कौन लिख जाता है दीवारों पर अपनी असहमति

♦ उदय प्रकाश

हा-सुना जाता है कि ईसा से पांच सौ नौ साल, आठ मास, अट्ठारह दिन, छह पहर पूर्व एक ऋषि का कुशीनगर से तीन कोस दूर के एक गांव में जन्म हुआ था। उनका नाम, सुना-कहा जाता है कि आचार्य वृहन्नर अपकीर्त्ति गौतम था। वे हल की मूठ पकड़ते थे और धान की खेती करते थे।

चालीस वर्ष बाद उन्होंने घर छोड़ दिया और विजन-विकट वन के एकांत में चले गये। उनसे कोई मिल नहीं सकता था।

लोग उन्हें भूल जाते लेकिन ऐसा संभव नहीं हो सका। क्योंकि वे हर रात नगर की ओर जाते राजमार्ग के आसपास उगे वृक्षों के तनों की खाल पर, उस समय की सबसे लोक-प्रचलित भाषा और लिपि में, जिन्हें राज्य द्वारा स्वीकृति तो नहीं थी, परंतु लोक-व्यवहार में वही भाषा और वही लिपि सर्वाधिक प्रचलित थी, में प्रत्येक मास कुछ न कुछ लिख उत्कीर्ण कर जाते थे।

उनके द्वारा उत्कीर्ण किये गये वाक्य, आश्चर्य था कि उस क्षेत्र में दावाग्नि की भांति प्रज्‍ज्‍वलित हो उठते थे। नगर ही नहीं, ग्राम और वनों में आश्रम बना कर शिष्य-शिष्याओं के साथ वन-विहार, जल-क्रीड़ा और विमर्शादि करते राज-ऋषियों के बीच भी आचार्य वृहन्नर अपकीर्त्ति के वाक्य व्याकुलता और अंतर्दाह उत्पन्न करते।

हर जगह आचार्य वृहन्नर के वाक्यों की चर्चा होती।

राज्य, साम्राज्य और राज्यपोषित, राज्याभिषेकित ऋषि-मुनियों, विदूषकों तथा अन्य गणमान्यों, वृहन्नलाओं-गणिकाओं को भी आचार्य वृहन्नर के वाक्यों से भय और व्याकुलता की अनुभूति होती।

कहते हैं कि आचार्य वृहन्नर की खोज और उनके वध के लिए अनेक प्रयत्न किये गये। परंतु मान्यता है कि आचार्य वृहन्नर अपकीर्त्ति गौतम को किसी अज्ञात साधना या तप से सुदीर्घ जीवन का वर प्राप्त था। उनके वध के लिए नदियों में, जहां से वे जल ग्रहण करते थे, वहां विष घोल दिया गया, उनकी निष्ठा और तप को भंग करने हेतु विष-कन्याओं और वृहन्नलाओं को ही नहीं अपितु धतकर्म के अप-कार्य में निपुण वधिकों, व्याधों और आखेटकों को भी नियुक्त किया गया। उनके आहार एवं आजाविका के समस्त स्रोतों को अपहृत कर लिया गया। अपशब्द और अभिशाप को संचालित करने वाले समग्र संसाधनों को सक्रिय-सन्नद्ध कर दिया गया। परंतु दीर्घ जीवन के वर के कारण आचार्य वृहन्नर गौतम जीवित रहे और राजमार्ग के वृक्षों की त्वचा पर अपने वाक्य निरंतर उत्कीर्ण करते रहे, जिनसे दावाग्नि का प्रसार-विस्तार होता रहा।

तो सम्राट, राजा और उनके समस्त अधिकारियों, राणकों, सामंतों समेत अभिजात्यों और सभासदों ने एक विराट यज्ञ का आयोजन किया। एक हजार गउओं और इक्यावन अश्वों की बलि हुई। ‘त्राहि माम… त्राहि माम…’ आपद्धुरणाय! आपद्धुरणाय!!’ का मंत्रोच्चार हुआ तो उस महा-यज्ञ से ब्रह्मा तो नहीं प्रकट हुए, परंतु सबको आश्चर्यचकित और किंकर्तव्यविमूढ़ करते एक परम शक्तिसंपन्न तंत्राचारी, उच्चकुलासीन, विकट, अपराजेय अघोरपंथ के उपासक, पंच ‘मकारवादी’ (अर्थात, मांस, मदिरा, मत्स्य, मैथुन तथा मुद्रा भोगी) एक शिखाधारी, तिलकित भाल, रक्ताभ-नयन, अर्द्ध-यम, अर्द्ध-धवल मिश्रवर्णी) बलशाली पौरुषेय, परसुधारी मानव-रूप प्राणी का आगमन हुआ।

उस प्रचंड हिंस्र तंत्राचारी ने सबकी याचना सुनने के उपरांत कहा – ‘आप सब निर्भय हों। समस्त भोगों और विलासों को प्राप्य मानें। निष्कंट और प्रफुल्ल रहें। मेरे अधीन एक अमोघ शस्त्र है। यह अभिशाप के प्रारूप में है। मैं आज ही इसकी साधना करता हूं तथा इसे उपलब्‍ध कर इस महाभिशाप को अनंत-अनंत युगों, संवत्सरों तक के लिए अभियोजित तथा क्रियाशील करता हूं। निश्चिंत रहें, उस दुष्ट आचार्य वृहन्नर अपकीर्त्ति गौतम को आजीवन वनों, नगों, पर्वतों, प्राचीरों एवं दुर्गम-दुस्सह कंदराओं में भटकना पड़ेगा। वह इस यंत्रणा से कभी मुक्त नहीं हो सकेगा।’

इतना कहने के पश्चात इस मानवतनधारी तंत्रोपासक, जिसके वशीभूत राज्य-प्रणाली के समस्त ‘तंत्र’ थे, ने दीर्घ उच्छ्वास के साथ कहा – ‘अब इस अपकीर्त्ति गौतम का अंत ही आप सब समझें।’

इस वचन के साथ उसने इक्कीस नर-मुंडों का हवन समिधा की भांति कुंडाग्नि में किया और आकाश, जहां प्रचंड चक्रवात की आशंका झलक रही थी, की ओर अपना मुख उठा कर, दोनों बाहुओं को ऊपर उठाते हुए, कानों को वधिर कर देने वाले शब्दों में शाप दिया…

’ह्रीं… ह्रीं… फट… फट ऊंचार! ह्रीं…!!’ के उपरांत उसने कुछ अस्फुट शब्दोच्चार किया और पुन: अपने बाहुओं को ऊर्ध्वोन्मुख, दक्षिण दिशांत की ओर झुलाते हुए, उच्च स्वरों में कहा, जिसे सुन कर गर्भधारिणी स्त्रियों, पक्षियों, गउओं समेत समस्त जलचर, थलचर तथा नभचर प्राणियों का गर्भापात हुआ एवं नवजात अकाल काल-कवलित हुए… ‘मैं यदि उस दुष्ट आचार्य वृहन्नर अपकीर्त्ति गौतम को यह शाप देता हूं तो इसका लक्ष्य संकीर्ण एवं सीमित रहेगा। इसीलिए मैं इस महाभिशाप से आप समस्त उपस्थित और अनुपस्थित विभूति-आकांक्षियों को अभिसिक्त करता हूं। आप सब इस अभिशाप के आजीवन अधीन रहेंगे तथा मृत्योपरांत आपकी संततियां भी इससे विमुक्त नहीं हो सकेंगी…!’

तत्पश्चात उसने एक अतीव अट्टहास किया और कहा : ‘आज के पश्चात, अर्थात, यह जो भी दिवस, प्रहर, घटी, संवत्सर, वर्ष और पल हो, आप में से जो भी उस अचार्य वृहन्नर अपकीर्त्ति गौतम को प्रश्रय, शरण, समर्थन, भोजन, शयन इत्यादि प्रदान करने का दुष्प्रयत्न करेगा अथवा उसकी प्रशंसा, आतिथ्य का नियोजन करेगा, उसका मस्तक स्वत: अपने धड़ से पृथक हो कर भूमि पर गिर जाएगा। ऐसा करने वाले का शिरोच्छेदन करने के लिए, आज से समस्त तंत्र विवश और वाध्य होंगे…!’

इतना कह कर उस विकराट, भयप्रद प्राणी ने गौ, अश्व, नर, स्त्री तथा शिशु मांस का भक्षण किया और अट्टहास करता हुआ दक्षिण दिशा की ओर, जिधर पाताल का साम्राज्य था और जहां इस मध्याह्न में भी अर्द्ध-रात्रि बेला थी, प्रस्थान कर गया।

जाते हुए उसने जो डकार तथा अपान वायु का निसर्जन किया उससे समस्त वायु मंडल आप्लावित हो गया।

किंवदंती है कि तब से आज तक हर तंत्रोपासक अथवा तंत्राश्रित बौद्धिक तथा सताश्रयी-सत्तासीन मानवतनधारी उस आचार्य वृहन्नर अपकीर्त्ति गौतम को अपशब्दों, अपमानजनक विश्लेषणों, अफवाहों इत्यादि से संबोधित करता रहता है।

यही कारण है, आप ध्यान से अपने आसपास के ऐसे लोगों को देखें, उनके सिर उनके कबंधों पर न सिर्फ सुशोभित हैं बल्कि उनके मस्तकों पर राज-मुकुट भी धरे हुए दीखते हैं।

उन्हें आप पंच मकारों अर्थात मांस, मत्स्य, मुद्रा, मदिरा और अनवरत मैथुन में निमग्न देख सकते हैं। तनिक अपनी भाषा एवं भूगोल में देखें, वे छाये हुए हैं।

इसी के लिए उन्होंने एक ‘ग्लोबल-व्यवस्था’ का निर्माण कर रखा है।

जहां तक आचार्य वृहन्नर अपकीर्त्ति गौतम का प्रश्न है, तो वे किन्हीं कंदराओं, वनों और दुर्गम पर्वतों में किसी अज्ञात स्थल में रह रहे होंगे।

उनका क्या है?

वे तो अब भी राजमार्गों के आसपास उगे वृक्षों के तनों की खाल पर कुछ न कुछ वाक्य उत्कीर्ण करते रहते हैं।
दावाग्नि इसी से उत्पन्न होती है।

[इसके आगे की कथा एक दूसरी किंवदंती में निबद्ध है। मैं उसे खोजने की कोशिश करता हूं। असल में मैंने वैशाली के अपने फ्लैट के स्टोर रूम में बहुत सी पुरानी किताबें, ग्रंथ और पांडुलिपियां भर रखी हैं। बीच में, पिछले साल लंबे अर्से के लिए बाहर की यात्राओं में निकल गया था। पत्नी भी अपने मायके और ससुराल में थीं। तो स्टोर रूम में दीमकों का आक्रमण हो गया। कुछ दस्तावेज धूल और कागजी बुरादे में बदल गये। बाद में, लौटने पर पेस्ट कंट्रोलर्स को बुलाया तो समस्या निपटी। आज फिर वहां, फुर्सत मिली तो आप दोस्तों के लिए घुसूंगा और वह प्रपत्र निकालूंगा जिसमें मैंने इस किंवदंती के नोट्स लिये थे। तब तक प्रतीक्षा कर लें। (यदि यह संभव न हो सका, तो कुशीनगर, लुंबिनी से लेकर दांतेवाड़ा, अचानकमार, भैरूंसांग, चंद्रपुर के राजमार्गों के पेड़ों की छाल पर उत्कीर्णित अभिलेखों, आपत-वचनों के जरिये आचार्य वृहन्नर अपकीर्त्ति गौतम के अज्ञात गुप्त स्थल का पता लगा कर, उनसे मिल कर आगे की कथा जानने का प्रयत्न करूंगा।]

(उदय प्रकाश। मशहूर कवि, कथाकार, पत्रकार और फिल्मकार। कई कृतियों के अंग्रेजी, जर्मन, जापानी एवं अन्य अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में अनुवाद उपलब्ध। लगभग समस्त भारतीय भाषाओं में रचनाएं अनूदित। ‘उपरांत’ और ‘मोहन दास’ के नाम से इनकी कहानियों पर फीचर फिल्में भी बन चुकी हैं। उनसे udayprakash05@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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