खुद के कार्टूनों में छिपा है मीडिया का लोकतंत्र

♦ विनीत कुमार

उटलुक न्यूजरुम पर बना ये कार्टून अपने आप में कितना कुछ समेटे हुए है। संपादक विनोद मेहता के हाथ में चाबुक है, बाकी लोग भी अपनी-अपनी जगह पर अस्त-व्यस्त और उलझे हैं। लेकिन इसे कभी छापा भी तो अपनी ही पत्रिका आउटलुक में। मतलब ये कि इतना स्पेस तब भी बरकरार रहा कि ह्यूमर बची रहे। आप इस ह्यूमर में एक किस्म का खुलापन भी देख सकते हैं।

मुझे याद है न्यूज 24 ने एक बार अपने और चैनल के बाकी मीडियाकर्मियों पर भी होली के मौके पर ऐसे ही कार्टूननुमा पैकेज बनाया था, जिसे लोगों ने बुरा मानने के बजाय इस खुशी से स्वीकार किया था कि चलो हम इस लायक हैं कि हमें इस कार्टून पैकेज में शामिल किया गया। उन लोगों का मन थोड़ा छोटा भी हो गया, जिन्हें शामिल नहीं किया गया था।

आउटलुक की पत्रकार नम्रता जोशी ने अपने पुराने दिनों को याद करते हुए ये कार्टून साझा किया तो लगा कि मीडिया के भीतर कितनी क्रिएटिविटी, ह्यूमर और अपनी ही आलोचना और अपने ही ऊपर मजे लेने की रवायत रही है। इसे धंधा बनाने के फेर में इसके भीतर से ये स्‍पेस कितनी तेजी से खत्म हो रहा है, ऑफिस कितनी ड्राय जगह होती जा रही है कि हम बस पैकेज और स्टोरी फाइल करने भर के लिए रह जा रहे हैं।

(विनीत कुमार। युवा और तीक्ष्‍ण मीडिया विश्‍लेषक। ओजस्‍वी वक्‍ता। दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय से शोध। मशहूर ब्‍लॉग राइटर। कई राष्‍ट्रीय सेमिनारों में हिस्‍सेदारी, राष्‍ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन। हुंकार और टीवी प्‍लस नाम के दो ब्‍लॉग। हाल ही में वाणी प्रकाशन उनकी किताब छपी है: मंडी में मीडिया। उनसे vineetdu@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

विनीत कुमार की बाकी पोस्‍ट पढ़ें : mohallalive.com/tag/vineet-kumar

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