यथार्थ के पेट्रोल से नहीं चलती तिग्‍मांशु की बुलेट राजा

♦ उत्‍पल पाठक

सा माना जाता है कि जब कोई स्थापित और गंभीर निर्देशक किसी फिल्म का निर्देशन करते हैं, तो उस फिल्म के पीछे उनकी अपनी दूरगामी सोच, जज्बा और उस विषय का लगाव उभर कर सामने आता है। तिग्मांशु जी की पिछली फिल्मों (हासिल, चरस, शागिर्द और पान सिंह तोमर) में ये लगाव नजर आता है। पुरस्कार, सम्मान और आर्थिक लाभ से ज्यादा ये फिल्‍में विषयवस्तु के लिहाज से हिंदी सिनेमा की एक नयी सुबह में शामिल हुई थीं। उनकी उपलब्धियां साहब बीवी और गैंगस्टर में भी उत्कृष्ट निर्देशन और बाद में गैंग्स आफ वासेपुर में अभूतपूर्व अभिनय के साथ और भी बढ़ चुकी थी। साथ ही हर सामान्य दर्शक और उनके प्रसंशकों ने उनकी फिल्मों से काफी हसरतें पाल लीं जो गलत नहीं थीं। क्‍योंकि जिसे हम रीयलिस्टिक डायरेक्शन (सजीव निर्देशन) कहते हैं, उसकी सच्ची तस्वीर उनकी पिछली फिल्मों में कूट-कूट कर भरी थी।

लेकिन सफलता के सफर में आपको कुछ ऐसे ऑफर, अनुरोध और निवेदन प्राप्त होते हैं, जहां आपको अपनी पहचान से इतर उनके “हिसाब” से एडजस्ट करके निर्देशन करना होता है। शायद यही परिस्थितियां रही होंगी, जिसने अप्रत्याशित रूप से बुलेट राजा जैसी फिल्म पर अपने दुष्प्रभाव छोड़ गयीं।

फिल्म की शुरुआत अजीब ढंग से हुई। तिग्‍मांशु की पिछली फिल्मों की शुरुआत से बिलकुल अलग। अचानक से सारे दृश्य एक एक करके आ रहे थे और शुरुआत के पंद्रह मिनट से पहले ही एक आइटम गीत का आना फिल्म की कलात्मकता में आये स्टार इफेक्ट का नजारा दिखा रहा था। माही गिल को सिर्फ इस गाने और एक दो दृश्यों के लिए रखा गया है, जो थोडा अपच लगा क्‍योंकि शायद उन्हें एक बड़ा रोल मिलना चाहिए था या फिर ये आइटम गीत कहीं बाद में लगाकर काम चलाया जा सकता था। खैर गीत को घर में हो रही शादी के साथ जोड़ा गया क्‍योंकि गीत के खत्म होने के बाद वहां पर हमला होना था। लेकिन गीत में माही के पीछे नृत्य के लिए जो अतिरिक्त कलाकार दिखे, वे सभी विदेशी जैसे थे। यहीं से ऐसा लगने लगा कि या तो इस फिल्म में कथानक और दृश्यों के फिल्मांकन के लिए शोध नहीं किया गया या शोध के बावजूद कहानी में दबाव भरी छेड़छाड़ हुई है।

भले ही फिल्म के कुछ संवाद उनकी चिर परिचित शैली से मिलते जुलते थे और कुछ दृश्य उनकी समझ और सूझबूझ का नजारा दिखा रहे थे लेकिन कहानी शुरू से ही देखी सुनी सी लगी। संपादन में भारी कमियां एक साथ दिख रही थीं। दो नौजवान सिर्फ घटनाक्रम के बाद बड़ी जल्दी ही बाहुबली बन जाते हैं और उनको इस मुकाम तक पहुंचाने वाला जेल में बंद एक अपराधी, जो खुद को राजनीतिक सलाहकार बताता है, उन्‍हें एक नया नाम देता है “पॉलिटिकल कमांडो”। शब्द का चयन काफी अच्छा है, लेकिन कहानी के अनुसार इस शब्द को सम्मान नहीं मिल पाया। और जो धमक इन बाहुबलियों को अपने दर्शकों के सामने बनानी थी, वो दब सी गयी।

फिल्म में मध्‍यांतर से पहले के कुछ दृश्य और संवाद प्रभावित करते हैं लेकिन मध्‍यांतर के बाद दर्शकों को बिलकुल ही निराशा हाथ लगती है। फिल्म का कोई भी गाना प्रभाव नहीं छोड़ पाया है और “तमंचे पे डिस्को” ने विषय वस्तु के साथ तो जैसे मजाक ही कर दिया। जैसे जैसे कहानी आगे बढ़ती है, वैसे वैसे स्थापित कलाकारों की भूमिका पीछे छूटती जाती है। अंतराल के बाद वही बदले की भावना और प्रतिशोध की ज्वाला का घिसापिटा फॉर्मूला फिल्म में सर चढ़ कर बोलने लगता है। लगता है जैसे कहानी को अंतराल के बाद डूब जाने से बचाने के लिए विद्युत जामवाल को लाया गया है, जिनके कथानक में आते ही बहुत सारी गतिविधियां अचानक बढ़ जाती हैं। लेकिन विद्युत् के बेहतरीन एक्शन के दृश्य भी फिल्म कि कहानी को एक अच्छा क्लाइमेक्स नहीं दे पाये और सब कुछ पहले जैसा देखा सुना सा लगने लगा।

विद्युत् एक तेज तर्रार इंस्‍पेक्टर बने हैं, जिनकी एंट्री होती है डकैतों के मुड़भेड़ के साथ। वहां पर वो एक संवाद में बोलते हैं कि उनकी बदली इटावा से होने वाली है और वो लंदन जा रहे हैं डेपुटेशन पर और वे चंबल के डकैतों से लड़ रहे हैं। इटावा और चंबल के बीच काफी दूरी है और दोनों जगह के दस्युओं कि कार्यशैली और भाषा काफी भिन्न है। इसके साथ ही इंस्‍पेक्टर का डेपुटेशन पर लंदन जाना थोड़ा अजीब लगा। साथ ही डकैतों ने जो भाषा बोली है वो विशुद्ध बांदा-चित्रकूट और आस पास के बीहड़ों के इलाके की है, तो इटावा की चर्चा वाला संवाद क्यों आया, ये बात समझ के बाहर थी। एक तेजतर्रार उत्तर प्रदेश पुलिस के अधिकारी के बाल अगर कटे होते तो शायद वो और सजीव दिखते।

फिल्म के संवाद कुछ हद तक ही दर्शकों के दिल में जगह बना पाये हैं और खास तौर पर सहयोगी कलाकरों में राजकुमार गुप्ता, विपिन शर्मा एवं राज बब्बर ने अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है। गुलशन ग्रोवर एक मारवाड़ी व्यापारी के रोल में हैं, जो बातचीत और अचार-विचार से कहीं भी मारवाड़ के नहीं दिखते। “जहां न पहुंचे रेलगाड़ी” जैसी कहावत को इस्तेमाल करके बस किसी तरह उनको फिट करने की कोशिश की गयी है। फिल्म में उनका नाम भी न जाने क्या सोच कर बजाज रखा गया, क्‍योंकि उत्तर प्रदेश में बजाज उपनाम लगाने वाले मारवाड़ियों का अभाव है। आगरा और हरियाणा के सीमावर्ती इलाकों के कुछ-कुछ अगरवाल गोत्र और देशवाल गोत्र के मारवाड़ी जरूर इस उपनाम का इस्तेमाल करते हैं लेकिन भारी मात्रा में बजाज उपनाम का इस्तेमाल मुल्तान से संबंध रखने वाले खत्री समुदाय के लोग करते हैं, जिनका मूलतः व्यापार कपड़े का होता है। इसके अलावा फिल्म की शुरुआत में चंकी पांडे को मुंह में पान (या गुटखा) रख कर शराब पीते हुए दिखाया गया है और उनकी भाषा शैली बिलकुल ही अवधी नहीं है।

उत्तर प्रदेश की जेलों में टेलीफोन या इंटरनेट का इस्तेमाल होना कोई नयी बात नहीं, लेकिन अचानक से स्काइप पर सीधा संपर्क और बातचीत के दृश्य ओवरडोज जैसे थे। फिल्म में कुछ तथ्‍य चौंकाने वाले थे। लखनऊ के आसपास कहीं अफीम की खेती नहीं होती। अफीम को लेकर होने वाले विवाद और गैंगवार खत्म हुए जमाना बीत गया और मूल रूप से गाजीपुर की अफीम फैक्ट्री के कारण पूर्वांचल में अफीम की खेती अधिक होती है। लेकिन लखनऊ की राजनीति और अपराध के साथ अफीम का जुड़ाव भी अप्रत्याशित था। फिल्म में बंदूकों का इस्तेमाल खूब हुआ है लेकिन दुनाली बंदूकों का आजकल उत्तर प्रदेश में न के बराबर प्रयोग हो रहा है। साथ ही उन बंदूकों को पकड़ने का अंदाज मुख्य पात्रों के अलावा अतिरिक्त पात्रों के नौसीखिया गुंडे होने की गवाही देता रहा।

इस फिल्म को अगर इस दृष्टि से देखा जाए कि एक गंभीर सिनेमा बनाने वाले निर्देशक ने कमर्शियल और मसाला फिल्मों में घुसने के दौरान ऐसी त्रुटियों को अनदेखा किया है या फिर किसी “बाहरी” दबाव ने उनकी निर्देशन कला को प्रभावित कर दिया या फिर कोई तीसरा कारण जो हम जैसे सामान्य दर्शक नहीं समझ पा रहे, तो कारण जो भी हों यह फिल्म एक कुशल निर्देशक की अब तक की सबसे हल्की फिल्म बन कर सामने आयी है।

सिर्फ कहानी ही नहीं, बल्कि फिल्म के गीत और पार्श्व संगीत ने भी निराश किया। गीतों का इस्‍तेमाल जबरदस्ती किया गया और फिल्मांकन के अनुसार उनका संयोजन नहीं हो पाया। कहीं कहीं पार्श्व संगीत और ध्वनियां अच्छी लगीं हैं, लेकिन मेक्सिको और अन्य देशों में जहां काउ ब्‍वॉय संस्कृति है, वहां से संगीत आयातित भी लगा है, जो उत्तर प्रदेश के माहौल में सेट नहीं हो पाया। संपादन के अभाव में कहानी विकलांग सी दिखती है। इस फिल्म को एक मार धाड़ वाली फिल्म के रूप में प्रचारित किया गया और कुछ दृश्य इस बात की गवाही दे भी रहे थे लेकिन इन दृश्यों में जो चटक खोजने दर्शक गये, उन्‍हें वह नहीं मिली।

किरदारों को अलग-अलग देखें, तो यह पूरी फिल्म सैफ के लिए बनायी गयी है। लेकिन सैफ यूपी के दबंग किरदार को निभाने में कामयाब नहीं हो पाये। जिमी शेरगिल भले ही अपने रोल के साथ न्याय कर पाये हों लेकिन उनके बाल भी बेतरतीब ढंग से क्यों बढ़ा कर रोल में डाले गये थे, समझ में नहीं आया। हालांकि जिमी ने सैफ के बराबर ही अपने आप को रखा है और वे हर बार की तरह अभिनय में खरे दिखे हैं।

शेष अगर नायिका के रोल के बारे में कुछ न ही कहें तो बेहतर है। लूटेरा के अलावा उनकी हर फिल्म में एक जैसी भूमिका दिखती है।

अगर रवि किशन और विद्युत् की भूमिका कुछ और बड़ी होती या पूरी फिल्म में शुरू से अंत तक उनके लिए कुछ करने को होता तो शायद कहानी में और जान आ जाती। रवि को औरत की वेशभूषा में एक सशक्त रोल मिलने से और विद्युत् को एक असली पुलिस अधिकारी के रूप में एक बड़ा रोल मिल जाने पर कहानी बराबर पर रह सकती थी।

उत्‍पल पाठक युवा रेडियो पत्रकार हैं और इन दिनों रेडियो मिर्ची पटना से जुड़े हैं। उनसे pathakutpal@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

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