अपनी आजादी तो भैया लौंडिया के तिल में है!

♦ शिवेंद्र कुमार सिंह

[डिस्क्लेमर : इस रिपोर्ट को पढ़ते वक्त किसी भी हाल में ये न सोचें कि इसे फिल्म की गहरी समझ रखने वाले ने लिखा है। इससे किसी तरह की बौद्धिक समझ या जानकारी की अपेक्षा भी न करें। ये सिर्फ एक रिपोर्ट है। वो भी एक टीवी पत्रकार की लिखी रिपोर्ट। जो फिल्म को फिल्म की तरह देखता है और खुद फिल्म लिखने की चाहत रखता है…]

इसे एक सुखद संयोग ही कहूंगा कि बीती 12 तारीख को अविनाश भाई को फोन किया, तो उन्होंने सबसे पहले ये बताया कि मेरा नंबर वो खो चुके हैं और इससे पहले कि वो भूल जाएं और चूंकि मैंने फोन कर ही लिया है तो मेरे लिए बहसतलब का न्यौता भी है। उन्होंने गिरिजेश को न्यौता देने की जिम्मेदारी भी सौंप दी, ये पूछे बगैर कि भैया शिवेंद्र तुमने फोन किया क्यों था? सब खैरियत तो है? खैर, हम भी न्यौते की खुशी में भूल ही गये कि फोन किया किसलिए था।

(दो दिन के कार्यक्रम में शामिल होने के बाद और कार्यक्रम के स्तर, सफल आयोजन के पीछे की मेहनत को सिर्फ आंकने भर के बाद ही मैं समझ गया कि अकेली जान पर ये आयोजन कितना भारी पड़ता होगा, तो इसलिए सबसे पहले अविनाश भाई आपको बधाई…)

तो अब आइए मुद्दे पर आते हैं। मुद्दे यानी बहसतलब पर। 21 तारीख को मैं ऑफिस पहुंचा। दोपहर में आदतन गिरिजेश को ये जानने के लिए फोन किया कि वो कहां है? पलटकर सवाल आया अरे तुम इंडिया इंटरनेशनल सेंटर नहीं पहुंचे? अविनाश भाई का कार्यक्रम था। (भूलने का कॉपीराइट सिर्फ अविनाश के पास नहीं है…)। मैं तुरंत अपनी सीट से उठा। कार की तरफ भागा। आईआईसी की तरफ भागते वक्त पहला और सबसे बड़ा लालच यही था कि पीयूष भाई को गाते हुए सुनना है। (13-14 साल पहले जब पीयूष भाई को गाते सुना था, तब से लेकर अब तक वक्त बहुत बदल गया। पीयूष भाई अब बड़े स्टार हैं। हालांकि बड़ी बात ये है कि उस एक मुलाकात के बाद भी वो मुझे भूले नहीं हैं। हम लोगों के बीच SMS का आदान-प्रदान चलता रहता है) रास्ते में दो-तीन बार गिरिजेश को फोन कर दिया कि पीयूष भाई ने गाना शुरू तो नहीं किया। (अविनाश भाई माफ करें… इस बात के लिए कत्तई नाराज न हों कि साला बुलाया तो था सिनेमा से जुड़ी बातों पर बहस का हिस्सा बनने के लिए और ये ससुर सिर्फ पीयूष भाई को सुनने के लिए आये थे…) खैर शुक्रिया दिल्ली के ट्रैफिक का। मेरे और पीयूष भाई की गायकी में रोड़ा न बनने के लिए। पीयूष भाई हारमोनियम संभालें, उससे पहले हम हॉल में थे। कुर्सी पकड़ी सबसे आगे की (आयोजक के मित्र जो ठहरे)।

जब हम हॉल में पहुंचे, इरशाद कामिल साहब हिंदी फिल्मों में लिरिक्स के विषय पर बोल रहे थे। चूंकि मुझे विषय का अंदाजा नहीं है, इसलिए मैं टिप्पणी नहीं करूंगा (वैसे होता तो भी शायद कर नहीं पाता)। इरशाद साहब ने फिल्म कॉकटेल के गाने की एक लाइन “मैं हूं ही नहीं इस दुनिया की” का जिक्र किया, तब मैं पहली बार हॉल में अपने दिमाग के साथ बैठा। उससे पहले तो सिर्फ पीयूष भाई को सुनने गया था। (इसकी एक बड़ी वजह शायद ये भी है कि मेरी एक महिला मित्र कहती थीं कि ये गाना जैसे उन्हीं के लिए लिखा गया है। वो भी खुद को इस दुनिया का नहीं मानतीं – अविनाश भाई ने ये प्रॉमिस किया है कि वो इस महिला मित्र के बारे में नहीं पूछेंगे…)

खैर, थोड़ी देर में माइक पर अविनाश भाई पहुंचे और उन्होंने मंच पर बैठे अतिथियों से बड़े अधिकार के साथ कहा कि वो कम बोलें क्योंकि लोगों के ज्यादा बोलने का दूसरा मतलब ये भी है कि पीयूष भाई को सुनने का वक्त कम मिलेगा (चलो भैया, मन से बोझ उतरा कि यहां इतनी भारी भरकम बहस हो रही है और हम सिर्फ पीयूष भाई के गाने की सोच रहे हैं, क्योंकि हमारे जैसे और भी लोग वहां मौजूद थे)। इरशाद साहब की बात के बाद माइक राजशेखर के पास पहुंचा। राजशेखर पहले तो मेरे मित्र के मित्र थे लेकिन फिर ये इनडायरेक्ट दोस्ती डायरेक्ट दोस्ती में बदल गयी। (असल में यहीं से मेरे लिए बहस तलब असल में शुरू हुआ…)

राजशेखर ने माइक संभाला। बोले बिहार से हूं, ‘स’ को ‘श’ कहूंगा और ‘श’ को ‘स’। यहां तक तो बात ठीक थी, फिर उन्होंने धमकी दी कि नुक्ता नहीं लगाऊंगा। जिद है मेरी (वैसे सोच कर देखिए तो इस धमकी में भी लिरिक्स दिखती है – नुक्ता नहीं लगाऊंगा, जिद है मेरी… भाई राजशेखर अगर आप कभी इसे लिरिक्स बनाएं, तो मुझे प्लीज याद कीजिएगा…)

बकौल राजशेखर “पिछले दिनों मैं पटना में था। लोगों ने मुझसे सिर्फ दो सवाल पूछे। पहला सवाल – ऐ भैया, राहुलवा या मोदिया (राहुल गांधी या नरेंद्र मोदी), दूसरा सवाल – ऐ भैया आप कब वैसा गाना लिखेंगे – क्योंकि तुम ही हो। पूरा हॉल तालियों से गूंज गया। ये तालियां राजशेखर की ‘मॉडेस्टी’ के लिए भी थीं और इसलिए भी क्योंकि थोड़ी देर पहले ही पीयूष मिश्रा ने राजशेखर के लिखे गाने की तारीफ की थी। (फिल्म तनु वेड्स मनु – रंगरेज और कितने दफे दिल ने कहा…)”

राजशेखर ने माइक संभाला तो इस बात की कत्तई फिक्र नहीं की कि अभी वो इंडस्ट्री में नये हैं (कहीं कोई बेकार में नाराज न हो जाए टाइप्स)। बोले- प्रोड्यूसर कहता है मौला लिख दो, 60 से ज्यादा मौला वो सुन चुके हैं। इंडस्ट्री में मौला का ट्रेंड अचानक चल गया है। मैंने मना कर दिया। क्योंकि मेरे मना करने का मतलब अभी ही है, बाद में तो मैं मना कर ही दूंगा, जब मेरे पास बहुत सारा काम होगा।

इसके बाद इस बात पर चर्चा शुरू हुई कि पीयूष भाई को आज गाना है या कल। पीयूष भाई बोले यार अविनाश हॉल वाला कह रहा है देर हो रही है। कल रखा जाए ये गाने का सेशन। अनिवाश बोले – आप तो ऐसे कह रहे हैं जैसे सब कुछ नियम के मुताबिक ही करते हैं। (पीयूष भाई और अविनाश दोनों पर हॉल में बजी तालियों का नैतिक दबाव भी था, लिहाजा पीयूष भाई ने माइक संभाला और गायकी शुरू हुई। हालांकि उन्होंने शुरू में इस बात का ऑफर दिया कि ये सेशन अगले दिन रखा जाए, लेकिन उनका ऑफर ठुकरा दिया गया। हारमोनियम भी पीयूष भाई के मन का नहीं था, लेकिन पीयूष भाई को हारमोनियम और माइक की नहीं – महफिल और मूड की जरूरत रहती है…)

ये बात चौंकाती है कि पीयूष भाई के लिरिक्स कई बार आक्रामक होने के बाद भी किसी लोरी की तरह लगते हैं। हारमोनियम पर सात सुरों में ‘स’ और ‘प’ के साथ पीयूष भाई की गायकी चलती है। ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है… इक बगल में चांद होगा… (ये ‘स’ और ‘प’ वाली बात पर भाई गिरिजेश बताते हैं कि ये कोमल सुर है और इन्हें बेस बनाकर पीयूष भाई तमाम दूसरे सुरों में घुसते चले जाते हैं। बिल्कुल धड़ल्ले से। जैसे प्रयागराज एक्सप्रेस अलीगढ़ पार करने के बाद कानपुर की तरफ बढ़ रही हो…)

इस दौरान पीयूष मिश्रा ने गानों की लिरिक्स के ‘एमटीवीआईजेशन’ की भी चर्चा की। उन्होंने सुनाया…

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है
वक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमां,
हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है

आज का लौंडा तो कहता हम तो बिस्मिल थक गये
अपनी आजादी तो भैया लौंडिया के तिल में है

हाथ की खादी बनाने का जमाना लद गया
आज तो चड्डी भी सिलती इंग्लिसों की मिल में है

(हमने पाया कि अगले दो दिन तक हमारा दिल और हमारी चड्डी भी पीयूष भाई की लाइनों का अनुसरण करती पायी गयी…)


छायाकार: प्रकाश के रे

खैर, सेशन और आगे बढ़े, तब तक अविनाश भाई को हॉल की तरफ से धमकी मिल गयी थी (ऐसा छोटे शहरों में शादी के मौके पर आने वाली बैंड पार्टिंयां भी करती हैं कि आपने पहली शिफ्ट का बैंड बुक किया था। अब हम जा रहे हैं। उनके जाने का कोई मौका मुझे बताया नहीं गया, क्योंकि हर बार दूल्हे का कोई न कोई दोस्त बैंड वालों को ‘डोज’ दे देता है। मेरी शादी में ये काम दोस्त रीतेश रत्न ने किया…) अविनाश भाई बोले – पीयूष भाई ने कहा मैं तो पहले ही कह रहा था। पहले दिन का कार्यक्रम समाप्त हुआ।

हॉल से निकलें, इससे पहले ही अविनाश भाई एक और ऑफर के साथ तैयार थे। सुनिए नौ बजे से पार्टी है। आप लोग आइए। आप लोग मतलब मैं और गिरिजेश। ऑफर तो अच्छा था, लेकिन घड़ी में सिर्फ छह बज रहे थे। (घर वापस आकर लौटने के कई नुकसान और एक लालच था… (नुकसान – कहीं घर पहुंचने के बाद मन बदल गया तो चार-पांच लीटर पेट्रोल खराब कौन करेगा। फायदा – ऐसे यारों दोस्तों के साथ महफिलें रोज रोज कहां मिलती हैं…) अविनाश भाई के ऑफर को स्वीकार कर लिया गया। राजस्थान से आये दो और साथियों को अपने साथ रखने की जिम्मेदारी भी मिली। गजेंद्र जी और भाई रामकुमार के साथ मैं और गिरिजेश प्रेस क्लब के रास्ते पर थे। (दिल्ली में पहली बार इतने आत्मविश्वास के साथ मैं एक जगह से दूसरी जगह पहुंचा, जानें कैसे?) रास्ते में गजेंद्र जी और भाई रामकुमार ने बताया कि उन्होंने एक राजस्थानी फिल्म बनायी है। फिल्म का नाम है – भोभर। फिल्म के बारे में तमाम बातचीत चल रही थी। कहानी। हीरो। शूटिंग। लेकिन मेरी दिलचस्पी सिर्फ इस बात में थी कि इस फिल्म को बनाने में पैसे कितने खर्च हुए। मैंने बगैर संकोच किये पूछ ही लिया। गजेंद्र जी ने बता भी दिया। (उस रकम ने अंदर ही अंदर खुशी की लहर भर दी, क्योंकि मैंने भी एक फिल्म की कहानी हाल ही में पूरी की है और उसे लेकर लोगों से बातचीत का सिलसिला शुरू करने की फिराक में हूं…) मुझे अपनी फिल्म का न तो नहीं पता लेकिन गजेंद्र जी और भाई रामकुमार दोनों की हिम्मत की वाकई दाद देनी होगी कि उन्होंने न सिर्फ फिल्म बनायी बल्कि फिल्म को रिलीज भी किया। (दिलचस्प बात ये भी है कि नौ बजे की पार्टी के इंतजार में वक्त काटना थोड़ा मुश्किल हो रहा था। आखिर में हम लोग ये मान कर पार्टी वाले होटल की तरफ प्रस्थान कर गये कि पहले पहुंचने की सूरत में वो हमें भगा थोड़े न देगा। क्षेपक के तौर पर ये भी कि जब हम पहुंचे, तो अविनाश भाई नहीं पहुंचे थे।)

अब शुरू हुई पार्टी। हम लोगों ने एक कोना थामा। हम लोग मतलब मैं, गिरिजेश, गजेंद्र जी और भाई रामकुमार। पिछली पार्टी का थोड़ा सुरूर (राजशेखर का असर देखिए स को श लिख दिया और फिर सोच रहा था कि सही क्या सुरूर या शुरूर)। पार्टी में कई लोगों से मुलाकात हुई, जिनमें से कुछ लोगों को पहले से जानता था, कुछ से पहली बार मिला। निर्देशक सुभाष कपूर को पहले से जानता हूं, तो थोड़ा वक्त उनके साथ बिताया। अभिनेता दीपक डोबरियाल मिले। उनसे फिल्म ओंकारा के बारे में चर्चा हुई। गिरिजेश ने कुछ गाने गाये। सीएसडीएस के भाई रविकांत भी इस दौरान साथ में थे। उन्होंने गाने का लुत्फ उठाने के साथ साथ ये बात भी दिमाग में डाल दी कि क्यों न दूसरे दिन के सेशन में गिरिजेश को मंच से गवाया जाए। चलते चलते निर्देशक अनुभव सिन्हा से मुलाकात हुई। मैं खुद ही उनसे मिलने गया। (जब एक बार टीवी की नौकरी गयी थी तो 19,200 रुपये के चेक के साथ मुंबई पहुंच गया था। तमाम लोगों से मिला। एक बड़े लेखक ने जिन्हें फिल्मफेयर भी मिल चुका है करीब हफ्ता भर काम कराने के बाद पैसे मांगने पर कहा – काम भी दूं और पैसे भी। खैर, किसी के खिलाफ जहर निकालने का ये सही मंच नहीं है। अनुभव जी ने अपने भाई के साथ एक वीडियो अल्बम में काम करने का मौका दिया था। एल्बम के गायक सुरजीत सिंह बिंदरखिया अब इस दुनिया में नहीं रहे। कोरियोग्राफर पप्पू-मालू अब अच्छे कोरियोग्राफर्स में गिने जाते हैं। उन्होंने संजय लीला भंसाली की देवदास में भी कोरियाग्राफी की थी। मुझे ठीक से याद नहीं लेकिन शायद सोनू सूद भी थे उस एल्बम में। एल्बम शूट के तीसरे दिन मैं बिना किसी को बताये दिल्ली भाग आया था। उस बिना बताये भागने के लिए मैंने अनुभव जी से माफी मांगी। (इस बीच ये तय हो गया था कि दूसरे दिन पीयूष भाई के सेशन के लिए मैं अपना हारमोनियम ले आऊंगा…)

अब दूसरे दिन का ब्यौरा। दूसरे दिन मैं थोड़ी देर के लिए ऑफिस गया। अविनाश भाई से तय हुआ था कि डेढ़ बजे तक हारमोनियम के साथ पहुंच जाऊंगा। 1.10 पर ही पहुंच गया। (उसके पीछे घर से खाना न लाना भी बड़ी वजह था)। पहुंचा तो फिल्म ग्रैंड मस्ती की कामयाबी को लेकर बहस छिड़ी हुई थी। दर्शकों में किसी को उसकी भाषा से तकलीफ थी, किसी को फूहड़ कॉमेडी से। अब सुनिए अनुभव सिन्हा का जवाब – भई ऐसा है कि शहरों में रेड लाइट एरिया भी होता है, आपको कोई वहां जाने के लिए कहता तो नहीं है। आप वहां जाने के बजाय अच्छी किताबें पढ़ें। (जवाब थोड़ा ‘हार्श’ लग सकता है लेकिन किसी भी विषय के बेहद उत्साही छात्रों को समझाने के लिए इस तरह का जवाब देना पड़ता है…)। उदय जी ने अपनी राय रखी। बीच बीच में पीयूष भाई अपनी बात कहते रहे। कभी माइक के साथ, कभी माइक के बगैर। फिर लंच टाइम हो गया। लंच टाइम में अभिनेत्री विशाखा सिंह से मुलाकात हुई, प्रियदर्शन जी मिले। (दुनिया हॉल के बाहर खा रही थी और भाई अविनाश सिल्वर फॉएल में लिपटी रोटियों के साथ सब्जी हॉल के अंदर…)। गिरिजेश भी अब तक पहुंच गये थे। गाने का मूड गिरिजेश को देखते ही बनने लगा था। लंच के बाद गायकी का दौर शुरू हुआ। (गिरिजेश की गायकी का हमेशा से ही फैन हूं, उन्होंने फिर मूड बनाया। फिर एक और गायिका ने महफिल को आगे बढ़ाया। और उसके बाद मंच पर हाजिर हुए पीयूष मिश्रा…)

पीयूष भाई ने आते ही मुनादी की कि भाई मैं जहां से शुरू करता हूं, वहीं से शुरू करूंगा… (ओ री दुनिया)… फिर एक के बाद गाने। फरमाइशें। तालियां। ‘स’ और ‘प’ पर पीयूष भाई की सधी ऊंगलियां। बीच बीच में उनकी कॉमेंट्री। (खास बात – पीयूष भाई ने कहा कि ये सारे गाने उन्होंने 90 के दशक में लिखे थे। जो बाद में हिट हुए। यानी लिखा हुआ कभी खराब नहीं जाता।) आखिर में हुस्ना। पीयूष भाई पूरी हुस्ना सुना नहीं पाये। आखिरी के दो-तीन गाने दरअसल वो शुरू करने के बाद भूल जा रहे थे। झुंझला रहे थे। फिर भी तालियां जमकर बज रही थीं।

(आगे बढ़ने से पहले मुल्ला नसीरुद्दीन का एक किस्सा याद आ रहा है। एक बार मुल्ला नसीरुद्दीन दरबान में आमंत्रित थे। वो घर से निकलने ही वाले थे कि उनके एक बहुत पुराने दोस्त आ गये। दोस्त ने देखा मुल्ला कहीं निकल रहे हैं, तो उन्हें मायूसी हुई। लेकिन मुल्ला नसीरुद्दीन ने दोस्त से कहा कि वो भी साथ चलें। दोस्त ने कहा कि मेरे पास कपड़े नहीं हैं। मुल्ला ने अपने कपड़े देने की बात कही और चमकती हुई पोशाक दोस्त को दे दी। मुल्ला और उनके दोस्त दरबार में पहुंचे। लोग मुल्ला के दोस्त को बड़े ध्यान से देख रहे थे। मुल्ला ने तुरंत कहा – मेरे दोस्त हैं। आज सुबह ही आये थे। मैं साथ ले आया। इनके पास यहां आने लायक कपड़े नहीं थे, तो मैंने अपने कपड़े दे दिये। दोस्त नाराज हो गया। बोला, ये क्या मजाक है मुल्ला। तुम तो बेइज्जती कर रहे हो मेरी। मुल्ला को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने माफी मांगी और दोबारा इस बारे में बात न करने का वायदा किया। थोड़ी ही देर में दरबार की औरतों पर मुल्ला का ध्यान गया, तो वो उनके दोस्त को ही निहार रही थीं। मुल्ला से रहा नहीं गया, बोले – मेरे दोस्त हैं। सुबह ही आये। इतना कहते ही उन्हें दोस्त से किया गया वायदा याद आया। बात को आगे बढ़ाते हुए मुल्ला बोले – मैं साथ ही इन्हें यहां ले आया। रहे कपड़े, तो वो इन्हीं के हैं। दोस्त एक बार फिर गुस्साया। बोला मैं वापस जा रहा हूं। मुल्ला ने फिर माफी मांगी। थोड़ा और आगे बढ़े तो फिर समझ आया कि उन्हें तो कोई देख ही नहीं रहा – उन्होंने फिर अपने दोस्त का परिचय कराया कि ये मेरे दोस्त हैं। सुबह ही घर आये। मैं इधर के लिए आ रहा था, तो साथ ले आया। रहे कपड़े, तो कपड़ों की तो कोई बात ही नहीं करनी है। आखिर में… रही हारमोनियम की बात, तो उसकी तो कोई बात ही नहीं करनी है…)

दूसरे दिन का कार्यक्रम खत्म होने से पहले का आखिरी सेशन। राजनीतिक फिल्मों पर चर्चा। थोड़ी देर के लिए बाहर निकला, तो दोस्त अरूणोदय प्रकाश नजर आ गये। उनके साथ बातचीत शुरू हुई ही थी कि राजशेखर और हिमांशु भी आ गये। (अरुणोदय राजशेखर और हिमांशु से दोस्ती का इनडायरेक्ट जरिया है) हिमांशु की तारीफ में बहुत कुछ कहने का मन था क्योंकि मुझे तनु वेड्स मनु और रांझणा दोनों बेहद पसंद हैं। लेकिन हिमांशु से मिलकर ऐसा लगा कि वो बहुत संजीदगी से तारीफ सुनने वालों में शायद हैं नहीं। मस्त मौला। हंसते खिलखिलाते हिमांशु से बातचीत के बाद उनकी तारीफ का आयडिया ड्रॉप कर दिया। वैसे भी उस वक्त उनके साथ फिल्म के ही लोग थे। जिनके सामने हिमांशु को उनकी बेहतरीन कहानी के लिए कई बार तारीफ मिल चुकी होगी। साथ में स्वरा भी थीं। (थोड़ी देर पहले ही स्वरा के बगल से गुजरते वक्त मैंने सुना कि वो एक लड़के को बता रही थीं कि मैं राइटिंग से नहीं जुड़ी हुई हूं। उसका मुझे ज्यादा आइडिया नहीं है। मैं आपको लिखने वालों से मिलवा दूंगी)। हम लोग राजशेखर को छेड़ते रहे कि वो गाना कब लिखोगे – क्योंकि तुम ही हो। स्वरा के पिता जी चैनलों में गेस्ट के तौर पर आते रहते हैं, उन्हें काफी दिनों से जानता हूं। थोड़ी जिज्ञासा स्वरा के बिहारी टोन को लेकर थी, वो भी बाद में समझ आ गयी। स्वरा ने अपने अब तक के करियर में जितने भी रोल किये हैं, उनमें उनकी एक्टिंग के अलावा उस ‘खास’ टोन को लेकर भी चर्चा हुई है।

हॉल में वापस गये तो सुभाष जी बोल रहे थे। उनका कहना था कि फिल्मकारों से इतनी भी अपेक्षा न रखी जाए कि वो समाज की हर बुराई को खत्म कर देंगे। उनका ये वक्तव्य अरविंद गौड़ की कही बातों के संदर्भ में था। थोड़ी देर बाद प्रियदर्शन जी ने बताया कि उन्होंने एक बार सीमा विश्वास (फिल्म बैंडिट क्वीन) का एक इंटरव्यू पढ़ा था। जिसमें सीमा ने ये कहा था कि फिल्म में जो नग्न दृश्य है, वो उन्होंने नहीं किया था। उसे जिस एक्सट्रा ने किया था। उसे पैसों की जरूरत थी, जिसके चलते उसने वो रोल किया था। इस पर पीयूष भाई ने तुरंत आपत्ति जतायी और बताया कि अच्छे खासे पैसे लेकर इस तरह के रोल करने वाली एक्सट्रा हीरोइनें अक्सर इस तरह के बयान देती हैं। फिर चर्चा हुई कि यथार्थ को ज्यों का त्यों दिखाना कितना सही है। प्रियदर्शन जी की राय थी कि यथार्थ को ज्यों का त्यों दिखाना हर मौके पर सही नहीं है। फिर कला का क्या होगा… (बाद में मैंने उनसे कहा कि शोले में ठाकुर का हाथ कटता है, छोटे बच्चे को गोली मारी जाती है लेकिन दरअसल स्क्रीन पर कुछ नहीं होता। सब कुछ प्रतीकात्मक होता है। ठाकुर की शॉल उड़ जाती है और स्टेशन पर ट्रेन आकर रूकती है…) इन सारी चर्चाओं के दौरान पीयूष भाई ने भी कहा कि हर देश में अनुराग (कश्यप) जैसा एक डायरेक्टर होना जरूरी है। लेकिन सिर्फ एक… मोर देन वन विल बी टू मच। उन्होंने हॉल में मौजूद और उन्हें करीब से जानने वालों के लिए एक चौंकाने वाला खुलासा ये भी किया कि वो खुद गाली नहीं देना चाहते, लेकिन कई बार फिल्म में देनी पड़ती है। एक बार फिर हॉल की बुकिंग का वक्त खत्म हो रहा था। इसलिए जबरदस्ती तालियां बजाकर, मंच से एनाउंस कराकर एक उत्साही सवालकर्ता को रोका गया। कार्यक्रम खत्म हुआ।

सुभाष जी ने कहा – चलो रोड पार करके चाय पीते हैं। वहां पहुंचे तो पांच-छह लोग हमसे पहले से वहां पहुंचे थे। कुछ ही मिनटों में 20-25 लोग और पहुंच गये। फिल्म पर बोद्धिक चर्चाएं शुरू हो गयी। अविनाश को बधाई देने का सिलसिला शुरू हुआ। इसी बीच चायवाले ने जेब से मोबाइल निकाला और जल्दी दूध भेजने का ऑर्डर प्लेस किया। फिल्म ‘लंचबॉक्‍स’ और ‘दी गुड रोड’ को लेकर तुलनात्मक अध्ययन भी चल रहा था। किसे ऑस्कर में भेजा जाना चाहिए था… किसे नहीं। गर्म चाय अब गले से नीचे उतर रही थी। हर कोई अपने आप को समेट रहा था। कुछ ऐसे लोग भी थे, जो न खुद सिमट रहे थे न ही किसी को सिमटने दे रहे थे। लेकिन मामला सिमटा। आखिर में अविनाश भाई अपनी कार में लोगों को भरकर महिपालपुर की तरफ रवाना हुए और हम भी अपने घर की तरफ। हम मतलब मैं और गिरिजेश। सुना है इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के सामने की चाय वाला अविनाश भाई का स्टैचू लगवाने वाला है, क्योंकि उसे इस तरह का ‘बिजनेस’ कम ही मिलता है।

आखिर में अहम बात – अविनाश भाई, आपको आधिकारिक बधाई। इतने शानदार कार्यक्रम के आयोजन में अगर अगली बार भी आप मेरा नंबर भूल जाएं तो कोई शिकायत नहीं है, बस डायरेक्ट या इनडायरेक्ट खबर पहुंचवा दीजिएगा। और हां रही बात हारमोनियम की, तो उसका तो जिक्र ही नहीं करना है।

(शिवेंद्र कुमार सिंह। वरिष्‍ठ खेल पत्रकार। एबीपी न्‍यूज (स्‍टार न्‍यूज का नया नाम) के विशेष संवाददाता। इलाहाबाद की पैदाइश और इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय से पढ़ाई-लिखाई। अमर उजाला से पत्रकारीय करियर की शुरुआत। जी न्‍यूज में भी रहे। हाल ही में उनका नॉवेल विजय चौक काफी चर्चा में रहा। इससे पहले ज्ञानपीठ से छपी किताब यह जो है पाकिस्‍तान ने अच्‍छी लोकप्रियता हासिल की। उनसे kumarsingh.shivendra@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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