आखिरी दिन युद्ध, हत्‍या, कैद और सूचना का सिनेमा

Amen
Dir. Costa Gavras
(France-Germany-Romania/2002/Col./132′)

युद्ध नैतिक नहीं होता। जीतने की महत्वाकांक्षाएं युद्ध के नियम तय करती हैं। दूसरे विश्वयुद्ध में यहूदी नागरिकों के खिलाफ जर्मनी के रुख पर कई ऐतिहासिक फिल्में हैं, लेकिन Costa-Gavras की आमेन (Amen) राजसत्ता की तब की क्रूरताओं के साथ धर्म की दरियादिली का पर्दाफाश करने वाली बहुत ताकतवर फिल्म है। कर्ट जर्स्टेन सैनिटेशन इंजीनियर है और सैनिकों के लिए पानी शुद्ध करने वाली फैक्ट्री का प्रमुख है। उसे जर्मन सैनिकों के कंसनट्रेशन कैंप में प्लेग फैलने से रोकने के लिए लेथल गैस बनाने की जिम्मेदारी दी जाती है। इस नये मोर्चे को समझने के लिए की जा रही यात्राओं के दौरान वह हिटलर का गैस चैंबर देखता है, जहां रोज हजारों यहूदी तड़पा तड़पा कर मारे जाते हैं। वह भीतर से हिल जाता है। इस कारनामे को गोपनीय तरीके से अंजाम दिया जा रहा है, लेकिन कर्ट इस क्रूरता को दुनिया के सामने एक्सपोज करना चाहता है। वह वैटिकन के पोप तक मय-सबूत गैस चैंबर की दुर्दांत सच्चाई पहुंचाने में कामयाब हो जाता है, लेकिन पोप की उदासीनता उसे हैरान कर देती है। राज्य के इस व्यवस्थित अपराध से व्यथित होकर होकर वह आत्महत्या कर लेता है।

Costa-Gavras की यह फिल्म दिल दहला देने वाली है। कल उनकी Le Capital देखने के बाद तय किया था कि आमेन जरूर देखनी है। 2002 में बनी इस फिल्म का शो आज मुंबई के धोबीतालाब (मेन टाउन) में था, तो आज का सारा टिकट इधर का ही बुक किया। अविस्मरणीय फिल्म देखने की फेहरिस्त में इस इजाफे ने अद्वितीय संतोष दिया, इससे बहुत खुश हूं।

Z
Dir. Costa Gavras
(France-Algeria/1969/Col./127′)

राजसत्ता अमीरों के लिए जितनी पारदर्शी होती है, वंचितों के लिए उतनी ही धुंधली होती है। फ्रेंच फिल्‍म Z मामी में देखी गयी Costa-Gavras की तीसरी राजनीतिक फिल्‍म थी, जिसने इस तथ्‍य को तार्किक तरीके से हमारे सामने रखा। पिछले साल दिबाकर बनर्जी की शंघाई देखी थी, जो Z का ही भारतीय संस्‍करण थी। तो कहानी लगभग लगभग पता थी और शंघाई की छाया में हम Z को देखने की कोशिश कर रहे थे। Z ज्‍यादा मेच्‍योर और व्‍यंग्‍यात्‍मक तरीके से राज्‍य और जनविरोधी निजीकरण के उत्‍पादक तत्‍वों के गठजोड़ को हमारे सामने रखती है। कम्‍युनिस्‍ट लीडर एक ग्रीक शहर में अपनी सभा के लिए आता है, लेकिन पुलिस की मदद से लुंपैन तत्‍व उसकी हत्‍या कर देते हैं। एक ईमानदार प्रशासनिक अधिकारी उसकी हत्‍या की जांच करता है। राज्‍य उसकी जांच को विश्‍वसनीयता की चादर ओढ़ाते हुए पुलिस वालों को सजा तो दिलवा देता है, लेकिन बड़ी चालाकी से उस कंपनी को बचा लेता है – जो इस हादसे का मुख्‍य षड्यंत्रकारी है। हालांकि वह Z की कहानी में प्रत्‍यक्षत: सामने नहीं है। यह फिल्‍म 1972 में बनी थी। यानी आज से चालीस साल पहले। पर ये हमारे समय की कहानी लगती है, क्‍योंकि हम देख रहे हैं कि राज्‍य का दमन और निजी कंपनियों के साथ उसके (रियायत और सहूलियत के) रिश्‍ते और अधिक सघन हो गये हैं।

Five Years
Dir. Stefan Schaller
(Germany/2013/Col./95′)

भ्‍यताओं का संघर्ष कैसे सांप्रदायिकता की कमीज पहन कर कोहराम कर रहा है, Stefan Schaller की फिल्‍म Five Years [5 Jahre Leben] में देखने को मिलता है। मुरात करनाज़ एक जर्मन मुसलमान है। इत्तेफाक से पाकिस्‍तान में उसे अमेरिकी पुलिस गिरफ्तार कर लेती है। चूंकि करनाज़ से खान की ध्‍वनि आती है, उसे आतंकवादी समझ लिया जाता है। उसे दक्षिण पूर्व क्‍यूबा के एक शहर गुआंटानामो के मुश्किल कैदखाने में भेज दिया जाता है, जहां उसे पांच साल तक बुरी तरह से प्रताड़ित किया जाता है। एक अमेरिकी एजेंट को उससे पूछताछ करने और उससे अपराध स्‍वीकार करवाने का जिम्‍मा सौंपा जाता है। आखिर में पता चलता है कि वह निर्दोष है और आतंकवादियों से उसका कोई संबंध नहीं है। उसे रिहा कर दिया जाता है, लेकिन उसकी जिंदगी के पांच बेहतरीन साल सिर्फ इसलिए जेल की चारदीवारियों में गुम हो गये, क्‍योंकि वह मुसलमान था। यह दुनिया भर के मुसलमानों की त्रासदी है। हिंदी सिनेमा के हमारे हीरो शाहरुख खान को अमेरिका में कई बार इसी वजह से अपमानित होना पड़ा है। यह फिल्‍म इतनी इनगेजिंग है कि खत्‍म होने के बाद काफी देर तक आप खामोश रहना चाहेंगे। इसलिए जब आखिर के क्रेडिट रोल के वक्‍त निर्देशक Stefan Schaller परदे के सामने आकर हमारी ओर देख रहे थे और कह रहे थे, एनी क्‍वेश्‍चन, तो निकलते हुए मैंने उनकी तरफ हाथ बढ़ा कर कहा – नो सर, विदाउट क्‍वेश्‍चेनेबल… योर फिल्‍म इज सो गुड।

The Fifth Estate
Dir. Bill Condon
(USA-Belgium/2013/Col./124′)

ह सदी सूचनाओं पर कब्‍जे की सदी है। सूचना के अधिकार की अहिंसक और जरूरी मांग के समानांतर जूलियन असांज ने हमें सिखाया कि कैसे सूचनाएं छीनी जा सकती है। जूलियन ने अपने क्रांतिकारी लीक्‍स से साम्राज्‍यवाद को नंगा करके रख दिया। बिल कॉनडोन (Bill Condon) की फिल्‍म The Fifth Estate जूलियन के अभियान को एक हद तक अमेरिकी नजरिये से स्‍कैन करने की कोशिश करती है। यह फिल्‍म Daniel Domscheit-Berg की किताब Inside WikiLeaks: My Time with Julian Assange and the World’s Most Dangerous Website और David Leigh और Luke Harding की किताब WikiLeaks: Inside Julian Assange’s War on Secrecy को कंपाइल करके बनायी गयी है। इसकी पटकथा जोश सिंगर (Josh Singer) ने तैयार की है, जो जूलियन असांज को भी पढ़ने के लिए दी गयी थी। जूलियन ने इसकी पटकथा पर एतराज किया था। दरअसल फिल्‍म यह बताती है कि जूलियन असांज स्‍टेट के जिस भ्रष्‍टाचार को अपनी धमाकेदार लीक्‍स के जरिये एक्‍सपोज करना चाहता है, वह अन-एडिटेड (असंपादित) होने की वजह से अनैतिक है और खतरनाक है। फिल्‍म के मुताबिक इसी वजह से जूलियन की टीम टूटती है। फिल्‍म में लगभग शुरू से अंत तक विकीलीक्‍स के धाराप्रवाह भंडाफोड़ को अमानवीय बताने की कोशिश की गयी है। चाहे वो स्विस बैंक के गुप्‍त खातों की पोल-खोल हो या बगदाद में अमेरिकी सैनिकों के कुकृत्‍य को बेपर्दा करने की घटना हो। यह फिल्‍म मामी की अंतिम फिल्‍म थी और इसकी भव्‍यता असंदिग्‍ध थी। लेकिन कथा में निरपेक्ष होने की तमाम कोशिशों के बावजूद राज्‍य के पृष्‍ठ-पोषण का निर्देशक का पक्ष जाहिर हो ही जाता है। खैर, फिल्‍म का एक संवाद मुझे सही लगा, जब जूलियन अपने साथी से कहता है, क्रांति अतीत और भविष्‍य के बीच संघर्ष का नाम है… और, भविष्‍य शुरू होता है, अब… (Revolution is the struggle between past & future… and future is just begin…)

♦ अविनाश

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