हमारे खिलाफ आरोप-पत्र है राजकुमार गुप्ता का डर

♦ प्रकाश के रे


बायें से राजकुमार गुप्‍ता, सुभाष कपूर और आनंद एल राय

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में जहां सिनेमा मनोरंजन का एक समृद्ध और सम्मानित कला-साधन है, कोई फिल्मकार अगर यह कहता है कि उसे राजनीतिक-सामाजिक विषयों पर फिल्म बनाने में डर लगता है, तो इस पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। सिने बहसतलब 2013 में एक सत्र में राजनीतिक फिल्में बनाने में होने वाली परेशानियों पर बात करते हुए लेखक-निर्देशक राजकुमार गुप्ता (आमिर, नो वन किल्ड जेसिका, घनचक्कर) के इस बयान को मैं हम दर्शकों के खिलाफ आरोप-पत्र के रूप में देखता हूं। उनका कहना था कि यह अंदाजा लगाना बहुत कठिन होता है कि कब कोई समूह या संगठन किसी फिल्म पर पाबंदी की मांग करने लगे। यह लगातार देखा गया है कि पाबंदी की मांगें अक्सर हिंसक रूप ले लेती हैं। किसी फिल्म का समय पर प्रदर्शित नहीं हो पाना उस फिल्म से जुड़े लोगों के लिए बहुत नुकसानदेह साबित होती है। हमारे लिए यह कह देना बहुत आसान होगा कि राजकुमार गुप्ता या उनके जैसा सोचने वाले अन्य फिल्मकार बहाने बना रहे हैं। शायद यह बात कुछ हद तक सही भी हो सकती है, लेकिन जब हम फिल्मों पर लगातार उठते रहने वाले विवादों को देखें, तो हालात बहुत खराब नजर आते हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि जागरूक नागरिक के रूप में हमारी भूमिका बहुत शोचनीय है।

आरक्षण, विश्वरूपम, मद्रास कैफे आदि से जुड़े विवादों से अभी पीछा भी नहीं छूटा था कि पिछले दिनों दो ऐसी घटनाएं सामने आयीं, जो रचनात्मक समाज के हमारे मंसूबों को बहुत नुकसान पहुंचा गयीं। 21 अगस्त को पुणे फिल्म संस्थान के छात्रों ने डॉ नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के विरोध में एक कार्यक्रम आयोजित किया था, जिसमें आनंद पटवर्द्धन की फिल्म के प्रदर्शन और कबीर कला मंच के कलाकारों द्वारा गायन होना था। इस कार्यक्रम पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंधित दक्षिणपंथी छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने हिंसक हमला किया और कई छात्रों को घायल कर दिया। इसी तरह आठ सितंबर को हैदराबाद में कश्मीर से संबंधित फिल्म फेस्टिवल पर विश्व हिंदू परिषद और भाजपा युवा मोर्चा के लोगों ने हमला किया और फिल्मकारों तथा आयोजकों से मारपीट और तोड़फोड़ की। इन फासीवादी हमलों के विरुद्ध छिटपुट विरोधों के आलावा कोई खास आवाज नहीं उठी। फिल्मों के खिलाफ जो तमाशे हुए, उन्हें हम टीवी पर देखकर या अखबार में पढ़ कर चुप हो गये।

फिल्मों के बारे में सर्वोच्च न्यायालय का साफ आदेश है कि सेंसर बोर्ड की अनुमति के बाद उनके प्रदर्शन को नहीं रोका जाना चाहिए। लेकिन राजनीतिक दबाव में सरकारें कठोर कदम नहीं उठातीं। ऐसे में जागरूक दर्शकों, जिन्हें सिनेमाकर्मियों और फिल्म-उद्योग से अनेक शिकायतें रहती हैं, को अपनी जिम्मेवारी निभानी चाहिए। अपने आसपास के ऐसे लोगों से संवाद और बहस के माध्यम से यह कोशिश करनी चाहिए कि वे बहकावे में आकर किसी संगठन के स्वार्थपूर्ण एजेंडे को पूरा करने में न लगें। हमें सरकारी-तंत्र पर भी यह दबाव बनाना चाहिए कि वह राजनीतिक फायदे के चक्कर में फिल्म और उसके दर्शकों के अधिकार को नुकसान न पहुंचाये। चार्ली चैपलिन ने कहा था कि अच्छी फिल्में अच्छे दर्शक बनाते हैं। मेरी समझ से सिनेमा और उसकी विषय-वस्तु की अच्छी समझ ही अच्छा दर्शक बनने के लिए पर्याप्त नहीं है, बल्कि हमें बतौर नागरिक भी बेहतर होना होगा। अगर ऐसा न हुआ, तो सिनेमा पारादिसो के पादरी की तरह हर चौक पर कोई-न-कोई घंटी हिलाता हुआ बैठा होगा, जिसकी टन-टन की कर्कश आवाज हर राजकुमार गुप्ता को डराती रहेगी। तब राजनीतिक फिल्में बनना-देखना तो छोड़ दीजिए, राजनीति बतियाने की भी जगह हमारे पास नहीं होगी।

(प्रकाश कुमार रे। सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता के साथ ही पत्रकारिता और फिल्म निर्माण में सक्रिय। दूरदर्शन, यूएनआई और इंडिया टीवी में काम किया। फिल्म शोधार्थी भी। फिलहाल वे वी शांताराम पर शोध में लगे हैं और बीआर चोपड़ा पर केंद्रित उनकी पुस्तक जल्‍दी ही प्रकाशित होने वाली है। उनसे pkray11@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)

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