मस्‍तराम को खोज नहीं पाया हिंदी सिनेमा #MAMI

♦ अविनाश

नींद लगभग सुबह आयी और तीन घंटे बाद नौ बजे एक बार आंख खुली तो लगा जल्दी करूंगा तो क्लोज्ड कर्टेन्स देख सकता हूं। शो दस बजे से था और नाश्ते की रोटी बनाना छोड़ कर फिल्म देख सकता था। फटाफट तैयार होकर निकल पड़े और दस मिनट में सिनेमैक्स आ गया।

Closed Curtains
Dir. Jafar Panahi, Kambozia Partovi
(Iran/2013/Col./106′)

फर पनाही एक अलग शैली के रचनाकार हैं। अपने मुल्क में नजरबंदी के शिकार हैं। कमबोजिया पारतोवी के साथ मिल कर उन्होंने घर के भीतर ही एक कहानी रची है, क्लोज्ड कर्टेन्स। घर में सिर्फ एक वृद्ध है और एक कुत्ता है। इस्लामिक परंपरा में चूंकि कुत्ता अपवित्र जीव है, उसे घर में रखना धार्मिक जुर्म है। वह बूढ़ा पूरी सोसाइटी से खुद को काट चुका है, क्योंकि भावनात्मक रूप से कुत्ते पर निर्भर है। बूढ़े ने हर रोशनदान और बालकनी पर बड़ी बड़ी काली चादर लटकायी हुई है। एक दिन अचानक दो अजनबी आकर जबरन उस घर के अंधेरे की सारी गिरहें खोल देते हैं।

फिल्म की स्टाइल ऑब्सर्ड है। खत्म होती हुई कहानी में घुस कर जफर पनाही किरदारों को फॉलो करते हैं और जब कहानी खत्म हो जाती है, किरदार डायरेक्टर को फॉलो करते हैं।

Mastram
Dir. Akhilesh Jaiswal
(India-Hindi/2013/Col./100′)

खिलेश जायसवाल की फिल्‍म “मस्‍तराम” का पोस्‍टर कुछ दिनों पहले मैंने फेसबुक पर शेयर किया था। अच्‍छा लगा था कि इस विषय को छूने का साहस अखिलेश ने दिखाया। क्‍योंकि हमारे यहां सेक्‍स शिक्षा नहीं है और इसकी खुली चर्चा पर परिवार और समाज में अघोषित प्रतिबंध है, मर्द भारत की जुगुप्‍साएं मस्‍तराम की किताबों में शांत होती रही हैं। लेकिन सिनेमा इस व्‍यापक मसले को पूरे वितान में उठाने के बजाय मस्‍तराम नाम के उस व्‍यक्ति की कहानी रचने में लग गया, जो शायद कोई एक आदमी था ही नहीं।

मस्‍तराम एक अदृश्‍य रचनाकार था और देश के कई इलाकों में पाया जाता था। मजाहिया शायर चिरकन की शायरी से पहले भी सड़कछाप साहित्‍य रहा है। गद्य में संभवत: पहली बार मस्‍तराम ने स्‍वानंद की चिंगारी लगायी होगी, लेकिन वह यकीनन एक शख्‍स नहीं रहा होगा। प्रकाशक की ओर से दिया गया काल्‍पनिक नाम होगा और उसके लेखक भाषा के कई विद्यार्थी-शोधार्थी रहे होंगे। सिनेमा कहता है कि सत्तर के दशक में कोई राजाराम थे, जो उपन्यासकार बनना चाहते थे और पैसे के लिए अश्‍लील कहानियां लिखने लगे। रहस्‍यमय इतिहास को तलाशने की यह तार्किक रूप से कमजोर समझदारी है।

बनारस में एक लंठ बनारसी लगभग रोज अस्‍सी घाट पर मिल जाते हैं। उनकी उम्र करीब सत्तर साल है और वे अश्‍लील छंद की पूरी पोथी मजे लेकर बांचते हैं। उनका भरा पूरा परिवार है और वे सामाजिक रूप से स्‍वीकृत शख्‍सीयत हैं। हर आदमी उनसे बात करता है और मजाक करता है। कोई उन्‍हें ये एहसास नहीं दिलाता कि ये खराब कविताएं हैं, बल्कि रसिकजन तो रोज उनसे नयी फरमाइश करते हैं। मस्‍तराम की कहानियों का रस उनके जीवन का रस भले न हो, उनकी कल्‍पनाओं का रस जरूर रहा होगा। अपनी लेखनी में असली मस्‍तराम को भले कोई अस्‍वाभाविकता नहीं लगती हो, लेकिन फिल्‍म में वह एक गिल्‍ट के साथ इन कहानियों का सफर तय करते हैं।

एक बेहद मामूली फिल्‍म, जिसने इस विषय में छिपी अनंत संभावनाओं की भ्रूण हत्‍या कर दी। काश कि उस वक्‍त Amat Escalante की “हेली” देख ली होती, जिसके बारे में अब तक कई लोग पूछ चुके हैं – देखी कि नहीं?

Toilet Blues
Dir. Dirmawan Hatta
(Indonesia/2012/Col./87′)

ब हम युवा हो रहे होते हैं, हमारी मानसिक आंधियां एक बेचैन निरंतरता में बहती रहती है। इंडोनेशिया के Dirmawan Hatta की फिल्‍म Toilet Blues अंजनि और आंग ली की कहानी है, जो एक निरुद्देश्‍य यात्रा पर हैं। अंजनि अपनी तरह से जिंदगी जीना चाहती है और पिता के अनुशासन से बगावत करके घर से निकलती है। आंग ली भी उसके साथ है और वह धर्म और धार्मिक मान्‍यताओं के आकर्षण में इस कदर बंधा है कि जब अंजनि उसे यौन रिश्‍ता बनाने के लिए उकसाती है, वह कहता है – ब्‍लासफेमी सही नहीं। पाप और पुण्‍य का वह बुरी तरह से लिहाज करता है। अंजनि का बाप उसके पीछे एक जासूस लगाता है और जब वह अंजनि को खोज लेता है, आंग ली की राह अलग हो जाती है। आंग ली एक वेश्‍या के जरिये अपनी आध्‍यात्मिक यात्रा शुरू करता है। उधर अंजनि जासूस को लगातार यौन संबंध के लिए उकसाती है और अंतत: वर्जिनिटी से मुक्‍त होने में कामयाबी पा जाती है। टॉयलेट ब्‍ल्‍यूज़ धीमी रफ्तार की खूबसूरत फिल्‍म है।

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