मनोरंजन के साथ ही जिम्‍मेदारियों को समझे सिनेमा

♦ डॉ विभावरी

सिनेमा से मेरा रिश्ता उस वक्त शुरू हुआ, जब मैं छठवीं-सातवीं कक्षा में पढ़ती थी। अक्सर ऐसा होता था कि घर के सभी लोग टेलीविजन पर फिल्म देखते और मुझे पढ़ाई करनी पड़ती थी। यानी कि फिल्म देखने का मन होते हुए भी उसे न देख पाने की तकलीफदेह मजबूरी। इस तरह फिल्मों से मेरा जो शुरुआती रिश्ता विकसित हुआ या यों कहें कि विकसित किया गया, वह लगभग विरोध का था। कुछ ऐसा… मानो फिल्में पढ़ाई की राह का रोड़ा हैं। सिनेमा को लेकर लगभग इसी तरह की सोच हमारे जनमानस में पलती रही है। पर आज लगता है कि सिनेमा अपने विकासक्रम में इस सोच को थोड़ा पीछे छोड़ चुका है। इस बात का अनुभव कई बार पहले भी हुआ है। कुछ दिनों पहले एक बार फिर मैं इस अनुभव से गुजरी।

दरअसल पिछले दिनों जेएनयू के मेरे सीनियर प्रकाश के रे का फोन आया कि ‘सिने बहसतलब’ में एक सत्र के संचालन के लिए अविनाश को उन्होंने मेरा नाम सुझाया है। मैं अविनाश से बात कर लूं। अविनाश से बात हुई और तय हुआ कि ‘सिनेमा में स्त्रियों की नयी जगह’ पर केंद्रित सेशन को मॉडरेट करना है। इस सेशन में कुछ अभिनेत्रियों के अनुभवों से गुजरते हुए ‘सिनेमा में स्त्रियों की नयी जगह पर’ बात करनी थी। दो दिन तक चलने वाले ‘सिने बहसतलब 2013’ में यह पहला ही सत्र था। स्वरा भास्कर और शिल्पा शुक्ला के साथ शुरू हुए इस सेशन में कुछ देर बाद उषा जाधव और विशाखा सिंह भी जुड़ गयीं।

दूसरा सेशन ‘हिंदी सिनेमा में बदलाव: एक कदम आगे, दो कदम पीछे’, तीसरा सेशन ‘हिंदी सिनेमा के गीत: नयी भाषा, नये मुहावरे’ और चौथा पीयूष मिश्रा के गीतों की प्रस्तुति से जुड़ा था।

दूसरे दिन के दो सेशन ‘सिनेमा में कंटेंट और कलेक्शन के द्वंद्व’ और ‘भारत में राजनीतिक सिनेमा के रोड़े’ विषय पर केंद्रित थे।

पूरा कार्यक्रम बेहतरीन तरीके से आयोजित और अपने आप में अनूठा था। इसका सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि इसने सिनेमा के ज्यादातर सृजनात्मक आयामों को न सिर्फ खुद में समेटा, बल्कि संवाद के जरिये उसे समझने की कोशिश भी की। सिनेमा से जुड़े विभिन्न लोगों के विचारों को जानना और समझना अपने आप में विचारोत्तेजक था।

सिनेमा में स्त्रियों की नयी जगह से संबंधित विचार विमर्श में स्वरा भास्कर मानती हैं कि स्त्रियों की विडंबना को फिल्में सिर्फ रिफ्लेक्ट करतीं हैं और करती रहेंगी। सिनेमा के गीतों पर बात करते हुए इरशाद कामिल कहते हैं कि समाज की भाषा ही गीतों की भाषा है और समाज की भाषा के बदलाव के साथ साथ गीतों की भाषा बदलती जाती है। इसी तरह निर्देशक सुभाष कपूर जब ये बात स्वीकार करते हैं कि फिल्में एक धंधा हैं और इस बात को हम जितनी जल्दी मान लें, उतना अच्छा होगा – तो ये बातें फिल्म निर्माण के अलग-अलग पहलुओं से जुड़े व्यक्तियों का नजरिया दर्शाती हैं। सिनेमा की निर्माण-प्रक्रिया पूरी होने के बाद दर्शक इसका सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू बन जाता है, जो निश्चित तौर पर फिल्मों की व्यावसायिक सफलता का लक्ष्य है। जद्दोजहद की शुरुआत तब होती है, जब हम यह समझने की कोशिश करते हैं कि ऐसा क्या है, जो ‘लंच बॉक्स’ जैसी फिल्म को खास बनाता है और सौ करोड़ का व्यवसाय कर चुकी ‘ग्रैंड मस्ती’ उसके सौंदर्य को छू भी नहीं पाती। बेशक सिनेमा एक व्यवसाय है… मनोरंजन का साधन है… परंतु इन सबके साथ उस पर कुछ जिम्मेदारियां भी हैं, जिसे हमें समझना पड़ेगा। विशुद्ध व्यावसायिक नजरिये से बनायी गयी फिल्मों की सबसे बड़ी दिक्कत यह होती है कि सामान्यतः वे समाज की बनी बनायी सोच का ही प्रतिनिधित्व करने की कोशिश करती हैं और उनका मकसद दर्शकों को ‘फील गुड’ कराना होता है। जबकि हम सब इस बात से वाकिफ हैं कि हमारे समाज की एक बड़ी सच्चाई वह है, जिसे देखकर हम खुश नहीं हो सकते।

आज का सिनेमा इस लिहाज से खास है कि आज हमारे पास नयी ऊर्जा और अंतर्दृष्टि से लबरेज फिल्मकारों और कलाकारों की एक पूरी पीढ़ी मौजूद है, जिनमे से कई ‘सिने बहसतलब 2013’ का हिस्सा थे। इस कार्यक्रम में पीयूष मिश्रा के गीतों को सुनते हुए यह बात बहुत ही शिद्दत से महसूस की जा सकती थी कि उनके गीत सिर्फ सामाजिक सोच की ‘फील गुड’ अभिव्यक्ति मात्र नहीं हैं बल्कि, बहुत ही आहिस्ता और धारदार तरीके से वे सामाजिक विसंगतियों की तरफ इशारा करते चलते हैं।

‘राजनीतिक सिनेमा के रोड़े’ विषय पर बोलते हुए अरविंद गौड़ ने एक महत्त्वपूर्ण सवाल उठाया कि बनने के क्रम में अक्सर सिनेमा से जिंदगी गायब और मार्केट हावी क्यों हो जाता है? फिल्मकारों का इस पर सीधा जवाब हो सकता है कि फिल्में बनाना व्यवसाय है इसलिए! इसके अलावा सिनेमा एक कलेक्टिव आर्ट है। इसके हर पक्ष को समायोजित करके बेहतर फिल्म बनाना ही अपने आप में मुश्किलों भरा काम है। लेकिन हमें यह भी समझना चाहिए कि कलाओं पर न सिर्फ अपने समाज और परिवेश के यथार्थपरक अभिव्यक्ति की जिम्मेदारी होती है बल्कि पाठकों और दर्शकों की रुचियों के परिष्कार की भी। प्रियदर्शन ने इस सेशन में ‘गर्म हवा’ का जिक्र करते हुए यह स्पष्ट किया कि यथार्थ को ज्यों का त्यों रख देना ही महत्त्वपूर्ण नहीं है। विभाजन की त्रासदी पर बनी इस फिल्म का संवेदनात्मक धरातल ‘गदर’ जैसी विशुद्ध व्यावसायिक फिल्म से बिल्कुल अलग है। हिंसा और बर्बरता को परदे पर दिखाये बगैर ‘गर्म हवा’ विभाजन की त्रासदी को उसकी पूरी गंभीरता के साथ खुद में समाहित किये हुए है। निश्चित रूप से फिल्मकार की सृजनात्मक स्वतंत्रता का पूरा सम्मान होना चाहिए। लेकिन इस सृजनात्मक स्वतंत्रता को अराजक होने से बचाना भी फिल्मकार का ही दायित्व है। हमें बहस के केंद्र में उन दर्शकों की अपेक्षाओं को भी रखना पड़ेगा, जो मीनिंगफुल सिनेमा में भरोसा रखते हैं।

‘कंटेंट और कलेक्शन के द्वंद्व’ पर बोलते हुए अनुभव सिन्हा ने बहुत महत्त्वपूर्ण बात कही कि आज केतन मेहता, गोविंद निहलानी और श्याम बेनेगल के कंटेंट को स्वीकारा जा रहा है। कलेक्शन की बात करते हुए उन्होंने बताया कि एक करोड़ की लागत से बनी फिल्म को रिलीज करने की लागत चार करोड़ होती है। मतलब एक करोड़ की लागत से बनी फिल्म की कुल लागत रिलीज के वक्त पांच करोड़ हो जाती है। इस तरह लड़ाई सिर्फ कंटेंट और कलेक्शन की ही नहीं है बल्कि, कंटेंट और ऑडियंस की भी है।

हालांकि सवाल और भी थे और आगे नये सवाल भी आते रहेंगे लेकिन इन सवालों से बचने के बजाय इनका ‘बहसतलब’ होना ज्यादा जरूरी है ताकि फिल्मकार, सिनेमा और दर्शकों के बीच लगातार संवाद कायम हो सके।

(विभावरी। हिंदी साहित्‍य और सिनेमा के बीच स्‍त्री दृष्टि का अंतर विषय पर जेएनयू से पीएचडी। सिनेमा और साहित्‍य के अंतर्संबंधों के अध्‍ययन में विशेष रुचि। विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में इस विषय पर लेख प्रकाशित। फिलहाल गौतम बुद्ध विश्‍वविद्यालय में हिंदी साहित्‍य की प्राध्‍यापिका। उनसे vibhavari2080@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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