मेनस्ट्रीम सिनेमा अपनी खामियों के बावजूद ताकतवर है

सिने बहसतलब 2013 : दूसरा सत्र
विषय – हिंदी सिनेमा में बदलाव: एक कदम आगे, दो कदम पीछे
विषय प्रवर्तन – अजय ब्रह्मात्‍मज
वक्‍ता – अजय बहल, राजकुमार गुप्ता, सुभाष कपूर, आनंद एल राय
मॉडरेटर – मिहिर पंड्या

♦ अजय ब्रह्मात्‍मज

दलाव में ऐसा कोई बॉर्डर लाइन नहीं है। आप इंडस्ट्री में आये नये लोगों को सोच कर देखिए तो पाएंगे कि उनका बॉलीवुड से कोई पुश्तैनी नाता नहीं है, यह एक बदलाव है। शुक्रवार को रिलीज दो फिल्में ‘द लंच बॉक्स’ और ‘फटा पोस्टर निकला हीरो’ बदलाव के उदाहरण के रूप मे हैं। काफी वैक्यूम आया है पिछले समय में, भोजपुरी सिनेमा ने यह वैक्यूम काफी हद तक भरा है। बदलाव तो अब यहां तक है कि जो विदेशी रोमांस था, वह अब शुद्ध देसी रोमांस हो गया है। करण जौहर द लंच बॉक्स जैसी फिल्मों से जुड़ रहे हैं। ये लोग अब ऐसी फिल्मों को हाथों हाथ ले रहे हैं और यह एक बड़ा बदलाव है। ऐसी फिल्मों को देखने के लिए अब दर्शक वर्ग भी तैयार हो रहा है, अब ऐसी कहानियां स्वीकार की जा रही हैं क्योंकि सिनेमा मुंबई-दिल्ली जैसे महानगरों से निकलकर आगे भी पहुंच रहा है।

♦ आनंद एल राय

मैं विषय को लेकर काफी संशय की स्थिति में था और काफी पीछे जा रहा था, क्या पहले के लोगों के दिमाग में बिजनेस को लेकर लड़ाई थी? मुझे ऐसा लगता है कि हर टाइम पर कुछ न कुछ आ रहा है और फिल्ममेकर जो बनाना चाह रहे हैं, वो बना रहे हैं।

♦ अजय बहल

सात सालों के स्ट्रगल के बाद भी जब मुझे कोई फाइनेंसर नहीं मिला तो फिल्म ‘बीए पास’ बनाने के लिए मेरी मां ने मुझे पैसे दिये। दिल्ली का एक मिक्स कल्चर है और यहां के सबजेक्ट पर फिल्म बनाना चुनौती है। आज के टाइम में रिलीज एक बहुत बड़ा चैलेंज है। मुझे फिल्म को रिलीज कराने में बहुत सी कठिनाइयां झेलनी पड़ी। फिल्म का बोल्ड होना सबसे बड़ी कठिनाई थी। सिनेमा अब बदल चुका है। करण जौहर और किरण राव काफी चालाक लोग हैं, वो अब जान-बूझकर कर बदल रहे हैं। उन्हें अब भी आर्ट नहीं, पैसा नजर आ रहा है। दर्शक अब काफी बदल गया है। इंडस्ट्री में पिछले तीन महीनों में जो बदला, वो पिछले छह साल में नहीं बदला। अब कंटेंट पर पकड़ आयी है।

♦ सुभाष कपूर

स्सी का दशक हिंदी सिनेमा का काला दशक है। कई सारी वजहों से – आप उन्‍हें समझते हैं। 2009 में सुना कि रिसेसन है, मैंने उसी पर फिल्म बना दी। मैं बड़ा बोरिंग और गंभीर सा था और हूं पर मैं कॉमेडी करता हूं, तो ये सवाल मेरे लिए भी है। जब मंटो को पढ़ा तब जाकर कुछ समझ में आया। मंटो ने बड़ा डार्क ह्यूमर लिखा है। जब ये सवाल होता है कि ये तथाकथित कमर्शियल सिनेमा क्यों बन रहा है तब मैं अपनी जमात से परेशान होता हूं। क्या कभी सुना है कि किसी फिल्ममेकर ने किसी को द लंच बॉक्स या बीए पास जैसी फिल्म बनाने से मना किया हो? मेनस्ट्रीम सिनेमा अपनी खामियों के बावजूद ताकतवर है, वो लोगों की भावनाओं को समझता है और वही परोसता है। कहानी में नवीनता आये, उसका स्वागत है। असल में सिनेमा का परंपरागत फॉर्मूला समाज का फॉर्मूला है। हिंदी सिनेमा एकमात्र सिनेमा है, जो हॉलीवुड की तरह सस्टेन कर रहा है। किसी को महान बताने से कुछ नहीं होगा, जरूरत मेनस्ट्रीम तय करता है। स्क्रिप्ट को नायक बनाने वाले रामगोपाल वर्मा हैं। फिल्म एक धंधा है और इस सच को जितनी जल्दी मान लें, अच्छा होगा। यहां बैठे हम सभी ने किसी न किसी एक शुक्रवार को खुद को साबित किया है।

♦ राजकुमार गुप्ता

फिल्मों को लेकर हमलोग काफी जजमेंटल हो जाते हैं। फिल्मों में सबसे महत्वपूर्ण दर्शक है। दर्शक के दायरे में ही हम फिल्म बनाते हैं। आज के सिनेमा में अलग कहानियों को कहने का मौका मिल रहा है, यह एक बदलाव है।

दिगंत कुमार और अमित हिसारिया की रिपोर्ट

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *