हवाओं को मनाता हूं, परिंदे रूठ जाते हैं…

♦ दुष्यंत

सिने बहसतलब 2013 में गीतों पर एक सत्र था, जिसमें वक्‍ता के तौर पर जयपुर से दुष्‍यंत आये थे। उन्‍होंने अपनी बात बहसतलब के मंच पर रखी और यहां वही बातें हम अपलोड कर रहे हैं। अगर उनकी बातें बहसतलब लगें, तो बात आगे बढ़ाएं: मॉडरेटर

हां से शुरू करूं… अपने किसी गीत का हवाला तो दे नहीं सकता, फिलहाल तो गीतकारों के बीच अकेला अगीतकार हूं। एक किस्सा सुनाता हूं। कुछ बरस पहले की बात है। हिंदी सिनेमा के एक मशहूर गीतकार अपने जीवन के आखिरी दिनों में अपने शहर जयपुर आके बस गये। बीमार हुए और उस वक्त के राजस्थान के सबसे बड़े अस्पताल में इलाज के लिए आये तो कोई खास सुनवाई नहीं हुई। खबरिया चैलन तब थे नहीं, थे तो शैशवावस्था में थे। उनके दोस्ताना मुरीद एक वरिष्ठ पत्रकार उन्हें देखने गये, तो गीतकार की हालत और अस्पताल के रवैये से दुखी होकर उन्होंने बड़ी खबर ब्रेक की। नतीजा यह हुआ कि राजस्थान सरकार और फिर सवाई मानसिंह अस्पताल का स्टाफ गीतकार-शाइर का बेहतरीन खयाल करने लगा। उस वक्त के राजस्थान के सबसे बड़े अखबार राजस्थान पत्रिका के उन वरिष्ठ पत्रकार इकबाल खान साहब को उन्होंने कहा- “बेटा इकबाल! तूने क्या कर दिया यार। कमाल कर दिया।” और बहुत दुआएं दी। सवाल यह था कि लोग उन्हें चेहरे से नहीं जानते थे, नाम से कुछ और उनके गीतों के जरिये बहुत लोग। वो गीतकार थे हसरत जयपुरी।

बात हिंदी गीतों की भाषा और मुहावरे की होनी है, ऐसा अविनाश भाई की ओर से आदेश हुआ है। शैलेंद्र ने लिखा था, “एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल, जग में रह जाएंगे प्यारे तेरे बोल।” मेरा खयाल है कि ये गीतकारों के जीवन की दास्तान है।

मैं आत्ममुग्‍धता के भाव के साथ जिसे खुदपसंदी भी कहते हैं, अपनी बात शुरू करना चाहता हूं। मेरी पैदाइश उस इलाके से है, जो हिंदुस्तान पाकिस्तान की सरहद पर है। शायद मंटो के टोबा टेकसिंह वाली सरहद। और कायनात बनाने वाला अगर एक दो डिग्री देशांतर का अंतर कर देता तो मेरी पहचान बदल सकती थी। मुझे पाकिस्तान का बाशिंदा होना होता। खैर, हिंदुस्तान का वह इलाका जहां तीन सूबे मिलते हैं, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान। ये बात सदन के विषय के बीच या शुरुआत में कहनी इसलिए जरूरी है कि इससे मेरा जो भाषाई संस्कार बना है, जबानी तरबीयत हुई है, उसका गहरा तआल्लुक मुझे जान पड़ता है। हिंदी में तालीम ली, उर्दू और पंजाबी की फिजाओं में सांस और घर पर मेरी मां बोली राजस्थानी। उस संस्कार से शब्दों से दोस्ती हुई, मुंबई यानी तब के बंबई के सिनेमा के गीतों ने उस जुबान की तरबीयत को उरूज बख्शा। गुरदास मान और चमकीला जिंदगी में शामिल हुए तो सुरेंद्र कौर भी। और रेडियो पर बजते हिंदी सिनेमाई गीतों की जुबान और उनके साथ गूंजते गीतकारों के नाम कानों में टंकार से लगते थे।

बहरहाल, इसमें आपकी दिलचस्पी होना जरूरी नहीं है, पंजाबियत की वह खुशबू साथ है और रहेगी, हिंदी सिनेमा के सरसों वाले पंजाब के दौर “तुझे देखा तो ये जाना सनम” के बाद गानों में बाढ़ का दौर हमने देखा है, और कई बार झेला भी है। झेलना तब होता है, जब बिनामतलब बिना तर्क कोई पंजाबी गीत सुनाई दिखाई देता है। साहब बीवी और गैंगस्टर के पहले पार्ट को याद कीजिए, जुगनी लोकप्रिय पंजाबी लोकगीत है, हीर और जुगनी प्राय: पंजाबी गायक गाते हैं। यानी सब गाते हैं। पर मेरी छोटी बुद्धि में नहीं आता कि कहानी में कहीं कोई संदर्भ न हो, तो पूरा पंजाबी गीत कैसे बजवाया जा सकता है। नायक की प्रेमिका पंजाबन हो, लोकेल पंजाबी हो, नायक पंजाब में हो, कोई तो तर्क हो यार। मेरी मूर्खता को क्षमा कर दें। अगर ये मूर्खाना लगे तो। ये हमारे समय में हुआ है, वरना कहानी का हिस्सा होते थे, रहे हैं, अब भी हैं, पर शायद ऐसी अतार्किकताएं पहले कम होती होंगी, ऐसा मेरा मानना है।

कुछ सिरफिरे लोगों की वजह से दुनिया बदलती है तो कुछ लोग गीतों की जुबान और मुहावरे भी लाजिम है कि बदलते हैं। धारा बदलने वाले गीतकार कुछ कुछ वक्त के अंतराल में आते रहे हैं। उस सरफिरे को कभी हम गुलजार कहते हैं, कभी समीर, कभी इरशाद कामिल, कभी अमिताभ भट्टाचार्य या स्वानंद किरकिरे और राजशेखर। इसके लिए एक कमिटमेंट, साहस और कद की जरूरत होती है। वरना ये तो आप मानेंगे कि आसानी से कोई नया गीतकार बेकरां है बेकरां जैसे मुश्किल शब्द को गीत में नहीं ला सकता, ये गुलजार साहब ही ला सकते थे।

इससे भी आगे मेरी चिंता यह भी है, और बड़ी चिंता है कि तथाकथित मुख्यधारा के हिंदी सिनेमा में गीत को नापसंद करके गैरजरूरी मान लेने की एक परंपरा मुझे दिख रही है। यानी गीत हिंदी सिनेमा के किसी कोने में अपने वजूद की लड़ाई भी लड़ रहा है। गीतकार तो अपने वजूद की लड़ाई लड़ते ही रहे हैं कई स्तर पर, जैसे निदा फाजली ने कभी लिखा था, “गीत बहुत सुंदर है लेकिन सच सच कहना यार, पिछले हफ्ते बिन भोजन के सोये कितनी बार…” … ये चमकती हुई दुनिया का स्याह सच है गीतकारों के हिस्से का।

आखिरी बात कहने के लिए गुलजार साहब के एक गीत को याद करना ठीक लग रहा है। जयपुर के ही एक संगीतकार हुए हैं, दान सिंह, जिन्‍होंने कम फिल्मों में संगीत दिया है। उनके संगीत में सजे आखिरी गीत के गीतकार रामुकमार सिंह हमारे बीच में हैं। “वो तेरे प्यार का गम, एक बहाना था सनम” के इस संगीतकार के ही संगीत में एक गीत था, गुलजार साहब का लिखा हुआ, “पुकारो मुझे नाम लेकर पुकारो मुझे तुमसे अपनी खबर मिल रही है”। मेरी मुराद यही है कि गीतकारों की पहचान का संकट बड़ा दुखद है। हमारे समय के पचासेक दोस्तों-परिचितों को उनके प्रिय गीत पूछता हूं, तो उन्हें उसके गीतकार का नाम नहीं याद होता। प्राय: उन्हें इरशाद कामिल बताता हूं, तो उन्हें नाम सुनके हैरानी और परेशानी होती है। मेरे साथ के गीतकार दोस्तो! आपके नाम को कई दोस्तों के जेहनों में आपके गीतों के साथ चस्पां करने का काम इस खाकसार ने किया है। मुझे शुक्रिया तो कहो… यहां हाजिर खवातिनों-हजरात से भी एक पल सोचने की गुजारिश करता हूं कि सोचिए अपने पसंदीदा गीतों के बारे में, मुझे खुशफहमी में रहने दीजिएगा कि अविनाश भाई के न्यौते पर आये तमाम लोग कम से कम अपने पसंदीदा गीतों के गीतकार, संगीतकार का नाम जानते होंगे, इरादतन जानते होंगे।

नये मुहावरे और भाषा की बात करते हुए गुस्ताख हो गया हूं और बात को कहीं और ले गया हूं। ये इल्म मुझे है। मुझे सलीके कहां आते हैं, तभी मैंने कभी कहा था, “सलीका प्यार करने का जरा सा भी नहीं आता, हवाओं को मनाता हूं, परिंदे रूठ जाते हैं।”

माफ कीजिएगा। जरूरी लगा, सो कह दिया।

Dr Dushyant(डॉ दुष्‍यंत। युवा कवि, कथाकार, पत्रकार। राजस्‍थान के श्रीगंगानगर के निवासी। पिछले सोलह बरस से जयपुर में। इतिहास में पीएचडी की, उसके बाद नाम के आगे डॉक्‍टर जुड़ा। दुष्‍यंत ने कई किताबें लिखीं। उनकी पांचवी किताब “जुलाई की एक रात” कहानी संग्रह के रूप में हाल ही पेंगुइन से आयी है। इससे पहले दो कविता संग्रह, एक अनुवाद की किताब के बाद पिछले साल राजकमल प्रकाशन दिल्ली से एक नॉन फिक्शन की किताब “स्त्रियां पर्दे से प्रजातंत्र” भी आ चुकी हैं। हाल ही बॉलीवुड की चर्चित संगीतकार स्नेहा खानवल्कर के संगीत निर्देशन में एमटीवी के लिए एक गीत लिखा है। उनसे dr.dushyant@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *