यौन हिंसा के खिलाफ मिस वर्ल्‍ड की मुहिम पर वृत्तचित्र

♦ उमेश पंत

मुंबई फिल्म फेस्टिवल के चौथे दिन ट्रैफिक से बचने की गरज से जल्दी घर से निकल आये। नौ बजे के करीब हम इनफिनिटी आ पहुंचे थे। पहली फिल्म शुरू होने में अभी सवा घंटा शेष था। इनफिनिटी मॉल भी अब तक खुला नहीं था। इसलिए नाश्ते की सारी संभावनाएं भी जाती रही। फेस्टिवल के प्रवेश द्वार की सीढ़ियों पे बैठे कुछ वक्त काटा। इस बीच धीरे-धीरे लोग आने लगे थे।

गिने-चुने उन लोगों में से एक अंकल फेस्टिवल के किसी वॉलेंटियर की मदद से आज की फिल्मों का पंजीकरण करा रहे थे। जोर-जोर से फिल्मों का नाम लेते हुए वो लड़की को अपनी पसंदीदा फिल्मों के नाम बता रहे थे। नीली कमीज पहने वो बुजुर्ग अंकल कुछ देर में हमसे कुछ दूर पर आकर ऊपर वाली सीढ़ियों में बैठ गये। खुद ही बातचीत का सिलसिला शुरू किया। बोले ये रजिस्ट्रेशन वगैरह तो घर पर ही हो जाता, पर वहां तो सब सोये हुए हैं। किसी को कोई मतलब ही नहीं है। घर पर कैटलॉग खोलकर फिल्मों के बारे में पढ़ रहा होता हूं, तो कहते हैं कि इस काम में इतना फिजूल दिमाग क्या खपाना। फिल्म ही तो देखनी है। फिर कुछ रुककर बोले – अब उन्हें क्या पता कि इतनी अच्छी फिल्में देखने का मौका बार-बार कहां मिलता है, उन्हें तो टाइम ही नहीं है किसी चीज का।

कुछ ही देर में हम जैसे उनके राजदार हो गये थे। वो हमें बता चुके थे कि उनकी पत्नी को उनकी कोई कदर नहीं है। घर में उनकी नयी रिट्ज है, पर चलानी नहीं आती इसलिए बच्चे ही उसे चलाते हैं। मां बच्चों को रूपये पैसे दे देती है, तो बच्चे उनकी ही खातिरदारी करते हैं। मेरे पैर में ये चोट नहीं आयी होती, तो मैं तो अब भी अपने सारे काम खुद ही कर लेता था। खाना भी बना लेता हूं। अब थोड़ी दिक्कत हो जाती है। लब्बोलुबाब समझाते हुए वो हमसे बोले कि बेटा शादी में कोई जल्दबाजी मत करना। बहुत वक्त का गुबार था शायद जो निकलना चाहता था। हम उनकी बातें कभी मुस्‍कुराकर, तो कभी सहानुभूति में चेहरा हिलाकर गौर से सुन रहे थे। इतना तो समझ आता ही है कि कई बार बस बात साझा भर कर लेने से मन हल्का हो जाता है। जिससे साझा किया जा रहा हो वो अजनबी ही सही।

कुछ देर में भीड़ बढ़ गयी। अंकल के कुछ दोस्त भी वहां आ गये। यहीं सो गये थे क्या? उनमें से एक ने हंसते हुए कहा। ये भी अच्छा आइडिया है, उन्होंने जवाब दिया। बुजुर्गों की वो टोली बात करती हुई आगे बढ़ गयी। जैसे अभी अभी कोई आधी अधूरी सी फिल्म जिंदगी के किसी थियेटर में देख ली थी मैंने। फिल्में देखना भी तो ऐसा ही होता है। अजनबियों से मिलना जिन्हें आप अब तक जानते भी नहीं थे। फिल्म पूरी हो जाने के बाद आप उन्हें उनसे बेहतर जानने लगते हैं। उनके बारे में सोचकर उनकी भावनाओं में शामिल होने लगते हैं।

खैर भीड़ लगातार बढ़ रही थी। दस बजने को आया था। देखते ही देखते एंट्री गेट से शुरू होकर वहां एक पंक्ति बन गयी। उस पंक्ति में रंग-बिरंगे कपड़े पहने कई तरह के चेहरे शामिल हो गये। कुछ एक चेहरे, जिन्हें पहले दिनों में शायद देखा था, याद रह गये थे। कुछ चेहरे बिल्कुल अजनबी। वक्त बढ़ रहा था। लोग बढ़ रहे थे। लाइन बढ़ रही थी, पर प्रवेश की अनुमति अब भी नहीं मिली थी। कुछ देर बाद जब फिल्म शुरू होने में बस 10 मिनट बचे थे, मैनेजर सरीखा एक अधेड़ आदमी आया और उसने बताया कि सुबह के सारे शो कैंसल हो गये हैं। इतनी सुबह सुबह वक्त निकाल कर आप इतनी दूर से यहां पहुंचे और यहां आकर शो कैंसल हो गया? सुनकर लगा कि इससे ज्यादा गैरजिम्मेदाराना रवैय्या और क्या हो सकता है? खैर लोगों ने बहस की। वहीं डटे रहे और कुछ देर में शो के लिए एंट्री शुरू हो गयी। लगा कि जब समस्या इतनी छोटी थी कि 10 मिनट में सुलझा ली गयी, उस मैनेजर सरीखे आदमी को इतने सारे लोगों की उम्मीदों को कुछ मिनटों के लिए ही सही तोड़ने की क्या जल्दी थी। खैर सारा गुस्सा थिएटर में प्रवेश के साथ जाता रहा।

यौन हिंसा की खिलाफत करती एक बहादुर सुंदरी

ब्रेव मिस वर्ड नाम की एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म से दिन की शुरुआत हुई। इजराइली सुंदरी लिनॉर अबार्गिल 1998 में मिस वर्ड चुनी जाती हैं। उन्हें ताज पहनाया जाता है, पर दुनिया नहीं जानती कि विश्व सुंदरी बनने से ठीक दो महीने पहले वो एक ऐसे अतीत से गुजरी हैं जिसे एक औरत का दु:स्वप्न कहा जा सकता है। उनके सर पर ताज है और आंखों में आंसुओं के साथ वो दो महीने पहले बीता वो लम्‍हा जब उनका बलात्कार किया गया था। दस साल उन्होंने इस घटना को राज रहने दिया, लेकिन दस साल बाद वो इसे दुनिया के सामने जाहिर करने का फैसला करती हैं और फैसला करती हैं कि वो दुनिया भर की महिलाओं को चुप न रहने का संदेश देंगी।

वो दुनिया भर में यात्राएं करती हैं। बलात्कार पीड़ित महिलाओं से मिलती हैं। इन महिलाओं में हर उम्र की महिलाएं हैं। कुछ जो कई सालों तक इस राज को दबाये रहीं। कुछ जिन्होंने इसका विरोध किया। कुछ जो इसे नियति मान कर चुप रह गयीं। लिनॉर अपनी इस यात्रा में साउथ अफ्रीका पहुंचती हैं जहां की महिलाओं में बारे में कहा जाता है कि उनके बलात्कार की संभावनाएं उनके शिक्षित होने की संभावनाओं से भी ज्यादा है। वो उन पुरुषों से भी मिलती हैं, जिन्हें यौन हिंसा से गुजरना पड़ा है। इन यात्राओं में उनकी यौन हिंसा से प्रताड़ित सैकड़ों औरतों से मुलाकात होती है। वो दूसरों के दर्द को बांट रही हैं ताकि उनका दर्द कम हो।

लेकिन जब एक सेलिब्रिटी ट्रायल के वक्त वो कोर्ट में शामिल होती हैं, तो टूट जाती हैं। उनकी हिम्मत जवाब देने लगती है। अपने भीतर के दर्द का मुकाबला उन्होंने कई महिलाओं के भीतर के दर्द को बाहर लाकर करना चाहा है। पर बाहर आकर जैसे वो दर्द उनके दर्द को और बड़ा कर देता है। किसी तरह वो संभलती हैं और अपनी लड़ाई को जारी रखने का फैसला करती हैं। सिसीलिया पीक द्वारा निर्देशित ये डॉक्यूमेंट्री फिल्म औरत और आदमी दोनों के भीतर की उन यौन प्रताड़नाओं को जाहिर करने का संदेश देती है, जिनके भीतर रहने से न केवल एक इंसान के रूप में आप कमजोर पड़ रहे होते हैं बल्कि इससे प्रताड़ित करने वाले वर्ग को बढ़ावा भी मिलता है।

इस फिल्म को देख लेने के बाद चुलबुले से तकरीबन 60 साल के एक व्यक्ति मिले। उन्होंने बताया कि वो जमशेदपुर से यहां छुट्टी लेकर फिल्में देखने आये हैं। फिल्मों की दीवानगी ऐसी कि वो बच्चों की तरह नाक सिकोड़ कर बताते हैं कि हम तो ओपनिंग और क्लोजिंग सेरेमनी के पास के लिए इतना गिड़गिड़ाते हैं। फिर उनको पता चलता है कि मेरे पास प्रेस कार्ड है तो वो मुसकुराकर बच्चों सी जि़द कर बैठते हैं आप नहीं जा रहे तो मुझे पास दे देना। कम से कम किसी का भला हो जाए। फिर वो हंसने लगते हैं। किसी बच्चे सी मासूम हंसी। ये फिल्मों की दीवानगी उन खिलौनों की सी दीवानगी लगती है, जिन्हें मेलों में देखकर बच्चे ललचा जाते हैं। शायद तभी वही व्यक्ति जब ब्लू इज द वार्मेस्ट कलर नाम की फिल्म स्क्रीन कर रहे थिएटर की लाइन में तकरीबन सबसे पीछे खड़े होकर मुझे देखकर कहते हैं – इस फिल्‍म का आधा घंटा छूट गया है, वो देखकर मैं भी ऑटम ब्लड देखने आपके साथ आ जाऊंगा। कहकर वो शरारती आंखों से मुझे देख फिर हंस पड़ते हैं। स्क्रीन का दरवाजा खुल जाता है। मैं स्क्रीन की ओर बढ़ जाता हूं। उनकी वो अधेड़ शक्ल ओढ़ी बालसुलभ मुस्कुराहट अब भी आंखों में ताजा रह जाती है।

बंदूकें, डर और मासूम बच्चे

टम ब्लड परदे पर चलने लगती है। सभ्यता से कटा सा एक पहाड़ी गांव। एक अजीब सी जनशून्यता। इस जनशून्यता के बीच एक विधवा औरत अपनी 16 साल की टीनेज लड़की और 10 साल के बेटे के साथ रहती है। बेटा किसी ट्रॉमा की वजह से बोल नहीं पाता। कुछ वक्त बाद औरत अपने बच्चों को अकेला छोड़कर दुनिया से चली जाती है। गांव के मेयर के लड़के की 16 साल की उस लड़की पर बुरी नजर है, जिसे शायद अभी ये भी नहीं पता कि बुरी नजर के मायने आखिर होते क्या हैं। नदी में उन्‍मुक्त नहाने के बाद वो मद्धम सी धूप का आनंद ले रही है कि तभी मेयर का लड़का वहां पहुंचकर उसका बलात्कार करता है। इस घटना के बाद लड़की डरी हुई है। खून से लथपथ वो किसी तरह घर लौटती है। उसका भाई उसे इस हालत में देखता है। वो अपनी बहन को सहारा देता है। दोनों की मदद करने के लिए अब कोई नहीं है। इसलिए दोनों अपनी मां की मौत को बाहर वालों से छुपा रहे हैं। लेकिन एक रात फिर मेयर का लड़का अपने दोस्तों के साथ उसके घर पर आता है। फिर लड़की के साथ जबरदस्ती करता है।

इस बीच एक औरत जो सामाजिक कार्यकर्त्री है, किसी दूर शहर से आती है, उसे इस लड़की के बारे में पता चलता है। वो उसकी मदद करने उसके घर की तरफ आती है लेकिन भाई को लगता है कि ये वही लोग हैं जिन्होंने उसकी बहन के साथ बदसलूकी की। वो अपनी बहन को छुपा लेता है। मदद का एक मौका दोनों खो देते हैं। औरत छानबीन करके चली जाती है। उसके ठीक बाद मेयर के लड़के और उसके दोस्त इन्हें मारने की फिराक से घर आते हैं। लड़की और उसका भाई किसी तरह भागने में कामयाब हो जाते हैं। इस सुनसान पहाड़ी में दो असहाय बच्चे भाग रहे हैं और उनके पीछे तीन राइफलधारी गुंडे पड़े हैं। इसी भागादौड़ी से जूझती फिल्म के आखिर में बच्चे अपने घर लौट आते हैं, मेयर अपने ही बेटे की हत्या कर देता है और सामाजिक कार्यकर्त्री बच्चों को अपने साथ लेकर चली जाती है।

ऑटम ब्लड को किसी कारण से देखा जा सकता है तो वो है उसकी सिनेमेटोग्राफी। बेहतरीन फिल्मांकन को छोड़ दें तो इसकी कहानी में ऐसा कुछ नहीं है, जो आपको बांधता हो। या यूं कहें कि कोई खास कहानी है ही नहीं। खैर फिल्म फेस्टिवल में शामिल हुई तो उसकी कुछ तो वजहें रही होंगी। पर वो जो भी वजहें हों आखिर में निराश करती हैं। फिल्म का आखिरी भाग तो बेहद निराशाजनक है।

इस फिल्म से टूटी उम्मीदों को लेकर अगले दिन की फिल्मों से नयी उम्मीदें लगाकर मैं घर लौट आता हूं। पांचवें दिन फेस्टिवल न जाने का फैसला करने के बाद देखते हैं छठे दिन कितनी फिल्में देखने का मन होता है। फेस्टिवल के आखिरी दो दिनों में कुछ अच्छी फिल्मों को देख पाने की लालसा रहेगी। देखते हैं कि फिल्में देखने का ये सिलसिला कितने और अनुभव इस डायरी में शामिल करने का मौका देता है।

(उमेश पंत। सजग चेतना के पत्रकार, सिनेकर्मी। सिनेमा और समाज के खास कोनों पर नजर रहती है। मोहल्‍ला लाइव, नयी सोच और पिक्‍चर हॉल नाम के ब्‍लॉग पर लगातार लिखते हैं। फिलहाल यूपी से ग्रामीण पाठकों के लिए निकलने वाले अखबार गांव कनेक्‍शन से जुड़े हैं। उनसे mshpant@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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