“फिल्‍म बनाना, फिल्‍मों पर बात करना एक ही बात है”

♦ प्रकाश के रे

सिनेमा के आगमन के साथ अठ्ठारहवीं सदी के प्रसिद्ध स्कॉटिश कवि रॉबर्ट बर्न्स की वह प्रार्थना पूरी हो गयी थी, जिसमें उन्होंने खुद को वैसे ही देख पाने की तमन्ना की थी, जैसा दूसरे लोग देख सकते हैं। लेकिन इसी के साथ देखने-दिखाने की इस तकनीक ने इस प्रक्रिया के विविध आयामों को लेकर एक अंतहीन बहस की शुरुआत भी कर दी, जो आज कई दशकों के बाद भी बदस्तूर जारी है। गोदार ने तो यहां तक कह दिया है कि फिल्में बनाना और फिल्मों पर बात करना एक ही बात है। ये दोनों चीजें भले ही एक न हों, लेकिन फिल्मों पर बतकही एक महत्वपूर्ण गतिविधि तो है। सितंबर के तीसरे सप्ताहांत में मोहल्ला लाइव द्वारा दिल्ली में आयोजित दो दिवसीय गोष्ठी – सिने बहसतलब 2013 – के दौरान हिंदी सिनेमा के वर्तमान पर कई विषयों के संदर्भ में गहन चर्चा में अनेक निर्देशकों, कलाकारों, गीतकारों, लेखकों, समीक्षकों सहित बड़ी संख्या में सुधी दर्शकों की भागीदारी इस महत्त्व को रेखांकित करती है।

हिंदी पट्टी में सिनेमा से संबंधित बातचीत अभी भी एक आवश्यक रचनात्मक गतिविधि के रूप में अपना स्थान नहीं बना पायी है, जैसा हमें बांग्ला, मलयालम या मराठी में देखने को मिलता है। हिंदी सिनेमा के बारे में बौद्धिक विमर्श आमतौर पर अंग्रेजी में ही होता है। ऐसे में पिछले कुछ सालों से सिने बहसतलब के माध्यम से सिनेमा, विशेषकर हिंदी सिनेमा, पर हिंदी में गंभीर बातचीत का आयोजन कर अविनाश दास और उनके सहयोगियों ने हिंदी लोकवृत्त को समृद्ध किया है तथा जागरूक दर्शकों के एक वर्ग को निर्देशकों, लेखकों और कलाकारों से सीधे जोड़कर सिनेमा की समझ को भी बेहतर बनाने में योगदान किया है।

बहसतलब में हिंदी सिनेमा में स्त्रियों के लिए बन रही नयी जगह, बदलाव के विविध रूप, विषय-वस्तु और व्यापार के बीच द्वंद्व, राजनीतिक सिनेमा के राह के रोड़े, और फिल्मी गीतों की बदलती भाषा आदि विषयों के इर्द-गिर्द विभिन्न मसलों पर बातें हुईं और सवाल-जवाब के जरिये फिल्मवालों और सुननेवालों में विचारों का आदान-प्रदान भी हुआ। भागीदारी करने वाले कई लोगों का मानना था कि नयी पीढ़ी के फिल्मकारों की अपनी दलीलें थीं और सुनने वालों की अपनी लेकिन परस्पर संवाद बेहतर सिनेमाई भविष्य का भरोसा देता है। आमिर और नो वन किल्ड जेसिका जैसी फिल्में बनानेवाले राजकुमार गुप्ता ने साफगोई से यह स्वीकार किया कि उन्हें राजनीतिक या विवादास्पद मुद्दों पर फिल्में बनाने में डर लगता है। ब्लैक फ्राइडे से विश्वरूपम तक के उदहारण देते हुए उन्होंने कहा कि हालात ऐसे हैं कि कोई भी कहीं खड़ा होकर किसी फिल्म का प्रदर्शन रोक देता है। सुननेवालों ने भी उनके इस डर से सहमति जतायी। कुछ ही दिन पूर्व पुणे फिल्म संस्थान में और हैदराबाद के प्रसाद स्टूडियो में फिल्म प्रदर्शन को दक्षिणपंथियों ने तोड़फोड़ और मारपीट कर रोक दिया था।

लेकिन ऐसी निराशाओं के वातावरण में उम्मीद के कई रास्ते खुल रहे हैं। फंस गये रे ओबामा और जॉली एलएलबी के निर्देशक सुभाष कपूर और राजकुमार गुप्ता ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि दर्शकों में बढ़ रही विविधता और स्वीकार्यता ने अच्छे कथानक पर आधारित फिल्मों के लिए जगह बनायी है। इस वजह से निर्माता उन जैसे निर्देशकों पर भरोसा करने लगे हैं। वरिष्ठ फिल्म समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज ने करण जौहर और किरण राव जैसे बड़े निर्माताओं द्वारा प्रयोगात्मक और स्वतंत्र फिल्मों को अपनाने की प्रक्रिया को बहुत बड़ा बदलाव माना लेकिन नये निर्देशकों को मुनाफे के इस भंवर जाल से सावधान रहने की हिदायत भी दी। लंच बॉक्स और शिप ऑफ थीसियस का उदहारण देते हुए बीए पास के निर्देशक अजय बहल ने तो यहां तक कह दिया कि पिछले तीन महीने में फिल्म उद्योग में जो बदलाव आया है, उतना पिछले छह साल में नहीं बदला था।

उषा जाधव, स्वरा भास्कर, विशाखा सिंह और शिल्पा शुक्ला ने भी स्त्रियों के दृष्टिकोण से सिनेमा में सकारात्मक परिवर्तन को रेखांकित किया। इनका मानना था कि अभी भी स्त्री-विषयक फिल्में कम बन रही हैं लेकिन अब आत्मविश्वास से भरे महिला चरित्र पहले से कहीं अधिक दिख रहे हैं। इन अभिनेत्रियों ने ग्लैमर के दायरे से बाहर निकल कर अपने अभिनय से आलोचकों और दर्शकों का भरोसा जीता है। बहस के दौरान बात अक्सर सफलता-असफलता के अर्थशास्त्र में उलझ जाती थी। निर्माता-निर्देशक अनुभव सिन्हा तो कह दिया कि द्वंद्व फिल्म की विषय-वस्तु और व्यापार के बीच नहीं है, बल्कि दर्शक और विषय-वस्तु के बीच है। लंच बॉक्स का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि फिल्म ने मुनाफा कमाया है और इसका फायदा ऐसी फिल्मों को होगा। उनका कहना था कि दर्शक अच्छी फिल्मों को देखे और आर्थिक रूप से उन्हें सफल बनाये। अजय ब्रह्मात्मज ने बताया कि दर्शक भी ब्रांड और अतिशय प्रचार के चक्कर में पड़ा रहता है और उसे इससे बाहर आना होगा तभी अच्छी फिल्मों के लिए जगह बनेगी। साहित्यकार उदय प्रकाश ने सिनेमा के नये वातावरण का स्वागत करते हुए इस बात की चिंता जतायी कि आज भी हाशिये का एक बड़ा तबका सिनेमा में अनुपस्थित है। देश की आबादी का बड़ा हिस्सा होने के बावजूद आदिवासी नहीं है। प्रकाश झा की सत्याग्रह का उदहारण देते हुए उन्होंने कहा कि आदिवासी क्षेत्र में फिल्म की शूटिंग होने के बाद भी उसमें वहां के बाशिंदे नहीं दिखते।

हमारी फिल्मों में गीत-संगीत एक जरूरी हिस्सा हैं और उन पर वाद-विवाद भी खूब होता रहा है। गीतकार इरशाद कामिल ने शिकायत करते हुए कहा कि हमारी पीढ़ी को बढ़िया काम करने पर भी वह सम्मान नहीं मिलता, जो पहले गीतकारों को दिया जाता था। गीतकार पर बाजार के दबाव की गंभीरता को बताते हुए उन्होंने कहा कि आज गाने सुनने के लिए नहीं, नाचने के लिए बनते हैं। पीयूष मिश्रा ने युवा दर्शकों की समझ पर भरोसा जताते हुए कहा कि नये जमाने में नयी तरह के गीत और संगीत होने चाहिए। गीतकार राजशेखर ने आश्चर्य व्यक्त किया कि ऐसे असहिष्णु समय में फिल्मी गीतों में सूफी ट्रेंड का चलन जोरों पर है। दुष्यंत की चिंता फिल्मों से गायब होते गीतों को लेकर थी।

इन फिल्मकारों, लेखकों, गीतकारों, और दर्शकों की चिंता और बातचीत कई बार परस्पर विरोधी लग सकते हैं लेकिन वे सब सिनेमा के अच्छे भविष्य के लिए समझ बनाने की कोशिश कर रहे हैं। बरसों पहले कुछ ऐसा ही ऋत्विक घटक कर रहे थे, जब वे कह रहे थे कि सिनेमा को नारेबाजी से बचना चाहिए और फिल्मकार गहन मानवीय अनुभूतियों से संचालित होना चाहिए और व्यावसायिक स्तर पर सरकार और समाज को जिम्मेदारी लेनी चाहिए।

[इस रिपोर्ट का संशोधित वर्जन आज के जनसत्ता में छपा है]

(प्रकाश कुमार रे। सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता के साथ ही पत्रकारिता और फिल्म निर्माण में सक्रिय। दूरदर्शन, यूएनआई और इंडिया टीवी में काम किया। फिल्म शोधार्थी भी। फिलहाल वे वी शांताराम पर शोध में लगे हैं और बीआर चोपड़ा पर केंद्रित उनकी पुस्तक जल्‍दी ही प्रकाशित होने वाली है। उनसे pkray11@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)

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