हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाजार की तरह!

उठती है हर निगाह खरीदार की तरह!!

♦ उमेश पंत

स दिन यूं ही घूमने का दिल किया, तो हम कुछ लोग चोर बाजार जाने का प्लान बना चुके थे। मुंबई के इतवारों की एक खास बात ये भी है कि उस दिन लोकल ट्रेन कुछ खाली-खाली सी रहती हैं। मुंबई में कम भरी हुई ट्रेन मिलना भी किसी लग्जरी से कम कहां है।

दिन के तकरीबन बारह बजे हम दादर स्टेशन पे थे। वैसे तो वेस्टर्न लाइन पर आने वाला ग्रांट रोड स्टेशन चोर बाजार का सबसे नजदीकी स्टेशन है, पर सेंट्रल लाइन से आने की वजह से दादर से ही हमने चोर बाजार के लिए टैक्‍सी कर ली।

संकरी सड़कों पे गुजरते हुए टैक्‍सी एक घनी आबादी वाली जगह पर ले आयी। हम मुहम्मद अली रोड के नजदीक मौलाना सौकत अली रोड पर थे। वहां लोगों ने बताया कि मटन गली पर चोर बाजार लगती है। लोगों की उंगलियों के इशारे का पीछा करते हम चोर बाजार पे आ पहुंचे थे।

चोर बाजार का नाम कभी शोर बाजार हुआ करता था। अंग्रेजों की बिगड़ी हुई वर्तनी ने उसे चोर बाजार में तब्दील कर दिया। बाद में यहां सचमुच चोरी किया हुआ सामान बिकने लगा। और अब वो सामान यहां बिकता है, जिसे बाजार ने ‘एंटीक’ नाम दे दिया ताकि उसे कबाड़ होने से बचाया जा सके।

चोर बाजार की उस संकरी गली में आकर अचानक लगा कि जैसे वक्त में कहीं बहुत पीछे आ गये हों हम। वहां मुंबई दूर दूर तक कहीं नहीं था। सब कुछ पुराना। दुकानें, चीजें, और यहां तक कि लोग भी। फुर्सत जैसे वहां हर दुकान पर अपनी मचान बनाये इत्मीनान से बैठी हो। कहीं कोई जल्दबाजी नहीं।

गली की पहली दुकान बहुत पुरानी फिल्मों के पोस्टरों की थी। नास्तिक, विद्या, बागी… जैसे एसडी वर्मन का जमाना लौट आया हो, आनंद बक्सी उन पोस्टरों से झांक रहे हों… सोच सोचकर रोएं खड़े हो रहे थे कि कभी वक्त निकाल कर अमिताभ बच्चन यहां आ पाएं तो अपने पुराने दिनों को जीता हुआ देखकर उस एंग्री यंग मैन को कैसा लगेगा? हर कोई इतना भाग्यशाली कहां होता है कि उसके अतीत को अपनी दीवारों पर चस्‍पां करने के लिए लोग दूर दूर से उन कागज के टुकड़ों को ढूंढने चले आएं, जिनके पुराने रंगों में उस अतीत की ताजगी अब भी मौजूद है। अब जब सब डिजिटल हो गया है, तो उन पोस्टरों पे हाथ से की हुई कारीगरी के रंग बेशकीमती हो गये हैं। कई बार जो नहीं होता, उसकी कीमत जब वो नहीं होता तब ज्यादा समझ आती है। उस नहीं होने के एहसास को समेटती चोर बाजार की इन गलियों में हम और आगे बढ़ रहे थे, अतीत में लौटे मुसाफिरों की तरह।

फिर एक आईना दिखाई देता है। जैसे वो अतीत का आईना हो, जिससे ‘आज’ थोड़ा विकृत सा नजर आता हो। पुराने जंग लगे शटर के भीतर की सीखचें अब भी वैसी की वैसी, जैसे उनको आज का रंग ही न चढ़ पाया हो… उन जंग-खायी सांकलों ने जैसे इस बाजार को वक्त में आगे जाने से मना कर दिया हो… मुंबई आगे बढ़ गया हो और ये बाजार अब भी वहीं खड़ा हो, अपने पुरानेपन में खोया, नयेपन को नजरंदाज करता सा…

खामोश होना कितना खूबसूरत होता है कभी, सारी बातों को किसी खुले हुए संदूक में रखे पुराने झोले में बंद करके अपने सामने बीतते हुए को चुपचाप निहारते रहना… वक्त का हिस्सा होते हुए भी उसकी आहटों का हिस्सा न होने का फैसला कर लेना… इस तस्वीर को देख के कुछ ऐसा ही तो लगा था।

वर्तमान की गंध कुछ आगे बढ़ने पर नुमाया हो ही जाती है। बीता हुआ भले ही कितना खूबसूरत लगे, बीतता हुआ तो अपना अपशिष्ट छोड़ ही जाता है। पर चोर बाजार की इस गली में हमने फैसला कर लिया था कि अच्छी चीजों को सहेजने के लिए कई बार गंदगी को नजरअंदाज करना होता है, हमारी नजरअंदाजियां हमें और आगे ले आयी।

इस मुस्लिम बहुल इलाके में झक सफेद कुरते से मेल खाती झक सफेद दाढ़ी, और उस सफेदी के साफ सुथरे होने से मेल खाता एक बुढ़ापा था… उस बूढ़े चेहरे में एक इत्मीनान था और पास ही में उस इत्मीनान की मासूमियत से मेल खाती एक खूबसूरत कलाकृति। मेरे हाथों में कैमरा था, जो लगातार इस बाजार में मिल रही अच्छी बुरी छवियों का गवाह बन रहा था।

और फिर कुछ आगे चलकर सेल्युलाइड वाले दिन लौट रहे थे। जामिया के दिनों में फोटोग्राफी सीखने के दौर में इस तरह के फ्रेम पहली बार देखे थे… दिल्ली की सड़कों में, दिन की धूप में एफ टू, और एफएम थ्री नाम के उन एनालॉग कमरों से न जाने कितनी तस्वीरें खींची थी, फिर डार्क रूम के अंधरे में उन्हें प्रोसेस किया था, फिल्म रोल से नेगेटिव काट कर उन्हें इस तरह के फ्रेम में चढ़ाया था और स्क्रीनिंग रूम में जाकर उन्हें प्रोजेक्टर की मदद से स्क्रीन में देखा था। वो छवियां आज तक प्रिंट नहीं हुईं, बताया गया था कि उनके प्रिंट लिये भी नहीं जा सकते, पर वो छवियां आज भी दिमाग में ताजा हैं। इस फ्रेम को देख कर वो दिन याद आ गये थे। वाह वो पुराने दिन।

ओएलएक्स और कविकर के दौर में जब लोग पुरानी चीजों से बड़ी जल्दी आजिज आ जाते हैं और उन्हें निपटाने के आसान तरीके उंगलियों के आसपास आ गये हैं, इस दौर में भी मरम्मत होती है, फोन पे एफएम आ गया है, पर इस दौर में भी ट्रांजिस्टर ठीक किये जाते हैं। केसेट वाले प्लेयर अब भी हैं, एंटीक ही सही, ये देखकर अच्छा लगा। बचपन में कैसे डबिंग करवाने जाते थे। साइड ए और साइड बी में अपनी पसंद के वो दस दस गाने। ये बाजार धीरे धीरे जैसे बचपन से अब तक का वक्त रिवाइंड कर रहा था। हर नये नजारे के साथ वक्त का कोई पेंच जैसे धीरे धीरे ढीला हो रहा था।

पुरानी घड़ियां, पुराने चश्मे, पुरानी अंगूठियां और पुराना बेचकर नया पैसा कम लेने की ख्वाहिश रखते रखते पुराणी दाढ़ी में सिमटा एक पुराना चेहरा। ऐसे कई चेहरे थे इस बाजार में, जिसने इस बूढ़े हो गये बाजार को कभी मरने नहीं दिया। डेढ़ सौ साल साल पुराने इस बाजार में 70 साल से ऊपर के कई चेहरे दिख जाएंगे, नये लोगों को पुरानी यादें बेचते।

पास ही में एक दूरबीन झांक रही थी, जैसे इस पुराने वक्त से उस नये वक्त को देखने की कोशिश कर रही हो। मुंबई का ये चोरबाजार भी कुछ कुछ उस दूरबीन सा ही तो है … एक छोटी सी गली जिस पर खड़े होकर बीते हुए को जरा नजदीक से देख पाने का इलहाम होता है। हर दूरबीन की अपनी एक सीमा होती है, उन्हीं चीजों को पास दिखा पाती है, जिन्हें देखने का नजरिया हमारे पास होता है। उस नजरिये से पास की चीजें भी कई बार दूर हो जाती हैं… वरना मुंबई में कितने लोग होंगे जो अब तक इस बाजार को देखने का वक्त निकाल पाये होंगे…

वक्त भले ही जंग खा जाए भूख कहां हारती है। उस छोटी सी अलमारी में जंग लगे पुर्जों की मदद से इन बूढ़े से शरीरों के पुर्जों को चलने भर की ऊर्जा दे रहा है ये चोर बाजार। स्टील के इन पुराने टिफिन बॉक्स में अनाज के कुछ दाने आ ही जाते होंगे इन जंग-खाये पुर्जों से जूझते हुए। खाना भले ही बासी हो जाता हो पर भूख हमेशा ताजा रहती है, और उस भूख को जिंदा रखने की ख्वाहिश भी तब तक साथ देती है, जब तक पुर्जों का काम चलता रहे।

आज कुछ दिनों बाद तस्वीरों के आईने से चोर बाजार की उस गली को फिर से देखा। चोर बाजार से थोड़ी सी झलकियां चोरी करके आप तक पहुंचाने की गुस्ताखी करती ये मुंबई डायरी आपको पसंद आएगी, इन्हीं गुस्ताख उम्मीदों के साथ फिर मिलते हैं। मुंबई के अंतहीन गलियारों से अभी बहुत कुछ चुराना बाकी जो है।

Umesh Pant(उमेश पंत। सजग चेतना के पत्रकार, सिनेकर्मी। सिनेमा और समाज के खास कोनों पर नजर रहती है। मोहल्‍ला लाइव, नयी सोच और पिक्‍चर हॉल नाम के ब्‍लॉग पर लगातार लिखते हैं। फिलहाल यूपी से ग्रामीण पाठकों के लिए निकलने वाले अखबार गांव कनेक्‍शन से जुड़े हैं। उनसे mshpant@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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