‘जाति न पूछो साधु के बरक्स आलोचना के लोचन का संकट’

‘पांडेय कौन कुमति तोहे लागे’ उर्फ वीरेंद्र यादव का यादव हो जाना

♦ संजय कुमार

देश के बड़े साहित्यिक सम्मानों को पाने वालों में बाह्मण व द्विज ही कब्जा जमाये हुए है। ज्ञानपीठ सम्मान (हिंदी) और साहित्य अकादमी सम्मान (हिंदी) पाने वालों के नाम की सूची से खुलासा होता है कि साहित्य के क्षेत्र में पुरस्कार पाने वालों में द्विज शिखर पर हैं और दलित-पिछड़े हाशिये पर। 1968 से 2009 तक ज्ञानपीठ सम्मान (हिंदी) पाने वालों में एक भी दलित-पिछड़ा नहीं है। सम्मान पाने वालों में चार बाह्मण, एक भूमिहार बाह्मण और चार द्विज है। साहित्य अकादमी सम्मान (हिंदी) का भी वही हाल है। यहां भी दलित-पिछड़े नदारद हैं। 1955 से 2011 तक की सूची पर नजर डालने से पता चलता है कि 24 बाह्मण और 31 अन्य द्विज/वैश्य हैं। इनमें मात्र एक जाट है। (देखें – फारवर्ड प्रेस वाया मोहल्‍ला लाइव, अप्रैल 2012 का अंक, ‘द्विजों में ही होती है साहित्यिक प्रतिभा?)। इन सबके बावजूद भूले-भटके कभी पिछड़ों-दलितों को उचित सम्मान मिलता है, तब इन्हीं पुरस्कार पाने वाले द्विजों को यहां जातिवाद दिखने लगता है।

जाति आखिर जाति नहीं, सच है। एक लेखक-पत्रकार हैं दयानंद पांडेय। इनकी प्रोफाइल देखकर छोटा-मोटा पत्रकार-लेखक बेचारा डर जाएगा। इन दिनों वे चर्चे में हैं। वरिष्ठ आलोचक वीरेंद्र यादव को पुरस्कार मिलने पर, पांडेय जी ने वीरेंद्र यादव के जातिवादी होने को लेकर सोशल मीडिया पर सवाल खड़े कर दिये। पिछड़े-दलित के बीच द्विज का वाद सामने आ ही गया। यह सब तब हुआ, जब पिछले दिनों दयानंद पांडेय ने उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा प्रो चैथीराम यादव और आलोचक वीरेंद्र यादव को पुरस्कृत किये जाने पर फेसबुक पर टिप्पणी लगा दी, ‘अब की बार उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा दिये गये पुरस्कारों के लिए एक योग्यता यादव होना भी निर्धारित की गयी थी। रचना नहीं तो क्या यादव तो हैं, ऐसा अब भी कहा जा रहा है’। समझ में नहीं आता कि सदियों से हर क्षेत्र में कब्जा जमाये द्विजों को पिछड़े-दलितों का आगे आना पचता क्यों नहीं है?

इस पर वीरेंद्र यादव का कमेंट आया, ‘दयानंद जी खोजी पत्रकार हैं। दरअसल हिंदी संस्थान के इतिहास में अब तक द्विज लेखक ही पुरस्कृत होते रहे हैं। शूद्र और दलित लेखक उस सूची से हमेशा नदारद रहे हैं। यह अकारण नहीं है कि राजेंद्र यादव तक इसमें शामिल नहीं किये गये हैं। यह मुद्दा विचारणीय है कि आखिर क्यों, पिछले वर्षों में किसी शूद्र, दलित या मुस्लिम को हिंदी संस्थान के उच्च पुरस्कारों से नहीं सम्मानित किया गया। क्या राही मासूम रजा, शानी, असगर वजाहत, अब्दुल बिस्मिल्‍लाह इसके योग्य नहीं थे/हैं। ओमप्रकाश वाल्मीकि एकमात्र अपवाद हैं, वह भी मायावती के शासन काल में। जिस संस्थान में पुरस्कारों के लिए एकमात्र अर्हता द्विज होना हो, वहां यदि 112 लेखकों में दो शूद्र पृष्ठभूमि के लेखकों को सम्मानित किया जाता है, तो जरूर उसके इतर कारण होंगे और दयानंद पांडे के अनुसार वह यादव होने की शर्त है। वैसे दयानंद पांडेय स्वयं इस बार पुरस्कृत हुए हैं। इसके पूर्व भी दो बार हिंदी संस्थान से पुरस्कृत हो चुके हैं। और इस बार भी अन्य खोजी पत्रकारों की सूचना के अनुसार उनके लिए उस (साहित्य भूषण) संस्थान के लिए एक दर्जन से अधिक संस्तुतियां थीं, जिसकी उम्र की अर्हता साठ वर्ष है, जो उनकी नहीं है। जाहिर है सुयोग्य लेखक हैं, अर्हता न होने पर भी संस्तुतियां हो ही सकती हैं। संजीव, शिवमूर्ति जैसे शूद्र पृष्ठभूमि के लेखक अयोग्य न होते तो उनकी संस्तुतियां क्यों न होती? जिन शूद्र पृष्ठभूमि के लेखकों को मिल गया, उनकी रचना भी कैसे हो सकती है। क्योंकि इसका अधिकार तो द्विज को ही है। यह सब लिखना मेरे लिए अशोभनीय है लेकिन दुष्प्रचार की भी हद होती है!’

वीरेंद्र यादव के जवाब पर दयानंद पांडेय बैकफुट पर आ गये। उन्‍होंने जवाब दिया, ‘यह टिप्पणी मैंने फेसबुक पर चुहल में लगायी थी।’ वाह! दयानंद पांडेय जी क्या बात है। इतने बड़े पत्रकार-लेखक और ऊपर से चुहल? लेकिन दरअसल यह चुहल नहीं थी बल्कि चोरी पकड़े जाने पर दी जाने वाली सफाई थी। हालांकि इस सफाई की लीपापोती भी उन्‍होंने अपने ब्‍लॉग पर एक लेख लिख कर कर दी, ‘जाति न पूछो साधु के बरक्स आलोचना के लोचन का संकट उर्फ वीरेंद्र यादव का यादव हो जाना!’

सवाल पुरस्कार को लेकर उठा। वह पुरस्कार, जो खुद दयानंद पांडेय ले चुके हैं। दयानंद पांडेय के जवाब का लब्‍बोलुआब यह है कि वीरेंद्र यादव, यादव हैं और वे दलित-पिछड़ों के जो सरोकार की बात करते हैं, वह जातिवादी है। भले ही दयानंद पांडेय ने दर्जनों पुस्तकें लिख मारी हो, उनका लेख जाति न पूछो साधु के… पढ़ने से साफ लगता है कि वे ऊपर से प्रगतिशील आदि-आदि हैं, लेकिन अंदर से (जैसा कि द्विजवादी होते हैं) घोर जातिवादी हैं। तभी तो भगवान स्वरूप कटियार फेसबुक पर लिखते हैं, “पिछले दिनों दयानंद पांडेय ने उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा प्रो चैथीराम यादव और आलोचक वीरेंद्र यादव को पुरस्कृत किये जाने पर जो भोंडी और हल्की टिप्‍पणी की है, वह न सिर्फ आपत्तिजनक है बल्कि दयानंद पांडेय के दिमागी दिवालयापन और जातिपरक ब्राह्मणवादी संकुचित सोच का सूचक भी है। यह भला कौन कह सकता है कि ये दोनों विद्वान लेखक दिये गये पुरस्कार के योग्य पात्र नहीं हैं। इन दोनों लेखकों का अपने क्षेत्र में बृहद काम है। अखिलेश सरकार ने इन्हें पुरस्कृत कर कोई एहसान नहीं किया बल्कि एक सही फैसला लिया, जिसे पिछली सरकारों ने पक्षपात करते हुए नहीं लिया। दयानंद जी की टिप्‍पणी से लगता है कि वे कहना चाहते हैं ये पुरस्कार उन्हें यादव होने के कारण दिये गये और उन्होंने अहीर जाति पर जो मुहवारात्मक टिप्‍पणी की, वह तो निहायत गिरे स्तर की हरकत है और उनके एक लेखक होने के संस्कार पर सवाल खड़ा करती है। अगर इन पुरस्कारों का पोस्टमार्टम किया जाए तो अनेक ऐसे नाम मिल जाएंगे, जिन्होंने सिर्फ मैनेज करके पुरस्कार हासिल किये, पर पांडेय जी उन्हें बख्श देते हैं और वीरेंद्र यादव और चैथी राम यादव पर हमला करते हैं। वीरेंद्र यादव रामविलास शर्मा से लेकर नामवर सिंह को पूरी इज्जत बख्शते हुए और उनके साहित्यिक अवदान को पूरा महत्व देते हुए सामाजिक न्याय और दलित विमर्श को लेकर उनके दृष्टिकोण की निर्मम और निर्भीक आलोचना करने से नहीं चूकते। यही निर्भीकता और निष्पक्षता उनकी खासियत है, जो उन्हें बड़ा आलोचक बनाने के साथ साथ उन्हें बड़ा और भला आदमी भी बनाती है। प्रतिवाद किया जाना चाहिए, यही सोच कर यह टिप्‍पणी की ताकि लोग गलत को सही न मान बैठें। फिर सोच अपना-अपना और नजरिया भी अपना-अपना।”

भगवान स्वरूप कटियार की बातों में दम है। सवाल उठता है कि अगर अखिलेश सरकार ने यादव जाति के लेखकों को पुरस्कार दे ही दिया, तो कौन सा अपराध हो गया। जो दयानंद पांडेय ने बवाल खड़ा कर दिया। सदियों से द्विजों की ओर से मैनेज हो रहे पुरस्कारों पर तो पांडेय जी की दहाड़ सुनने को नहीं मिली। कहीं यह उनका द्विज प्रेम तो नहीं। पूर्व की मायावती सरकार ने दलितों-पिछड़ों को पुरस्कृत न कर भूल की थी। क्योंकि देश में कई दलित साहित्यकार हैं, जिनके योग्यदान को नकारा नहीं जा सकता है। ऐसे में अखिलेश सरकार ने जो किया, वह एक अच्छा कदम है।

प्रो चैथीराम यादव और आलोचक वीरेंद्र यादव किसी परिचय के मोहताज नहीं है। दयानंद पांडेय ने उनकी योग्यता को जाति से जोड़ कर देखा। अक्सर द्विजवादी ऐसा करते हैं। साहित्य हो या मीडिया, दलित-पिछड़े की भागीदारी के सवाल को लेकर जब-जब सवाल उठता है, तब-तब दयानंद पांडेय जैसे द्विज योग्यता को लेकर सवाल खड़े करते हैं? उन्हें अयोग्य द्विज नहीं दिखता? प्रो चैथी राम यादव को दयानंद पांडेय कुंजी लेखक बताते हैं। वहीं संस्थान ने डॉ सरला शुक्ला और डॉ सूर्य प्रसाद दीक्षित को पुरस्कृत किया, जिनकी एकमात्र योग्यता हिंदी आध्यापक और द्विज होना है। ऐसे में दयानंद पांडेय की न्याय चेतना कहां सो रही थी? दयानंद पांडेय ने मधुकर सिंह के मसले और अपने रचनाकर्म की चर्चा कर अपने को दलित-पिछड़ों का रहनुमा बताने की कोशिश की है। शायद पांडेय जी को पता नहीं कि मधुकर सिंह को सम्मान किसने दिया? वे लगातार दलित-पिछड़ों के सरोकारों को लेकर लिखते रहे। द्विजवादियों ने उनके नामों की अनुशंसा करने की जहमत तक नहीं उठायी? वरना उन्हें भी बड़ा सम्मान मिलता। फारवर्ड प्रेस ने अप्रैल 2012 के अंक में, ‘द्विजों में ही होती है साहित्यिक प्रतिभा?’ के तहत सूची जारी की है। सूची से खुलासा होता है कि साहित्य के क्षेत्र में पुरस्कार पाने वालों में द्विज शिखर पर हैं और दलित-पिछड़े हाशिये पर।

आश्चर्य की बात यह है कि वीरेंद्र यादव पर हुए हमले को लेकर देश के लेखक संघों के बीच खामोशी है! कोई प्रतिक्रिया नहीं। देखा जाए तो सभी लेखक संघ कहीं न कहीं से ब्रहामणवादी सोच के दायरे में है? पुरस्कार की राजनीति और रचनाओं के प्रकाशन की राजनीति बखूबी सभी लेखक संगठन और दयानंद पांडेय सरीखे लेखक भी जानते/करते हैं? जहां तक जाति का सवाल है तो दयानंद पांडेय जी से एक सवाल है क्या आपने अपनी जाति छोड़ दी है? चलिए जवाब मैं ही दे देता हूं, नहीं। उनके नाम के पीछे पांडेय लगा हुआ है। दयानंद पांडेय जी क्या यह सवाल उठाएंगे कि देश में अब तक के जो भी सम्मान दिये गये हैं, उनका सर्वे कराया जाए कि किस-किस जाति के लोगों को सम्मान मिला है और उनके सम्मान के लिए किस जाति के लोगों ने अनुशंसा की थी। खेमे में बंटे साहित्कार व लेखक संघ जाति के सवाल पर खामोश रहते हैं। कोई सामने आकर बोलना नहीं चाहता है।

(संजय कुमार। आकाशवाणी, पटना में समाचार संपादक। दो दशकों से सक्रिय। इतिहास, समाज और पत्रकारिता पर अब तक छह पुस्‍तकें प्रकाशित। बिहार राष्‍ट्रभाषा परिषद सहित कई संस्‍थानों से सम्‍मानित। अखबारों-पत्रिकाओं में समय-समाज पर लगातार लेखन। उनसे sanju3feb@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *