यौनिकता महज विपरीत लिंगों की मोहताज नहीं है

♦ अविनाश

Oonga
Dir. Devashish Makhija
(India/2013/Col./98′)

तरम तरम तर तरा तरम तरम तर तरा
चरखी बोले फर फरा फर फरा
हमन आदिवासी हमन मूलवासी

कंपनियां पैदा हो रही हैं और आदिवासी खत्म हो रहे हैं। कानून चक्रव्यूह में बदल रहे हैं और सत्ता साजिशों के सुरक्षा कवच में बदल रही है। इस खौलती हुई सच्चाई को भारत का सिनेमा क्यों नहीं देख रहा था, मुझे यही हैरानी थी। खुश हूं की ऊंगा (Oonga) देख कर निकल रहा हूं। उड़ीसा के आदिवासी गांवों पर सरकारी कब्जे की इस कहानी में एक बच्चा है ऊंगा, जो मेले में रामलीला की कहानी देखने को लेकर बेचैन है। गांव है, जिस पर अल्यूमिनियम कंपनी की नजर है। प्रवासी नक्सली हैं, जो अपने और उजड़ते हुए गांव के अस्तित्व को लेकर चिंतित हैं। एक स्कूल टीचर है, जो हिंसा से इतर शांतिवार्ता से सब ठीक हो जाने की उम्मीद रखती है। सीआरपीएफ का कैंप है, जिन्हें हर कीमत पर गांव के अधिग्रहण का आदेश मिला हुआ है। संघर्ष की राजनीति का मुश्किल पक्ष छोड़ दें, तो पूरी फिल्म न्याय-अन्याय को सहज तरीके से दिखाती है। Raj Shekhar ने बहुत खूबसूरत गाने लिखे हैं।

Good Morning Karachi
Dir. Sabiha Sumar
(Pakistan/2013/Col./85′)

पाकिस्‍तान में भी कमोबेश भारत जैसा ही निम्‍न मध्‍यवर्ग है और उसकी वही महत्‍वाकांक्षाएं और छटपटाहट है, जो यहां है। मर्द दोनों ही मुल्‍कों में भीतर से मर्दाना तबीयत के हैं और आजादी की ख्‍वाहिश स्त्रियों में दोनों ही तरफ बराबर सुलग रही है। यही वजह है कि “खामोश पानी” वाली सबीहा सुमर की फिल्‍म “गुड मॉर्निंग कराची” की कहानी हिंदुस्‍तान की कहानी जैसी लगती है। रफीना युवा है और रेडियो पर अंग्रेजी के समाचार सुन कर अपनी अंग्रेजी लगातार दुरुस्‍त करती है, करियर की जादुई कालीन पर उड़ना चाहती है। उसकी अम्‍मी उसके लिए शौहर के सपने देखती है। सफीना की एक खाला है, जो एक मॉडल कंपनी में ब्‍यूटिशियन है, वह सफीना के सपनों का साथ देती है। खाला का बेटा आरिफ रफीना का मंगेतर है और बेनजीर भुट्टो की पार्टी का मामूली कार्यकर्ता है। मंगेतर बनने से पहले वह सफीना के काम करने के इरादे को खुशरंग तरीके से सपोर्ट करता है, पर मंगेतर बनने के बाद उसे लगता है कि वह उर्दू बोल ले और शौहर की खिदमत में खुद को कुर्बान कर दे – यही बहुत है। पर सफीना रुकती नहीं, आगे बढ़ती जाती है और शौहरशुदा जिंदगी की सरहद लांघ जाती है। पूरी कहानी बहुत कायदे से एक पॉलिटिकल अंडरकरंट के बीच चलती है, जब पाकिस्‍तान में पीपीपी की वापसी हो रही है और बेनजीर भुट्टो मारी जाती है।

Sulemani Keeda
Dir. Amit V Masurkar
(India-USA/2013/Col./90′)

सुलेमानी कीड़ा एक गजब का मुहावरा है, जो बॉलीवुड में आम है। यही नाम है अमित वी मसुरकर की फिल्‍म का। सिनेमा के दो संघर्षरत राइटर्स की कहानी है। दोनों के रिश्‍ते बड़े कमाल के हैं और दोनों की जबान एकदम मटन बिरियानी जैसी है। भाषा में ताजगी के साथ रची गयी इस फिल्‍म में बॉलीवुड की समकालीनता की धज्जियां उड़ायी गयी है। नये लोगों के साथ बेहतर कथानक और रचाव की संभावनाएं हमारे सिनेमा में खुल रही हैं। फुकरे के बाद सुलेमानी कीड़ा एक रिफ्रेशिंग अनुभव है। “जाम नाम सत्‍य है” की तरह इस फिल्‍म ने नये मुहावरों के कई सोशे छोड़े हैं, जो प्रचलन में आएंगे।

Hush… (Suti…)
Dir. Lukas Nola
(Croatia/2013/Col./86′)

पुरुष एक क्रूर, गैरजिम्‍मेदार और डरपोक जीवन स्थिति है। स्‍त्री होना नियति की एक विडंबना जैसा है। धरती के हर हिस्‍से में सभ्‍यता के इस मोड़ पर भी यह एक सच है, क्‍योंकि लुकास नोला की फिल्‍म सुति (हुश) सिर्फ एक फिल्‍म नहीं है, वह सच का पीछा करती हुई एक कहानी है। बेबा का बाप शैतान का दूसरा नाम है। बीमार मां के इंतकाल के बाद बेबा का बाप उसकी दलाली करता है और उसके साथ बलात्‍कार का अंतहीन सिलसिला शुरू करता है। बेबा के भाई और अपने ही बेटे को वह हवस की झोंक में मार डालता है। बेबा एक नर्सिंग कारखाने में पनाह पाती है और जब उसका घर बसता है, उसका पति भी उसके बाप का हमराह निकलता है। बेबा को लगता है कि उसकी बेटी का भविष्‍य भी उसकी तरह अंधेरे का शिकारगाह हो जाएगा। वह उसे एक सुरक्षित सफर में भेज कर हमेशा के लिए अपनी रूह को आजाद कर देती है। फिल्‍म देख कर ऐसा मन अशांत हो जाता है कि आप तुरत बाद का वक्‍त सिर्फ अपने साथ गुजारना चाहेंगे। यही वजह है कि मैं फिल्‍म खत्‍म होते ही तेज भागता हुआ इनफिनिटी की खाली लॉबी में घुस गया।

Blue Is the Warmest Colour
Dir. Abdellatif Kechiche
(France/2013/Col./179′)

यौनिकता महज विपरीत लिंगों की मोहताज नहीं है, वह समलिंगी एहसास भी है और पूरी तरह से प्राकृतिक है। दुनिया भर में समलिंगियों के बीच आकर्षण अपने सह-अस्तित्‍व की लड़ाई लड़ रहे हैं और जीत रहे हैं। फिर भी हमारी सामाजिकता उसकी स्‍वाभाविकता की पहचान करने से परहेज कर रही है, हिचकिचा रही है। Abdellatif Kechiche की फिल्‍म Blue Is the Warmest Colour: La vie d’Adèle इस मसले को बहुत उदात्‍त ढंग से सुलझाती है, समझाती है। यह फ्रेंच फिल्‍म अडेले नाम की एक लड़की की कहानी है, जो जीवन का पहला यौन संबंध अपने स्‍कूल के साइंस सीनियर के साथ बनाती है। इस रिश्‍ते में उसे सुख का क्षणिक एहसास तो होता है, पर इस एहसास में उसे स्‍थायित्‍व नजर नहीं आता। धीरे-धीरे वह महसूस करती है कि वह लड़कों के मुकाबले लड़कियों की तरफ ज्‍यादा आकर्षित होती है। उसकी जिंदगी में एम्‍मा नाम की एक युवा चित्रकार आती है और दोनों सहजीवन में जाते हैं। दोनों एक दूसरे को लेकर पजेसिव हैं और रिश्‍ते की कांच जब गलतफहमी के पत्‍थर से चटकती है, दोनों अधूरे हो जाते हैं। यानी स्‍त्री-पुरुष के रिश्‍तों की तरह के ताने-बाने समलिंगी रिश्‍तों में भी नजर आते हैं, ब्‍लू इज द वार्मेस्‍ट कलर यही कहना चाहती है।

इस फिल्‍म को Cannes Film Festival 2013 में Palme d’Or और FIPRESCI पुरस्‍कार मिल चुका है और कई स्‍क्रीनिंग के बाद जनता की बदहवास मांग पर इसकी री-स्क्रिनिंग 21 तारीख की रात साढ़े दस बजे की गयी। मैं पहले इसे छोड़ चुका था, क्‍योंकि लेस्बियन सेक्‍स पर फिल्‍म देखने की अरुचिकर भावना काम कर रही थी। अच्‍छा लगा कि फिल्‍म ने मुझे गलत साबित किया।

(अविनाश। मोहल्‍ला लाइव के मॉडरेटर और सिने बहसतलब के संयोजक। प्रभात खबर, एनडीटीवी और दैनिक भास्‍कर से जुड़े रहे हैं। राजेंद्र सिंह की संस्‍था तरुण भारत संघ में भी रहे। उनसे avinash@mohallalive.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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