आकाश पे एक खुदा है कहीं, आज सीढ़ी लगाके ढूंढें उसे!

♦ उमेश पंत

गुलजार। ये नाम मेरे लिए उन शुरुआती साहित्यिक सुविधाओं में से था, जो मुझे अपने छोटे से कस्बे गंगोलीहाट में रहने के दिनों में ही मिल गयी थी। पुखराज, त्रिवेणी और रात पस्मिने की। ये तीन किताबें ऐसी थीं, जिनके नाम अपने कुछ साथियों से सुने थे। और सर्दी के दिनों में छत पर बैठे, गुनगुनी सी धूप सेंकते हुए इन किताबों में लिखी कविताओं के कुछ कुछ टुकड़े भी उन्होंने ही सुनाये थे। इन किताबों को खरीदना तब हसरतों में शुमार हो गया था। ये वो दौर था, जब आड़े तिरछे शब्दों को जोड़कर कुछ लिखना शुरू किया था, जिसे अपने दिल के खुश रखने को मैं कविता कह देता था।

बर्फ का गिरना, ठंड, धूप… ये सब गुलजार को पढ़ने के बाद केवल घटना नहीं लगते थे। इन छोटी-छोटी बातों में अहसास होता है कि गुलजार को पढ़ते हुए इतना तो सीखना शुरू कर दिया था। एक पुरानी हसरत थी कि उनका कोई सेशन अटेंड किया जाए, जहां वो खुद हों और उनके होने को उनकी कविताओं का साथ मिले। पिछली बार जब सुना कि जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में वो नहीं आ रहे, तो दुख हुआ था। इससे पहले वो वहां जाते रहे हैं, ऐसा मैंने सुना था।

कल मुद्दतों बाद वो हसरत भी पूरी हुई। मुंबई के ऐतिहासिक महबूब स्टूडियो में। टाइम्स लिट फेस्ट में गुलजार के सेशन को शुरू होने में तकरीबन पंद्रह मिनट थे, पिछले सेशन के दर्शक कुर्सियां छोड़ रहे थे, आगे की पंक्तियों में खाली हुई ऐसी ही एक छोड़ी हुई कुर्सी हमने भी छेंक ली। सेशन शुरू होने में पांच मिनट रहते सारी कुर्सियां भर चुकी थीं। उन कुर्सियों के इर्द-गिर्द गुलजार के इंतजार में सैकड़ों लोग खड़े हो गये थे।

कुछ ही देर में एक खामोश सी हलचल हुई। मंच की दायीं ओर बने दरवाजे पर झक सफेद लिबास में गुलजार खड़े थे। हाथ जोड़कर। उन्हें देखते ही पता नहीं वो कौन सा सम्मान था कि अनकहे ही हॉल में मौजूद सारे लोग अपनी जगह पर खड़े होकर तालियां बजाने लगे थे। सुनहरे रंग की जूतियों से ढंके गुलजार के पैर रफ्ता-रफ्ता मंच की ओर बढ़ रहे थे और लगातार बजती जा रही तालियां उनके कदमों की आहट पर सम्मान की न जाने कितनी परतें चढ़ा रही थी।

गुलजार के साथ मृणाल पांडेय मंच पर थी। 21 फिल्मफेयर, 7 नेशनल अवार्ड जैसे कई पुरस्कारों की फेहरिस्त से नवाजे और करोड़ों चाहने वालों द्वारा सराहे जाने वाले गुलजार मंच पर एक मामूली से आदमी की तरह बैठे मृणाल से बात कर रहे थे। गुलजार होते हैं, तो शायद मामूली होना भी एक खासियत हो जाता है।

मासूम बचपन। इस विषय पर गुलजार बोलना शुरू करते हैं, तो दर्शकों के बीच में कहीं से आवाज न सुनाई देने की शिकायत आती है। गुलजार हंसते हुए कहते हैं – अबसे न आये तो सीटी बजा देना।

फिर बात दादी-नानी की कहानियों के खत्म हो जाने से शुरू हुई। गुलजार ने एक बच्चों सी शिकायत की कि मैं नाना की हैसियत से इतनी किताबें लिख रहा हूं, तो फिर क्यूं हमेशा दादी और नानी की कहानियों का जिक्र होता है, दादा और नानाओं की कहानियों का क्यों नहीं।

एक गाने का जि़क्र करते हुए गुलजार कहते हैं कि अब गुल्लक जैसे शब्द आम ज़िंदगी में प्रयोग से बाहर होने लगे हैं। बीड़ी जलइले गाने में कचेहरी जैसा शब्द इस्तेमाल किया है, पर कचेहरी अब कौन समझता है। ये एक अकेला शब्द पूरी जमींदाराना तहजीब को बयां कर देता है। गुलजार आगे बढ़ते हुए कहते हैं कि मैं अपने दौर की तहजीब इकट्ठा कर लूं, तो मैं समझ लूंगा कि मैंने एक गुल्लक बना लिया है, ताकि लोगों को जब भी जरूरत पड़े वो उस गुल्लक को तोड़ कर उस तहजीब की नकदी का इस्तेमाल कर लें।

गुलजार अपनी कविताओं के शब्दों का जि़क्र करते हुए कहते हैं कि मैं जहां से इनको उंगली पकड़ के लाया, ये मुझे वहां उंगली पकड़ ले चलते हैं।

मृणाल चर्चा आगे बढ़ाती हैं और कहती हैं कि इंसान ही नहीं भाषा भी जड़ें टटोलती है, उसे भी अपनी मिट्टी बुलाती है। इस पर गुलजार 1857 के दौर में जा पहुंचते हैं, जब दिल्ली उजड़ रही थी। वो कहते हैं उस दौर में गालिब ने फारसी में भी लिखा, पर हमें जो याद रहा वो उनका उर्दू में लिखा दिल्ली के उजड़ने का दर्द था। क्योंकि उर्दू दिल्ली की जबान थी।

फिर चर्चा भाषा और बोलियों के रिश्ते को टटोलने की कोशिश करने लगती है। मृणाल कहती हैं कि जब तक उर्दू और हिंदी जैसी भाषाएं बोलियों से जुड़ी रहती हैं, उनमें नये-नये मुहावरे और बिंब गढ़ने की, नये प्रयोग करने की प्रवृत्ति बनी रहती है। लेकिन जब वो हिंदू और मुसलमान की भाषा बन कर बोलियों से अलग हो जाती है, तो उसका राजनीतिकरण हो जाता है।

मृणाल गुलजार की उपलब्धियों पर कहती हैं कि सौ साल बाद जब भाषा का इतिहास लिखा जाएगा, तो गुलजार याद आएंगे, रियलिटी टीवी नहीं। इस पर गुलजार मुस्कुराते हुए कहते हैं कि मैं आप सबका होमवर्क करके जा रहा हूं ताकि बाद में आपको इन लफ्जों को सहेजने का होमवर्क न करना पड़े।

मृणाल फिर एक मजेदार बात कहती हैं कि इंसान की तरह लफ्जों का भी एक इतिहास होता है। भाषा दरअसल एक सराय होती है, जिसमें कई तरह की संस्कृतियां, बोलियां, शरण लेती हैं जो इस इतिहास में कुछ न कुछ जोड़ती चली जाती हैं।

गुलजार की कविताओं में भारत पाकिस्तान का विभाजन कई बिंबों में नजर आता है। गुलजार कहते हैं कि वहां से मैं यादें और इमेज लेके आया हूं। वो एक वाकये का जिक्र करते हुए बताते हैं कि विभाजन के दौर में जब मांएं गहने पोटली में बांध रही थीं, पिता रुपये-पैसे, बोरिया-बिस्तर समेट रहे थे, उन्होंने एक बच्चे को देखा। वो अपना लट्टू अपने पायजामे की जेब में संभाल रहा था। क्योंकि उसके लिए उसकी सबसे बड़ी दौलत उसका वो बचपन है जिसमें लट्टू की बड़ी भागीदारी है।

अब गुलजार अपनी लिखी कविताओं को भी बीच-बीच में शामिल करने लगते हैं। अपनी नयी किताब हिंदी फॉर हार्ट की एक कविता वो पढ़ते हैं…

“आकाश पे एक खुदा है कहीं,
आज सीढ़ी लगाके ढूंढें उसे,
आराम से सोया होगा।”

तालियों के शोर को थामती हुए एक और कविता खालिश गुलजार की आवाज में कानों को नसीब होती है…

“एक कवि यूं भस्म हुआ
एक सौ दर्द जले जब दिल में
एक नज्म का जन्म हुआ”

मृणाल आगे कहती हैं कि शब्दों के साथ एक कवि का रिश्ता फिजिकल होता है। जैसे एक बच्चे का मां से रिश्ता होता है, वैसा ही रिश्ता एक लेखक का भाषा से होता है।

गुलजार आगे कहते हैं कि मासूमियत की कोई उम्र नहीं होती। वो हर उम्र में आपके साथ रहती है।

गुलजार भाषा में बचपन को तलाशते हुए टैगोर से मिल आते हैं। वो एक दृश्य गढ़ते हैं कि एक बच्चा टैगोर को हर वक्त लिखता हुआ देखकर क्या महसूस करता है? वो अपनी मां से शिकायत करता हुआ कहता है कि वो सारा समय बस लिखना-लिखना खेलते रहते हैं। या फिर ये कि पापा स्याही से रोज इतने कागज खराब करते हैं, उनसे तो आप कुछ नहीं कहती लेकिन मैं नाव बनाने के लिए एक कागज मांगता हूं तो आप कहती हैं बरबाद मत करो। इस बिंब को गुलजार जब कविता का लिबास पहनाते हैं तो उनकी कविता में वही मासूमियत झलकने लगती है, जिसकी सचमुच कोई उम्र नहीं होती।

महबूब स्टूडियो में जहां गुलजार ने विमल राय और पंचम दा जैसे लोगों के साथ बैठकर ओ रे मांझी जैसे गाने बनाये, बंदिनी जैसी फिल्मों के गानों को लफ्ज दिये, वहीं आज गुलजार उस पुराने दौर को याद करते हैं। गुलजार ने कविता के जरिये पोट्रेट बनाने की एक नयी विधा को भी जन्म दिया है। इसी विधा में जब वो पंचम दा का पोट्रेट बनाते हैं, तो एक खूबसूरत बिंब गढ़ते हैं कि… यूं ही एक बारिश के दिन ट्रेन की खाली पटरी पर पंचम दा और वो बैठे हुए हैं और बैठे बैठे पंचम दा उन्हें अकेले छोड़कर खुद कहीं कोहरे में गुम हो जाते हैं। लफ्जों से खास रिश्ता बनाने वाले गुलजार, खास रिश्तों के लिए लफ्ज तलाशते हुए भावुक से नजर आने लगते हैं।

सवा घंटे का वक्फा तालियां बजाते-बजाते और बीच-बीच में कुछ नोट्स लेते यूं ही कट जाता है, गुलजार के ही शब्दों में वक्त की पतंग का माझा खत्म हो जाता है और आखिर में गुलजार की कही वो कुछ और पंक्तियां उनकी कही कई खूबसूरत बातों के साथ उस हॉल में बैठे और खड़े होकर उन्हें सुनते सैकड़ों लोगों के जहन में रह जाती हैं…

“उसने जाने क्यों दायें कंधे पर
नीलगाय का एक टैटू गुदवाया है
मर जाता कल दंगों में
अच्छे लोग थे, गाय देखकर छोड़ दिया।”

मंडली से बंक मारकर मुंबई के महबूब स्टूडियो में गुलजार को उनके सामने बैठकर सुनने का ये मौका एक बेहद यादगार लम्‍हे में जुड़ गया। अब जब भी बांद्रा के महबूब स्टूडियो से गुजरना होगा, गुलजार के साथ बीता ये मासूम सा दिन ताजा हो जाएगा। उतना ही ताजा जितनी गुलजार की कविताएं।

Umesh Pant(उमेश पंत। सजग चेतना के पत्रकार, सिनेकर्मी। सिनेमा और समाज के खास कोनों पर नजर रहती है। मोहल्‍ला लाइव, नयी सोच और पिक्‍चर हॉल नाम के ब्‍लॉग पर लगातार लिखते हैं। फिलहाल यूपी से ग्रामीण पाठकों के लिए निकलने वाले अखबार गांव कनेक्‍शन से जुड़े हैं। उनसे mshpant@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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