द्वंद्व कंटेंट और कलेक्शन में नहीं, कंटेंट और दर्शकों के बीच है

सिने बहसतलब 2013 : दूसरा दिन, पहला सत्र
विषय : हिंदी सिनेमा का वर्तमान, कंटेंट और कलेक्शन का द्वंद्व
विषय प्रवर्तन : अनुभव सिन्हा
वक्‍ता : आनंद एल राय, उदय प्रकाश, अजय ब्रह्मात्‍मज, रघुवेंद्र सिंह
मॉडरेटर : विनीत कुमार

♦ अनुभव सिन्हा

सिनेमा एक टीम एक्टिविटी है। सिनेमा में पैसा इन्वॉल्व होने की वजह से वैसे लोग भी शामिल होते हैं, जिनका कला से प्यार नहीं होता। बतौर निर्देशक आपकी जवाबदेही भी उनके प्रति हो जाती है। मनोरंजन ही सिनेमा का मूल आधार है। सिनेमा के मनोरंजन के स्तर अलग हो सकते है। कंटेंट के हिसाब से सिनेमाई ट्रेंड की बात करें, तो ट्रेंड को भी समझ नहीं आया कि ग्रैंड मस्ती जैसी फिल्म हिट कैसे हो गयी। पिछले पांच-सात सालों में प्रयोगधर्मी सिनेमा ने अच्छा कमाया है। द लंच बॉक्स का कलेक्शन लागत के हिसाब से शानदार है। मुझे द्वंद्व कंटेंट और कलेक्शन में न दिखकर, कंटेंट और दर्शकों के बीच दिखता है।

♦ अजय ब्रह्मात्‍मज

द्वंद्व कहीं न कहीं तो है, जिसे हम पकड़ नहीं पा रहे हैं। दर्शक भी कलेक्शन के चक्कर में पड़ गया है। कंटेंट वहां प्रभावित हो जाता है, जहां दर्शक भी कलेक्शन के चक्कर में पड़ जाता है। मीडिया के लोग दर्शक पर दबाव बना रहे हैं। 100 करोड़ की अवधारणा भी द्वंद्व की वजह है। अगर कलेक्शन दर्शक है, तो द्वंदव साफ परिलक्षित है।

♦ अनुभव सिन्हा

जो हीरो है, उसे ब्रांड के रूप में देखिए। सौ करोड़ या ढाई सौ करोड़ की अवधारणा ब्रांडिग और नंबर वन पर काबिज रहने से जुड़ी है। मीडिया हीरो को बड़ा क्यों बना रहा है? हीरो को बड़ा बना कर मीडिया और बाजार घुमा रहा है। दर्शक भी इस चीज को देखे और समझे, तभी कुछ हो सकता है। आजकल कंटेंट के ऊपर इतना दवाब है कि तिलिस्म भंग हो जाता है। सिगरेट का एक शॉट हो तो डिस्क्लेमर लगाना पड़ता है। किस सीन अगर डाल दिया, तो फिल्म टीवी पर नहीं चल सकती, जबकि फ्लेवर कंडोम के एड टीवी पर धड़ल्ले से चलाये जाते हैं और फ्लेवर कंडोम एक तरह का ब्लोजॉब है।

♦ उदय प्रकाश

समय ने हमेशा से बहुत कुछ बदला है। फिर भी सिनेमा के कंटेंट में बाजारवाद हमेशा से हावी रहा है, जिस वजह से सिनेमा सिमट कर रह गया। सिनेमा अभी तक सीमित दायरे में रहा है जैसे सिनेमा में आदिवासी हमेशा मिसिंग रहे हैं। देश की लगभग 11 फीसदी आबादी वाले इस समुदाय पर कभी किसी का फोकस नहीं रहा। सत्याग्रह जैसी फिल्म आदिवासी लोकेशन पर शूट हुई, लेकिन इसने अपने लोकेशन को भी टार्गेट नहीं किया। आजकल कंटेंट और कलेक्शन पर बाजारवाद हावी है। बाजारीकरण के चक्कर में कंटेंट बहुत बार गुम हो जाता है। कहानी की वेशभूषा को बाजारवाद के हिसाब से तोड़-मरोड़ दिया जाता है। सिनेमा में लेखक का दर्जा दोयम चलता रहा है। फिर भी इंडियन सिनेमा जैसा दुनिया में सिनेमा नहीं है।

♦ आनंद एल राय

मैं मध्यमवर्गीय परिवार से आता हूं और छोटे शहरों में पला-बढ़ा हूं। इसलिए अभी तक बहुत रूटेड रहा हूं। मेरी दोनों फिल्म तनु वेड्स मनु और रांझणा वैसी ही कहानियों पर है। मुझे इसी में कंफर्ट फील होता है, सो यही बनाता हूं, हालांकि कभी-कभी बाजारवाद की मांग से लड़ना भी पड़ता है। पर अभी तक मैंने जैसा चाहा वैसा किया और सफल भी रहा। मुझे लगता है कि हम चाहें, तो कंटेंट और कलेक्शन के द्वंद्व को खत्म कर सकते हैं।

दिगंत कुमार और अमित हिसारिया की रिपोर्ट

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