पटना के गांधी मैदान से उठ रहा है धुआं [धुआंधार LiVE]

♦ लेखक: मलंग

गांधी मैदान अभी भी धुआं छोड़ रहा है और चर्चा में हुंकार रैली बनी हुई है, इतिहास, भूगोल के साथ गणित की भी चर्चा जम कर हो रही है। रैली कवर करने पहुंचे निष्पक्ष रिपोर्टर मार्क तेली अभी तक कन्फ्यूज हैं की धुआं किधर जाएगा क्योंकि रैली से कुछ न कुछ तो बदला जरूर है लेकिन साफ साफ कुछ दिख नहीं रहा है।

रैली के दिन मार्क सुबह सुबह पत्रकारनगर से गांधी मैदान के लिए चले। उनके स्थानीय संपर्क सूत्र ने बताया था कि मोदी का भाषण एक बजे के बाद होगा तो वह कुछ इत्मीनान से निकले क्योंकि मेजबान का आग्रह था कि नाश्ता पानी करके चलें, उधर कुछ मिलेगा नहीं। पत्रकार का पेट सुबह ही भर जाए तो वह थोड़ा निश्चिंत हो जाता है। स्टेशन की तरफ पहुंचे तो हलके होने का ख्याल आया क्योंकि जहां रुके थे वहां सुबह के वक्त घर वालों के बीच टॉयलेट में टाइम कम दे पाये थे। रेगुलर आधे घंटे वाला कार्यक्रम नहीं निपट सका था। स्टेशन के पास बिन्देसरी पाठक को धन्यवाद देते हुए पैंट शौचालय के दरवाजे पर लटका कर पॉट पर एडजेस्ट हो ही रहे थे कि किसी ने खटखट की।

मार्क झल्ला गये — कौन है भाई, अभी तो ठीक से बैठे भी नहीं हैं, इंतजार करो थोड़ा देर।

उधर से आवाज आयी — पुलिस बोल रहा हूं, अंदर क्या कर रहे हो, कौन हो?

मार्क — बिहार पुलिस को इतना भी नहीं पता की पैखाने में क्या किया जाता है? नहा रहे हैं, का चेक करना है?

उधर से आवाज आयी — निकल साला बाहर, एगो पैखाना में बम फटा है, सब पैखाना बंद करने का आदेश है। पुलिस से कैसे बात करना है तोरा के मालूम नहीं है? निकल उतारते हैं तोरा टट्टी।

मार्क — देखिए हम दिल्ली से आये पत्रकार हैं, रैली कवर करना है, दिन भर प्रेसर में रहना पड़ जाएगा, कुछ टाइम दे दीजिए। अभी निकलते हैं।

पुलिस — दिल्ली का पत्रकार? सुलभ सचिवालय में, कार्ड देखाइए निच्चे से। महराज का सख्त आडर है।

मार्क — कौन महराज, बिन्देसरी पाठक?

पुलिस — न भाई, मन्नू महराज, पटना के पुलिस कप्तान।

मार्क – अभी धो के निकलते हैं।

खैर एक पत्रकार के लिए कई बार आवश्यक काम के लिए भी समय नहीं होता लेकिन यहां तो मामला कुछ और ही था। किसी तरह निपटा कर बाहर निकले, तो दो सिपाहियों से सामना हुआ। कार्ड दिखाये तो सिपाहियों ने कहा जल्दी बाहर निकलिए, कैसे पत्रकार हैं? भीआईपी मूमेंट में बम फटा है और आप यहां इत्मीनान से निपट रहे हैं? चलिए बाहर।

मार्क बाहर आये तो रेला बढ़ा जा रहा था, कमल छाप झंडा और गले में कमल छाप रुमाल लपेटे, मोदी की तस्वीरों वाली टी शर्ट पहने हुए लोग। मार्क को लगा कि बिहार बदल गया है क्योंकि पहले की रैलियों में घुटने भर की धोती पहने, मैले कुचैले कपड़ों में लाठी-डंडा लिये लोगों की भीड़ दिखा करती थी लेकिन इस भीड़ के कपड़े लत्ते साफ़ दिख रहे थे और पसीने की गंध भी कम ही महसूस हो रही थी।

भीड़ के रेला के साथ मार्क गांधी मैदान के एक किनारे पहुंच गये, मंच पर किसी गायिका का कार्यक्रम हो रहा था। उनके मेजबान ने बताया था कि मंच पर मनोज तिवारी का भी गाना होना चाहिए क्योंकि मेन बकता के आने तक मंच फंसाये रखने और भीड़ जोड़े रखने के लिए गवैय्या की जरूरत पड़ती है।

मार्क ने उचक उचक कर ताली बजा रहे एक युवक से पूछा — भाई ये गायिका कौन है ?

युवक के अगल-बगल वालों ने भी मार्क की ओर उपहास से देखा और कुछ लोग एक साथ बोल पड़े – कहवां से आये हैं, खुसबू उत्तम को नहीं चीन्हते हैं, बिहारी नहीं हैं का?

मार्क — भाई दिल्ली से आया हूं।

युवक — अरे साहब, दबंग चोलिया वाला कैसेट नहीं सुने हैं, एही का है। लेकिन ओम्मे ले कौनो नहीं गा रही है, गवना क डेट भी बड़ा हिट गया था, ओकर भी कौनो नहीं गा रही है। कादो त खाली नमो नमो, हुंकार-हुंकार, का जानी का गा रही है, कभियो सुना नहीं है न एहिलिये एतना भीड़ में बुझा नहीं रहा है कि का गा रही है।

तब तक बगल से एक बोला पड़ा — अरे बाबूजी “हमसे भंगिया न पिसाई, ए गनेस क पापा, नईहर जात बानी” इहे नू गयीले बा, सावन में त सुनले होखब? दिल्लियो में बाजे ला।

तब तक मैदान के एक तरफ धुआं सा उठने लगा, मार्क को शौचालय वाले बम की याद आ गयी, जिसे वो सिपाहियों का मजाक समझ रहे थे और सोच रहे थे कि सिक्योरिटी ड्रिल में पुलिस वाले ऐसा वैसा करके अपना कोरम पूरा कर रहे थे। अब माइक शाहनवाज हुसैन संभाल चुके थे और वो भीड़ को बता रहे थे कि किसी ने पटाखा फोड़ दिया है और कह रहे थे कि अभी सब लोग शांत रहें और पटाखे दीवाली और छठ के लिए रखे रहें। मार्क भीड़ में जगह बनाते हुए उस कोने तक पहुंच गये, जहां भीड़ एक युवक को पीट रही थी और पुलिस उसको कब्जे में लेने की कोशिश में थी। युवक चिल्ला रहा था की उसने कुछो नहीं छोड़ा है और वो तो खुदे रैली में भाषण सुनने आया है। मार्क ने इतना सुना कि युवक अपना नाम पंकज बता रहा था।

माइक पर सुशील मोदी का भाषण चालू था, बिहार और देश की दशा बदलने के लिए नरेंद्र मोदी को लाने की बात की जा रही थी। एक दो बार भाजपा का नाम ले लिया जा रहा था और बार बार मोदी मोदी ही हो रहा था। रैली में पहली बार आईपीएल के क्रिकेट मैच की तरह मैदान में बड़ी बड़ी स्क्रीन लगी थी, भीड़ भी नमो नमो कर रही थी। आखिर वो मौका आ ही गया, जब मोदी का मंच पर आगमन हुआ, संचालक की फुफकार बढ़ गयी। तभी दूसरी ओर से धुआं उठा और मार्क अब सहम गये कि हो न हो बम धमाके हो रहे हैं, अब क्या किया जाए। रैली कवर करने और जान बचाने के लिए सिक्योरिटी कवर की बात मार्क सोचने लगे लेकिन तभी मंच से फिर कहा गया कि कृपया पटाखे न फोड़े जाएं, लोगों का ध्यान भंग हो रहा है। मार्क ने भी संतोष कर लिया कि घबराने की कोई बात नहीं है। मंच पर शत्रुघ्न सिन्हा भी दिखने लगे थे जो अभी कुछ ही दिन पहले मोदी का खुलेआम विरोध कर रहे थे। मंच के नजदीक जाने की कोई जरूरत नहीं थी, हाई क्लास साउंड सिस्टम आजकल हर रैली में लगे होते हैं, मार्क ने भी किनारे एक जगह खुद को जमा लिया क्योंकि मुख्य वक्ता माइक संभालने ही वाला था। अगल बगल लोग अटेंशन हो गये, चोप्प-चोप्प शेर बोलेला, चोप्प रहा सो। अरे ई का बोलत आ रे, बुझाते नईखे?

किसी ने कहा – चोप्प साला, सुन, गुजराती में भोजपुरी नूं बोलत बाड़ें, धियान से सुना सो। तब तक दूसरा बोला भोजपुरिया ख़तम हो गयील, ई मैथिल अछि। केतना जाने ला हो?

किसी और ने कहा — अरे मरदे लीखल बा नूं, केहू बोल दी। लेकिन केतना निम्मन लागत बा कि केहू गुजरात से आके हमनी का बोली में सीरी गनेस कईलेस, भले एक्के लाईन।

तभी मंच से गंभीर आवाज गूंजी — भाईयो, बहनो… हां अब ठीक बा, ई बुझाता कि का बोलत बाड़ें।

झक्कास भाषण चालू हो गया जिसके लिए महीनों से तैयारी हो रही थी। भीड़ गदगद थी। उसको लग रहा था कि अब बदलाव आने ही वाला है। लगातार तालियां गूंज रही थीं और मंच से आवाज और ऊंची होती जा रही थी।

तभी एक ने कहा – ई का बोलत बा हो, बरौनी करखाना में त हमार भतीजवा काम करेला, घर दुआर ओहीं मिलल बा, ई त कहत बाड़ें कि बंद हो गयील? इनका अवला पर बंद हो गयील का रे?

बगल वाले ने कहा — चोप्प चाप सुनो न चच्चा, भाषण में कम बेसी होईये जाता है। तभी एक नव जवान ने कहा कि देखिए ई सब उल्टा-पुल्टा बक रहे हैं, कह रहे हैं कि गंगा के तीरे बिहारी लोगों से सिकंदर हार गया और पब्लिक ताली पीट रहा है, चोतिया समझे हैं का सबको? हम कंपटीशन की तैयारी कर रहे हैं, काले पढ़े हैं कि राजा पोरस से लड़ाई में सिंधु के पार सिकंदर की सेना पानी मांगने लगी थी और ऊ इधर अईबे नहीं किया था।

बगल वाले ने फिर ललकारा — अरे साला कम्पटीशन देना है त रैली में काहें ले आया है रे, सुन जो बोला जा रहा है, बकबक करेगा त फेंफा धर के दीघा घाट चहुंपा देंगे। मोदी जी से अधिक जानता है तोरा किताब लिखे वाला?

मार्क को मंच के नीचे और ऊपर दोनों तरफ से मजा आ रहा था। ऐसा कम रैली में होता है। राहुल गांधी की रैली में ऐसा ही आनंद आता है लेकिन उसका थीम दूसरा रहता है। अब मंच से कुछ यादव जी लोगों के बारे में कहा जा रहा था, हाथ का झंडा लहराते हुए एक जवान ललकारने लगा — लालू जादव-नरेंदर मोदी, खुद ही आगे बोला – जिंदाबाद, जिंदाबाद।

मार्क ने पूछा – क्या हुआ भइया, काहें लालू जी को इनसे जोड़ रहे हैं?

सीना फुलाते हुए जवान बोला — सुने नहीं हैं का बता रहे हैं? दुअरिका अउर जादव लोग में पुराना मेल है, इनको हम लोगों का फिकर है। अबकी नेतिश को औकात देखा दिया जाएगा, कांग्रेस के चक्कर में लालू जी को जेहल भेजवा दिया।

मार्क — ये क्या कह रहे हैं?

जवान — पहले आप ध्यान से सुनो कि मोदी जी का कह रहे हैं, एक टेशन पर चाय बेचे वाला, गरीब का औलाद, पिछड़ा जात का आदमी परधानमंत्री बनेला हो, सुना सब।

तभी मार्क के फोन की घंटी बाजी। दिल्ली से फोन था जिसपर कोई बता रहा था कि पटना में कई बम फटे हैं और एक पकड़ा गया है। शायद इम्तियाज नाम है उसका। अब मार्क की धुकधुकी बढ़ने लगी और वो धीरे-धीरे मैदान से किनारे होने लगे। रेडक्रास की साइड से मार्क निकलने लगे तो देखा कि पुलिस वाले कुछ लोगों को टांग कर गाड़ियों की तरफ ले जा रहे हैं।

मार्क ने अपना कार्ड कायदे से लटका लिया और पुलिस वालों की तरफ हो लिया, अरे सर ये क्या हुआ है, कितने मरे? रैली में बम फट रहा है तो आप लोग बंद क्यों नहीं करवा देते, क्यों जान लेने पर लगे हैं?

एक रौबदार मूंछों वाले दरोगा ने कहा — पत्रकार हैं? जानते हैं अभी बंद करवा दिया जाए तो क्या होगा? गांधी मैदान से पीरबहोर थाना तक मियां बस्ती साफ़ हो जाएगा, एही तो चाहता है सब। दंगा हो जाएगा, दंगा। आग लग जाएगा पटना में।

मार्क — आप को कैसे पता कि बम मियां लोग छोड़ रहा है? नक्सली भी हो सकता है? सिंपैथी के लिए कुछ बदमाश भाजपाई भी तो ऐसा कर सकते हैं?

दरोगा — एतना जानते हैं त पुलिस का नौकरी काहे नहीं करते, ई का पट्टा लटका के घूमते हैं और पत्रकार सब का स्टैंड तो उधर आगे को है, भीड़ में का कर रहे हैं, आतंकबादी हैं का? चलिए, हमलोग को अपना काम करने दीजिए। सुलभ में जो फटा उसके साथ जो घायल हुआ वही फिट कर रहा था, ऊ मियां है। चलिए शाम को ब्रीफ होगा त पता करिएगा, अभी भाषण सुनिए, जे लिए हियां आये हैं।

मार्क का दिल अब रैली में नहीं था। वो निकल लिये। एक पुलिस वाले से पूछे, कहां ले जा रहे हैं घायल सब को? कितने मरे हैं? पुलिस वाले की वर्दी पर खून लगा था। उनके पास स्ट्रेचर भी नहीं था। खुद ही ढोना पड़ रहा था।

झल्लाहट में बोला — “मुख्यमंत्री आवास न त भाजपा कार्जालय ले जाएंगे अउर जहां कहिए ले जाएं।” मार्क का अब सर घूमने लगा था। मंच से ललकार जारी थी।

मार्क जैसे तैसे किसी के साथ लटक कर अस्पताल पहुंच गये और मेजबान को फोन मिलाया तो पता चला कि अब तक पांच के मरने और अस्सी के घायल होने की खबर आ रही है। मेजबान ने कहा की जल्दी से जल्दी निकल लें क्योंकि उनके परिचित एक पुलिस अफसर ने बताया है की इंडियन मुजाहिदीन के आतंकवादी सब बम प्लांट किया है और अभी खतरा बहुत है। एक बम को ठंढा करने में एक जवान का पंजा उड़ चुका है। अस्पताल में अफरातफरी का माहौल था। मार्क का मित्र मोटरसाइकिल लेकर उनको लेने आ गया था। घर पहुंच कर मार्क सीधे टॉयलेट में घुस गये, जहां सुबह का बाकी बचा काम निपटाना था। रात किसी तरह बीती, सुबह पता चला कि रांची से कुछ और पकड़ा गये हैं, जिनके पास लादेन का फोटो और न जाने क्या क्या मिला है। मोदी पटना से गुजरात लौट चुके थे और अखबार, टीवी एक साथ आईबी के अलर्ट और बिहार पुलिस की लापरवाही के साथ इंडियन मुजाहिदीन का पोस्टमार्टम कर रहे थे। दिन के समय गांधी मैदान से और बम मिलने की खबर आ रही थी। एक बात किसी को समझ में नहीं आ रही थी कि जब इतने बड़े नेता का कार्यक्रम लगा था तो इतनी ढिलाई कैसे हो गयी कि मैदान में बम की खेती कर दी गयी थी और किसी को पता ही नहीं चला। नीतीश इतनी दुश्मनी तो निकालेंगे नहीं कि पुलिस एकदम लापरवाह हो गयी कि कोई पूरे मैदान में बम फिट कर दे और पता भी नहीं चले। भाजपा के अलावा सारे नेता मोदी को गालियां देने में लगे रहे कि बम फटता रहा और सभा होती रही, वहीं तमाम लोग इस बात को लेकर हैरान थे कि कौन हैं वो लोग जो सियासत को एकदम पलट देना चाहते हैं और इस काम के लिए लाखों की भीड़ में बम बिछाये रहते हैं। तब तक खबर आने लगी थी कि मोदी का धमाके में मरे लोगों के घर दिवाली पहले ही जाने का प्रोग्राम बना है क्योंकि वो लोग पार्टी के लिए शहीद हो गये हैं।

उधर पकडे गये आतंकवादी ने बताया कि काम के बदले उसके घर पांच लाख रुपये आने थे और इधर मृतकों को भी पांच-पांच लाख देने की घोषणा हो चुकी थी। तब तक खबर आयी कि सुरागकशी के लिए ले जाए जा रहे एक पकड़े गये जवान ने खैनी में कुछ मिला कर जवानों को खिला दिया और खुद फरार हो गया। बाद में वो फिर पकड़ा गया और उधर धमाके में घायल एक आतंकी की मौत हो गयी क्योंकि उसको टाईमर सेट करने नहीं आता था और वो घंटे या मिनट की सुई में तार बंधने की जगह सेकेण्ड वाले कांटे में तार जोड़ बैठा था। सुलभ शौचालय में जोड़ते ही धमाका हो गया था और वो बुरी तरह घायल हो गया था। ये वही धमाका था, जिसके चलते मार्क को भी बीच में ही उठाना पड़ गया था।

मोदी अपना वादा निभाने के लिए फिर वापस आये और इस बार प्रोटोकाल के हिसाब से उनकी सुरक्षा का पूरा ध्यान दिया गया। उनकी सुरक्षा के लिए गुजरात पुलिस की भी भारी टीम आयी जिसमें से दो जवान रस्ते में शहीद हो गये, पता नहीं उनके मुख्यमंत्री उनके घर जाएंगे कि नहीं लेकिन मोदी पटना आये। दो जगह खराब मौसम के चलते जा नहीं पाये क्योंकि हेलीकाप्टर लायक दिन नहीं था। दुखी मोदी जी ने दुखी परिवारों से फोन पर बात की। सुपौल के शहीद मुन्ना जी की पत्नी ने फोन पर ही बात की लेकिन सबसे अधिक ध्यान लोगों का रहा नीतीश के गांव से लगभग बीस किलोमीटर दूर के राजेश के गांव पर। शहीद राजेश के गांव के बाहर ‘शहीद के गांव में स्वागत’ का बैनर लग गया था। हेलीपैड से कार, फिर पैदल गांव के भीतर जाते वक्त दोनों तरफ नीतीश जी ने बल्लियों और रस्सियों से सुरक्षा टाइट करवा दी थी। शहीद के परिवार वालों को पांच लाख का चेक भाजपा की तरफ से दिया गया।

जब हेलीकाप्टर वापस उड़ गया तो कुर्मी बहुल इस गांव के लोगों ने कहा कि — दोसर जगह का अदमी गांव में आया था त स्वागत त होयिबे करेगा लेकिन भोट त नेतिश को ही दिया जाएगा, हमनी के गांव घर का बेटा हैं, जात-बिरादर के अदमी हैं। बहरे से कोई आयेगा त उसको थोड़े न भोट देना है, जबकि वहीं जुटे बगल के गांव के लोगों की भीड़ जो नमो नमो कर रही थी उसे पक्का यकीं था कि अबकी दिल्ली में नमो की सरकार बनेगी। उस भीड़ से पूछने पर पता चला की कि लोग दूसरी जात के थे। उन लोगों ने कहा कि — बरमेसर मुखिया के हतियारा सबके सबक सिखावे खातिर मोदी का सपोर्ट जरूरी है, लालू जी का भी भोट अबकी भाजपा के साथ रहेगा और कुर्मी सबका छोड़ कर बकिया पिछड़ा सबका भी; नेतिश का टाईम खतम।

उधर राजगीर में चिंतन के बाद नीतीश ने भी दिवाली के टाइम झाड़ू लगाने और साफ़ सफाई का ऐतिहासिक भाषण दे दिया, जिससे बहुत लोगों को ये अंदेशा हो रहा है कि कहीं अगले लोकसभा चुनाव में नीतीश और अरविंद केजरीवाल का गठबंधन न हो जाए।

साधिकार: गपागप ब्‍लॉग

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