एक छाता सा छाता है, कुछ खुशी सी खुशी है

♦ उमेश पंत

कई लोग आपकी जिंदगी के वाक्‍यांशों में किसी कोमा की जगह आते हैं। आप थोड़ी देर ठहरते हैं और जब आगे बढ़ते हैं, तो देखते हैं वो वाक्य उनपर रुकने के बाद जैसे बिल्कुल बदल गया हो।

रीन ड्राइव के इर्द-गिर्द तीन दोस्तों के साथ भटकते हुए अचानक 26-27 साल का वो लड़का ठीक उसी कोमा की तरह आया। ओ मैन वट्स अप? अपने विदेशी लहजे में उसने कहा। मेरे दोस्त के परिचित, मेरे लिए अजनबी, उस लड़के के हाथ में एक छाता था। सफेद रंग का हरे डॉट्स वाला वो छाता, जिसे देख के लग रहा था कि अब तक न कोई बरसात और न ही कोई धूप उसे छू सकी है। एकदम नया छाता। उस लड़के ने अगले दो मिनट में हम तीनों से दोस्ती कर ली थी। ऐसे जैसे दोस्ती करना मुस्कुराने की तरह हो। अगले दस मिनटों में वो हम तीनों की तकरीबन पंद्रह तस्वीरें खींच चुका था, हमसे पूछ चुका था कि हम क्या करते हैं, हमें बता चुका था कि वो क्या करता है। उसके बारे में हम ये जान चुके थे कि वो एक शौकिया फोटोग्राफर है, वैबसाइट्स डिजाइन करता है। सड़कों पे घूमना उसे पसंद है, जब मन किया गांवों में तस्वीरें खींचने निकल पड़ता है। विदेशों में रहा है इसलिए किसी से भी खुलकर बात कर लेता है। मां-बाप विदेश में रहते हैं, पर उसे उसका मुंबई ज्यादा पसंद है।

मनमौजी है। इसलिए घर, परिवार, नौकरी सब छोड़कर यहां लौट आया है। लड़कियां उस पर बहुत जल्दी फिदा जाती हैं और हम तो उन चंद मिनटों में उसके कायल हो ही गये थे। जिस दोस्त ने उसके बारे में बताया, वो खुद उससे कभी कहीं भटकता हुआ इंटरनेट के गलियारे में मिला था और आज इस तरह औचक हम भी उससे मिल चुके थे। जाते हुए उसने वो छाता मेरे दोस्त के हवाले कर दिया। और अंग्रेजी आत्वविश्वास से भरे फिरंगी लहजे में बोला, गिफ्ट इट टु सम गर्ल मैन। लाइक समवन गिफ्टेड इट टु मी। कहकर वो मरीन ड्राइव के पास गुजरती उन सड़कों में कहीं गुम हो गया। रास्ते में जैसे अब बस उसकी मुस्कुराहट रह गयी हो।

मरीन ड्राइव से पैदल चलते हुए काफी आगे निकल आये थे हम। कोलाबा जाने का मन बन चुका था। टैक्सी की खोज में एक सिग्नल के बाद दूसरे सिग्नल, दूसरे के बाद तीसरे, लाल, हरे सिग्नल, सिग्नलों पर पैसे मांगते बच्चे, फुटपाथ पर बेफिक्र चलती फिक्रदार बूढ़ी आंखों वाली औरतें, कई सारी गाड़ि‍या, कई सारी टैक्सियां, सब कुछ पीछे छोड़ते हुए हम चलते जा रहे थे। उस एक टैक्सी की तलाश में जो हमें कोलाबा तक छोड़ दे। मुंबई में अक्सर हम ऐसी टैक्सियों की ही तो तलाश करते हैं, जो हमें अपनी अपनी तयशुदा पर अजनबी मंजिलों तक पहुंचा दे।

इसी उम्मीद में भीड़ से भरे इस शहर में उम्रों के न जाने कितने सिग्नल पार कर देते हैं कि एक लम्‍हा आएगा, जब सपनों के देश पहुंचाने वाली वो टैक्सी आएगी और सारी हताशाओं को, सारे संघर्षों को कहीं पीछे छोड़ जाएगी, किसी मरीन ड्राइव के किसी नरिमन पॉइंट में। फिर किसी रात वो संघर्ष क्वींस नेकलेस के इर्द गिर्द फैले उस अंधेरे की तरह लगेंगे, जिसके बीच में कहीं दूर तक उम्मीदों की कई स्ट्रीट लाइटें जगमगा रही होंगी। उस अंधेरे की तरह, जिससे कुछ दूर उन आकाश को छूती इमारतों में लगे सैकड़ों नीओन लाइट वाले होर्डिंग्स जगमगा रहे होंगे और उस अंधेरे के अतीत से समुंदर में अपने वर्तमान की रंगीन रोशनी बिखेर रहे होंगे। जब सुबहें अपने हक में होती हैं, तो आंखें रातों के अंधेरे में भी रोशनी के रंग ढूंढ़ ही लाती हैं। रातों के अंधेरों के बीच वक्त में कहीं छिटकी हुई उन रंगीन रोशनियों से मिलाने वाली टैक्सी का एक लंबा इंतजार भर है मुंबई में जीना।

खैर जब कई टैक्सी वाले कोलाबा पहुंचाने से इनकार कर चुके थे, एक खाकी कमीज पैंट पहने, चेहरे पर मुसलमानी दाढ़ी ओढ़े आदमी ने दूर से हमें बुलाया। फीएट में चलना है तो मैं छोड़ देता हूं। अपनी रूखी सी आवाज में इतना सा कहकर वो आदमी काले रंग की उस फीकी पड़ चुकी टैक्सी की ड्राइविंग सीट पर जाकर बैठ गया। कुछ देर में हम टैक्सी में थे। पद्मिनी टैक्सी है न ये? मैंने पूछा तो उस आदमी ने हां में बस सर हिला दिया। फिर थोड़ी देर में खुद ही कहना शुरू किया अब तो बंद हो रही है ये। तो क्या करोगे? मैंने जानना चाहा। भंगार में बेच देंगे। उसका बित्ता सा जवाब। फिर? मैंने आगे जानने की गरज से पूछा। फिर देखेंगे। परमिट है अपने पास। दो लाख का तो बिक ही जाएगा। नयी टैक्सी के लिए तो लाइसेंस वालों की लंबी लाइन लग रही है अब। देखते हैं क्या होगा… और फिर एक खामोशी।

पिछले 30-32 सालों से इस पुरानी मुंबई की पहचान पद्मिनी टैक्सी को चला रहे उस टैक्सी वाले को उसे भंगार में बेचते कैसा लगेगा? इसी टैक्सी में न जाने कितने तरह के लोग मिले होंगे न उसे। कितनी तरह की बातें हुई होंगी। कितने तरह के सवालों के जवाब दिये होंगे उसने। कितने तरह के सवालों के जवाब भी तो मिले होंगे। वो सारे चेहरे वो सारे सवाल-जवाब इस पद्मिनी के साथ भंगार वाले को बेच पाएगा क्या वो टैक्सी वाला? वो छोटी सी काली टैक्सी कितने में बिक पाएगी? उस टैक्सी में मिले अनुभवों की क्या कोई कीमत नहीं होगी? सड़क पर चलता फिरता वो घर क्या कुछ ही दिनों में भंगार हो जाएगा? खुद से किये कई बेवजह बेमानी से सवाल भी जैसे टैक्सी पर लगे उस ब्रेक के साथ अपनी जगह रुक जाते हैं और बाहर इंतजार में बैठा कोलाबा कॉजवे का शोर उस रुकने की जगह से उंगली पकड़कर आगे लेकर चला आता है।

सवाल वक्त की तरह पीछे छूट जाते हैं या फिर उस गली की तरह जिसका होना तब तक ही अहमियत रखता है, जब तक उससे बाहर निकलने का रास्ता मालूम न हो जाए।

कोलाबा में मुंबई अपने असली रंग में दिखाई देता है। कॉजवे से गुजरते हुए उस संकरी सी गली में न जाने कितनी दुकानें, उन दुकानों में न जाने कितनी चीजें, उन चीजों को बेचते दुकानदार, दुकानदारों से मुखातिब खरीददार, देशी-विदेशी, मराठी, बंगाली, बिहारी चेहरे और हर चेहरे से उनका शहर गायब। हर चेहरे में झलकता मुंबई में होने का नूर। सपनों के पास होने का रंग। चमकदार मुंबई, मुस्कुराता मुंबई। लिओपोर्ट कैफे की दीवारों पर लगी गोलियों के निशानों को देखकर भी अनदेखा कर एक दूसरे के आगोश में खोया मुंबई। जैसे शराब के नशे में भी थोड़ा मुंबई घुल गया हो। मुंबई में होना भी नशे में होने जैसा ही तो है।

वो छाता। सफेद रंग पर हरे डॉट्स वाला छाता। उस मुस्कुराते लड़के का दिया वो छाता मेरे साथ बैठे दोस्त एक विदेशी लड़की को दे आते हैं, जो हमारी टेबल से कुछ दूर लगे टेबल पर बैठी मुस्कुरा रही है। मैं दूर से अपने दोस्तों को उसके पास जाकर बात शुरू करते हुए देखता हूं, फिर बदले में उन्हें मिली मुस्कुराहट को देखता हूं। बस तीस सेकंड की बातचीत और वो वापस लौट आते हैं। इतने खुश जैसे उस मुस्कुराते लड़के का दिया छाता इस मुस्कुराती लड़की के हवाले करके न जाने क्या मिल गया हो। इस चंद सेकंड्स के संवाद में एक मासूमियत है, कहीं कोई बुरी भावना नहीं छुपी है। कम से कम इनकी खुशी देखकर तो यही लगता है। मुस्कुराहटें झूठ हो सकती हैं पर खुशी झूठी नहीं होती। हो सकता है कि ये बस भ्रम हो। पर कई बार जो दिखता है उसे उसी तरह से मान लेना चाहिए जिस तरह से वो हो रहा है, इससे उस होने की मासूमियत बनी रहती है।

Umesh Pant(उमेश पंत। सजग चेतना के पत्रकार, सिनेकर्मी। सिनेमा और समाज के खास कोनों पर नजर रहती है। मोहल्‍ला लाइव, नयी सोच और पिक्‍चर हॉल नाम के ब्‍लॉग पर लगातार लिखते हैं। फिलहाल यूपी से ग्रामीण पाठकों के लिए निकलने वाले अखबार गांव कनेक्‍शन से जुड़े हैं। उनसे mshpant@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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