हम सब ग्‍लोबल गांव के बाशिंदे होते जा रहे हैं

♦ विनय भरत

ल अपने एक मित्र से केएफसी में बैठ कर चर्चा निकल पड़ी। मैं शाकाहारी हूं, तो सिर्फ वहां कोल्ड-ड्रिंक्स पीता रहा और मेरा मित्र बड़े आराम से फ्राइड चिकेन नोचता रहा। और मैं खुन्नस में उलझ गया।

सच कहें तो ग्लोबलाइजेशन का सबसे ज्यादा फायदा ऐसी ही अमेरिकी आधारित कंपनियों ने उठाया है। आने वाले समय में पूरे विश्व और खास कर तीसरी दुनिया (अगर इस जैसी कोई चीज है) में लोगों की न सिर्फ खान-पान एक सी होगी, बल्कि शरीर की खुशबू (बदबू) भी एक सी होगी।

आज रांची में बैठा युवक भी जिलेट जैसा महकता है, और लॉस एंजेल्स में बैठा युवक भी। आज रांची का बच्चा भी लेविस और फ्लाइंग मशीन की जींस पहनता है और अमेरिका का भी। तो लिबास भी एक सा हो गया है। सिर पर लगे जिलेट जेल और पैर में पहने रिबॉक जूते तक एक से हो गये हैं। बालों के रंग भी इस बात पर निर्भर नहीं हैं कि आप द्रविड़ि‍यन हैं या कि क्वाकोशियन। अमेरिकन हेयर डाई से हमारे बाल भी बिल्कुल उत्तरी ध्रुव और पश्चिमी अक्षांश वालों जैसी कर दी जा रही है।

आबो-हवा में हवा का तो नहीं मालूम, पर आब (पानी) का स्वाद भी Kinley पीने वाले रांचीवासी लगभग वही पा रहे हैं, जो अमेरिका में बैठे कोका-कोला वाले लोग। (शायद ओजोन लेयर में हो रहे छिद्र से हवाएं भी एक जैसी गर्म रहने लगे, इसमें भी अब आश्चर्य नहीं लगता…)

रही बात जबान की तो BPO & EPO में काम करने वाले मेट्रो के युवाओं ने न सिर्फ अमेरिकन घड़ी के अनुसार अपने जीवन शैली को ढाल लिया है, बल्कि उनके उच्चारण तक को Neutral accent के नाम पर अमेरिकन किया जा रहा है।

घर में सबसे अहमियत दिया जाने वाले बुद्धू बक्से (टीवी) पर सीरियल के कांसेप्ट अमेरिका से सीधे-सीधे बौरो किये जा रहे हैं – जैसे, “इंडियन आइडोल”, “बिग बॉस” इत्यादि। ऐसे कथानक तैयार किये जा रहे हैं, जो लिबास तो भारतीय ही पहन रहे हैं, पर उनकी “इनर फैब्रिक” (आतंरिक संरचना) किसी भी “एंगल” से भारत की नहीं है।

एक शब्द में कहें तो “ग्लोबलाइजेशन” का सीधा अर्थ है, “अमेरिकनाइजेशन”। अमरीकी हमलों का अर्थ है, “मानव न्याय”। तीसरी दुनिया को सभ्य बनाने का अर्थ है, “अमेरिकी सभ्यता को अपनाना”। रुपये को “बक्स” बोलना, और भारतीय गाली “साला” को “फक” से रिप्लेस करना। “सुंदर” के जगह “सेक्सी” बोलना और बात-बात में “आई लव यू” बोलना। कभी किसी का “केयर” न लेना और फटाफट “टेक केयर” बोलना। इस बात-बात में “बाय-बाय” बोलने वाली संस्कृति से “बाय” बोल पाना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है।

आज अगर किसी भी मेट्रो में रहने वाले से अगर आप उसकी राष्ट्रीयता पूछिए – दस में से नौ कहेंगे – “इंडियन” (वो “भारतीय” नहीं बोलेंगे…)। तो इसका क्या मतलब हुआ – हम इंडियन हो गये हैं। भारतीय बहुत कम ही बचे हैं, भारत में। तो हम हुए न – ग्लोबल गांव के अगड़े और तगड़े दावेदार!

(विनय भरत। पेशे से प्राध्‍यापक, मि‍जाज से पत्रकार। फिलहाल मारवाड़ी कॉलेज, रांची में अंग्रेजी के असिस्‍टेंट प्रोफेसर। सामाजिक कामों में भी गहरी दिलचस्‍पी। अखबारों में लगातार समाज और राजनीति के मसलों पर लिखते रहते हैं। राजकीय उच्‍च विद्यालय, बरियातू, रांची से माध्‍यमिक शिक्षा और संत जेवियर कॉलेज से उच्‍च शिक्षा प्राप्‍त की। उनसे vinaybharat@ymail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)

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