत जरूरी है। महिलाओं पर साइलेंट पीरियड से ही फिल्में बनती रही है, जैसे 1937 के आसपास शादी का संघर्ष, दुनिया न माने। ये दोनों महिला प्रधान फिल्‍में थीं। फातिमा बेगम पहली निर्देशक हैं, जो साइलेंट के समय की ही हैं। फिल्म के हर क्षेत्र में महिलाओं का योगदान शुरू से रहा, इसलिए नयी जगह उतनी नयी नहीं है। राम के जमाने से ही स्त्रियों की अलग तरह की विडंबना रही है। फिल्में सिर्फ इन विडंबनाओं को रिफलेक्ट करती हैं और करती रहेंगी। फिल्मों में नयी चीज जिसको हम आइटम सांग कहते हैं, वह मेरे लिए बहुत रोचक है। पुराने समय के आइटम नंबर वैंप किया करती थीं, जबकि अब यह जगह हिरोइन ने ले ली है। छइया छइया से इसकी शुरूआत कही जा सकती है। लेकिन यह कोई प्रगतिशील कदम नहीं है। नयी चीज जो मुझे लगती है, वह यह है कि अब नायक को भी कपड़े उतारने पड़ रहे हैं, मतलब पुरुष भी अब ऑब्जेक्टिफाई होने लगे हैं, जबकि पहले सिर्फ महिलाएं होती थीं। आइटम सांग में हिरोइनों के होने के पीछे बाजार एक बहुत बड़ा कारण है। नया मेरे लिए अब यह है कि जो फिल्में लिखी जा रही हैं, उनमें अब महिलाओं के आत्मविश्वास से भरे किरदार दिखाये जा रहे है, डर्टी पिक्चर इसका अच्छा उदाहरण है। अब स्त्रियों की दुहाई की कहानियां नहीं हैं। कहानी बहुत पॉजिटिव फिल्म है, क्योंकि उसके विक्टिमहुड को प्रजेंट करके उसके नजरिये का इस्तेमाल किया गया है। यही आज के समय का चैलेंज है।

♦ शिल्पा शुक्ला

मेरी पहली फिल्म ‘खामोश पानी’ ने मुझे औरतों के प्रति बहुत संवेदनशील बनाया। सिनेमा में मुझे न औरतें दिखती हैं न मर्द, मुझे बस कहानी दिखती है। मेरी दूसरी फिल्म ‘चक दे इंडिया’ जो लड़कियों से भरी हुई है और लड़कियों से जुड़ी हुई भी, इसके बावजूद मैंने कभी वीमेन एंगेल से नहीं सोचा। ‘बीए पास’ को भी लोगों ने बहुत सराहा। मैं कभी भी सिनेमा में महिलाओं को पीड़ित की तरह नहीं देखती और इस मसले पर मैंने कभी सोचा भी नहीं। बीए पास सिर्फ मैंने इसिलिए की क्योंकि वह मर जाती है। मुझे सारिका और बिदिंया का किरदार पसंद है, क्‍योंकि दोनों redemption पर जाती है।

♦ उषा जाधव

मैं कोल्हापुर जैसी छोटे जगह से हूं, फिर पुणे गयी और फिर ट्रैफिक सिग्नल फिल्म मिली। मेरी यात्रा तो बहुत कठिन थी। मैंने तो बहुत बार सुना है कि हिरोइन मैटेरियल होना चाहिए, जो मैं थी नहीं। ये सामना करना करना बहुत मुश्किल रहा है। फिर मुझे “धग” फिल्म मिली। मुझ पर ट्रस्ट किया गया, इससे मैं खुश हूं। आजकल नये लोगों पर आधारित फिल्में बन रही है। यह बदला हुआ दौर है।

♦ विशाखा सिंह

मुझे लगता है यहां जो हम सारी बैठी हुई हैं ये सभी की सभी इंडिपेंडेंट हैं। ये नयी बात है जो नोटिस की जा रही है। फिल्मों में महिलाओं का योगदान हमेशा रहा है। महिला प्रोड्यूसर की संख्या बढ़ी है, पर डायरेक्टर अभी भी अंगुली पर हैं। मुझे लगता है कि कभी फरहा और एकता भी प्रोग्रेसिव काम करें। गुनीत मोंगा बहुत अच्छी फिल्में बनाती हैं। आजकल ऐसे डायरेक्टर हैं, जो नयी लड़कियों पर कैरेक्टर के रूप में काम कर रहे हैं। संघर्ष अभी भी काफी हद तक वही है। खुद पर विश्वास होना बहुत जरूरी है। संघर्ष के बिना मजा कैसा। उषा के संघर्ष ने ही उसे बड़ा कर दिया है।

दिगंत कुमार और अमित हिसारिया की रिपोर्ट

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