आज व्‍यवसाय तय कर रहा है गीतों की जबान

सिने बहसतलब 2013 – पहला दिन, तीसरा सत्र
विषय – हिंदी सिनेमा के गीत : नयी भाषा, नये मुहावरे
विषय प्रवर्तन – राजकुमार केसवानी
वक्‍ता – पीयूष मिश्रा, इरशाद कामिल, राजशेखर, रविकांत, दुष्यंत
मॉडरेटर – चंदन श्रीवास्तव


[कैमरा प्रकाश के रे का, क्लिक भी उन्‍हीं की]

♦ इरशाद कामिल

‘जिसको खुदा नवाजे, उसको अता करे… सबको नहीं आते भाषा-मुहावरे’ … मेरी कविता पहल में नहीं छपी, तो मैं गीतकार बन गया। जब कोई गीत बड़ा तूफानी हो जाता है, तो उसके कसीदे नहीं पढ़े जाते और किसी एक वाक्य पर ही कसीदे पढ़े जाते हैं। बुद्धिजीवी तबका अक्सर उदासीन हो जाता है। ये चिंता करते हैं पर तारीफ करने से कतराते हैं। आज के समय में दबाव बहुत ज्यादा है, हर किसी पर दबाव है। आज का गीतकार अपने गीत को बचा रहा है। अगर गीत का पहला ड्राफ्ट देख लिया जाए या वही पास हो जाया करे तो बड़ी बात है, पर बिजनेस के इस समय में बहुत दबाव है। गीत के पहले ड्राफ्ट को बचाना आज के समय की सबसे बड़ी चुनौती है। भाषा हमेशा बदली है, उसी तरह समाज के साथ-साथ गीत भी बदले हैं। आज की भाषा असल में कबीर की सधुक्कड़ी भाषा है। आज का गीतकार बंदिशों के बावजूद लिखता है। हां, आज के गीत की भाषा व्यवसाय पर निर्भर है – जैसे डाउनलोड, रिंगटोन। आज के गीतकार का संघर्ष काम को खराब होने से बचाने का संघर्ष है। आज का गीतकार विचार रखता है, उसे एक्सप्लेन नहीं करता। यह बहुत बड़ा बदलाव है।

♦ पीयूष मिश्रा

गीतों का अनफोल्ड होना जरूरी है। आज की यह जरूरत भी है कि कुछ गाने शहरीकरण की वजह से सिर्फ नाचने के लिए लिखे जा रहे हैं और गाये भी जा रहे हैं, उसे सुनिए नहीं बस उस पर नाचिए। गीत संगीत का नहीं स्क्रिप्ट का हिस्सा होते हैं। भाषा नहीं बदली, पर मुहावरे चुस्त हुए हैं। 50 के दशक का ‘चील चील चिल्ला के’ मेरी नजर में सबसे अब्सर्ड सांग है। एवोल्यूशन हमेशा होता है और यह अच्छी बात है। एक बात और कि ग्रैंड मस्ती जैसी फिल्म वही देखकर हिट करता है, जो रेप पर चिल्लाता है। मेरा तो हमेशा से पहला ड्राफ्ट स्वीकार हुआ है, गुलाल फिल्म के गीतों पर तो युवाओं ने ही मुझे सरप्राइज किया। यह जेनरेशन सब समझती है… कमी हममें है कि हम समझाने की कोशिश नहीं करते। आज की जबान MTVian जबान है। मेरे लिए मजरूह गीतों की लिस्ट में सबसे ऊपर हैं।

♦ राजशेखर

इंडस्ट्री में नया ट्रेंड हमेशा से रहा है। बदलाव देखना है तो आज का सूफी ट्रेंड देखिए, मुझे समझ नहीं आता कि अचानक से इतने मौला कहां से आ गये। यह वही समाज है, जो सबसे असहिष्णु भी कहा जाता है और यही आज मौलाओं की डिमांड कर रहा है। मौलाओं के ऊपर करीब 72 गीत हैं और मुझे 26 का पता है। नये गीत, नये शब्द की हमेशा डिमांड रही है और चलती रहेगी।

♦ दुष्यंत

सारी लड़ाई वजूद की है। हम अपने जमाने से निकलना ही नहीं चाहते। गीत कहानी का हिस्सा हो, इससे बड़ी चुनौती है कि फिल्मों में गीत बचे रहें। अब बिना गीतों वाली फिल्मों का ट्रेंड चल निकला है। इस माहौल में जब गीत बचेंगे तभी कहानी का हिस्सा बनेंगे।

दिगंत कुमार और अमित हिसारिया की रिपोर्ट

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *