“जिनको डर नहीं है, वो बनाएं पॉलिटिकल सिनेमा!”

सिने बहसतलब 2013 : दूसरा दिन, आखिरी सत्र
विषय : भारत में राजनीतिक सिनेमा की राह के रोड़े
वक्‍ता : सुभाष कपूर, राजकुमार गुप्‍ता, अरविंद गौड़, प्रियदर्शन, शुभ्रा गुप्‍ता
मॉडरेटर : प्रकाश के रे

♦ अरविंद गौड़

सिनेमा के सामने ऐसे कौन से दबाव हैं, जिनसे राजनीतिक सिनेमा नहीं बन पा रहा है? एक डॉक्टर की मौत जैसी फिल्में क्यों नहीं बन रहीं? हमारे सवाल मार्केट के नियमों में क्यों बंध जाते हैं? ’84 की घटना पर फिल्म क्यों नहीं आती? बलराज साहनी ने राजनीतिक सिनेमा की शुरुआत की, पर बाद में यह बंद होता चला गया, सवाल यह कि हम क्या दिखाएं और क्या नहीं, यह कौन तय करेगा? मुझे क्या देखना है, इसकी जिम्मेदारी हम पर होनी चाहिए न कि सेंसर बोर्ड पर। रोजमर्रा की जिंदगी सिनेमा में जरूरी है। दामुल जैसी फिल्म प्रकाश झा दोबारा क्यों नहीं बना पाये?

♦ राजकुमार गुप्ता

मुझे लगता है सब कुछ में पॉलिटिक्स है। मैंने आमिर और नो वन किल्ड जेसिका पॉलिटिकल सोचकर नहीं बनायी। मुझे कभी कोई दिक्कत नहीं हुई। हम सबसे बड़े डेमोक्रेटिक कंट्री हैं और मजे की बात है कि सबसे कम राजनीतिक फिल्में यहीं बनी हैं। विनीत कुमार के कथन पर मुझे जेसिका में एनडीटीवी की भूमिका पर नाराजगी है। स्थिति पहले प्रेडिक्ट की गयी थी और टूजी घोटाला बाद में आया। हमें एक ऐसे चैनल की जरूरत थी, जिसका बजट कम हो सो हमने एनडीटीवी को लिया। पॉलिटिकल फिल्म को लेकर फिल्ममेकर में एक डर है कि उसकी फिल्में रिलीज नहीं होंगी। सेंसर बोर्ड के बाद भी इतने सारे डायनामिक्स हैं कि दिक्कत आ ही जाती है। सेंसरशिप का मुद्दा अहम है। जब फिल्में बैन होती हैं, तो मेहनत पानी में चली जाती है। मुझे तो ब्लैक फ्राइडे के बैन के बाद इतना डर लग गया कि अब कभी पॉलिटिकल फिल्म ट्राई नहीं करूंगा। मैं उस दर्द से डरता हूं, जो एक फिल्म के रिलीज नहीं होने से होता है क्योंकि फिल्म बनाने में बहुत मेहनत, पैसा, इमोशन लगता है। जिनको डर नहीं है, वो बनाएं पॉलिटिकल सिनेमा, कौन रोक रहा है।

♦ शुभ्रा गुप्‍ता

पॉलिटिकल सिनेमा और पॉलिटिक्स, सिनेमा में ये फर्क बहुत जरूरी है। गरम हवा अब तक की सबसे बेहतरीन पॉलिटिकल फिल्म है। मद्रास कैफे को देखकर समझा जा सकता है कि फिल्ममेकर के अंदर कितना डर होता है। इस फिल्म में सभी रीयल नामों के उल्लेख से बचा गया है और बहुत चालाकी से बनाया गया है, इसके बावजूद तमिलनाडु में इसका विरोध हो गया।

♦ सुभाष कपूर

मैंने तो अपनी फिल्मों में पॉलिटिक्स दिखायी है, हां तरीका अलग अपनाया। किसी ने किसी को नहीं रोका कि ये न बनाओ, वो बनाओ। पर सच्चाई यह है कि फिल्मों में पैसे लगते हैं, मेहनत लगती है। कोई फिल्ममेकर बेवजह अपनी फिल्म को बैन जैसी स्थिति में क्यों देखे।

दिगंत कुमार और अमित हिसारिया की रिपोर्ट

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