आओ सखि, कहें और कह कर मुकर जाएं!

♦ पीयूष द्विवेदी भारत

ह मुकरी काव्य की एक विधा है। इसका अस्तित्व भारतेंदु युग की समाप्ति और द्विवेदी युग के आरंभ के साथ लगभग लुप्तप्राय हो गया। इस विधा पर अमीर खुसरो ने सर्वाधिक काम किया। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने भी कह-मुकरियों की काफी रचना की। लेकिन भारतेंदु युग के बाद जब द्विवेदी युग आया तो आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के शास्त्रीयता के प्रति झुकाव के कारण तत्कालीन दौर के तकरीबन सभी रचनाकारों ने शास्त्रीय छंदों की राह पकड़ ली। और इस तरह खुसरों की बेटी और भारतेंदु की प्रेमिका कहलाने वाली ‘कह-मुकरी’ जैसी रसपूर्ण और मनोरंजक काव्य-विधा गुम होती गयी। इसके बाद क्रमशः छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और नयी कविता के दौर आए, पर इनमे से किसी भी दौर के किसी भी रचनाकार का ध्यान कह-मुकरी की तरफ नहीं गया। आज के इस दौर में जब अतुकांत और मुक्तछंद कविता को ही आलोचनात्‍क महत्‍व मिल रहा है, कह-मुकरी की बात करना साहस का विषय है।

वाकया उस दिन का है जब मेरे एक साहित्यप्रेमी मित्र ने यूं ही साहित्यिक चर्चा के दौरान कह-मुकरी की चर्चा छेड़ दी। फिर क्या था, खुसरो से लेकर भारतेंदु तक, कुछ हमने कुछ उसने कह-मुकरियां गुनगुनायीं। ‘कह-मुकरी’ को लेकर मन में रचनात्मक ऊर्जा और उत्साह तो मन के भीतर तो काफी पहले से था, पर मित्र के साथ इस कह-मुकरी गायन ने उस सोये हुए उत्साह को जागृत कर दिया। मन हुआ कि कह-मुकरी के प्रचार-प्रसार के लिए अपने स्तर पर कुछ करूं, पर सवाल कई थे कि अकेले क्या हो सकता है? और ‘नयी कविता’ के इस युग में साथ कौन देगा? शुरुआत कहां से और कैसे हो? फेसबुक पर एक मित्र (अविनाश दास) मिले, तो उन्‍हें इस विषय में बताया। उन्‍होंने दिलचस्‍पी दिखायी। फिर मैंने फेसबुक पर ‘कह-मुकरी’ नाम का एक समूह बना दिया। समूह बनने की देरी थी कि कई रचनाकारों ने कह-मुकरी की रचना शुरू कर दी, जो अब भी जारी है। असर का आलम ये कि दो दिनों में ही ‘कह-मुकरी’ सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गयी।

‘कह-मुकरी’ एक ऐसी काव्‍य-विधा है, जिसका स्‍वरूप इसके नाम में ही छिपा है। ‘कह-मुकरी’ यानि कहके मुकर जाना। इसे ग्रामीण क्षेत्रों में कहे जाने वाले बुझौव्वल (पहेली) का ही थोड़ा रचनात्‍मक रूप कह सकते हैं। अमीर खुसरो की कुछ कह-मुकरियां यहां उदाहरण के तौर पर हम रख रहे हैं –

1.
जब मांगू तब जल भरि लावे
मेरे मन की तपन बुझावे
मन का भारी तन का छोटा
ऐ सखि साजन? ना सखि लोटा!
 
2.
वो आवै तो शादी होय
उस बिन दूजा और न कोय
मीठे लागें वा के बोल
ऐ सखि साजन? ना सखि ढोल!

खुसरो की उपर्युक्त कह-मुकरियों पर गौर करें तो कुछ बातें स्पष्ट हो जाती हैं –

1. कह-मुकरी दो सखियों के संवाद पर आधारित है। इसमें चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 16-16 या 15-15 मात्राओं का क्रम चलता है। जैसे, खुसरो की पहली ‘कह-मुकरी’ में 16 मात्राओं का क्रम है, तो दूसरी में 15 मात्राओं का।

2. कह-मुकरी के पहले तीन चरणों में एक सखी द्वारा दूसरी सखी को किसी निश्चित व्यक्ति/वस्तु के लक्षण बताये जाते हैं।

3. आखिरी चरण के आधे में दूसरी सखी बताये लक्षणों के आधार पर एक उत्तर बताते हुए पहली सखी से उत्तर की सत्यता के विषय में प्रश्न करती है। पर, यहां दूसरी सखी मुकर जाती है और ऊपर बताये लक्षणों से मिलता-जुलता, किंतु अलग सा उत्तर दे देती है।

4. माने कि इसमें छेकापह्नुति अलंकार होता है, जो कि प्रस्तुत को अस्वीकार, अप्रस्तुत को सामने रखता है।

उपर्युक्त बातों के बाद ‘कह-मुकरी’ के विधान के बारे में तो लगभग सभी मुख्य बातें स्पष्ट हो गयीं। इन बातों का ध्यान रखते हुए ‘कह-मुकरी’ की रचना की जा सकती है। अब हम ‘कह-मुकरी’ से जुड़े कुछ अन्य प्रश्नों व संदेहों पर आते हैं और उनके समाधान का प्रयास करते हैं। जैसे कि एक प्रश्न ये उठा कि इसके आखिरी चरण में ‘ऐ सखि’ का ही प्रयोग क्यों किया जाता है, कुछ और क्यों नहीं – क्या सिर्फ इसलिए कि खुसरो ने इसका प्रयोग किया था? इस प्रश्न के उत्तर पर आएं तो जैसा कि ऊपर बताया गया है कि ‘कह-मुकरी’ दो सखियों के बीच की वार्ता पर आधारित है, के अनुसार ‘ऐ सखि’ का प्रयोग उचित ही प्रतीत होता है। अब प्रश्न ये भी हो सकता है कि कह-मुकरी को दो सखियों के बीच की ही वार्ता क्यों माना जाए – दो मित्रों के बीच की भी तो मान सकते हैं? इस प्रश्न का उत्तर समझने के लिए हमें ‘कह-मुकरी’ के नाम पर गौर करना होगा। ‘कह-मुकरी’ में ‘मुकरी’ का प्रयोग हुआ है, जो कि स्त्रीलिंग का भाव प्रकट करता है। अर्थात कि कोई स्त्री अपनी बात से मुकरी। अगर ये दो मित्रों के बीच की चर्चा होती, तो इसे ‘कह-मुकरा’ कहा जाना चाहिए था। वैसे, इन सभी तर्कों व तथ्यों के बावजूद इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि खुसरो द्वारा ‘ऐ सखि’ का प्रयोग करना आज इसके प्रयोग के लिए मुख्य कारण है। पर अगर रचनाकार चाहे तो इसके स्थान पर किसी अन्य शब्द का प्रयोग कर सकता है, बशर्ते कि वो शब्द कथ्यानुसार सटीक बैठता हो।

कई मित्रों ने यह भी प्रश्न उठाया था कि ‘कह-मुकरी’ सही नाम है या ‘कह-मुकरनी’? इस प्रश्न पर काफी विचार के बाद मुझे जो समझ में आया, वो साझा करता हूं। अगर पारंपरिक रूप से देखें, तो चलन में ‘कह-मुकरी’ ही है, इसके अलावा शब्द-संरचना की दृष्टि से भी ‘मुकरी’, ‘मुकरनी’ से कहीं बेहतर और स्पष्ट है। लिहाजा ऐसा कोई कारण नहीं दिखता जिसके आधार पर ‘कह-मुकरी’ को ‘कह-मुकरनी’ कहा जाए या ‘कह-मुकरनी’ को सही माना जाए।

अंत में सिर्फ इतना ही अनुरोध करता हूं कि इस आलेख को पढ़ें, समझें, कुछ कमी या गलत लगे तो बताएं और सबसे बड़ी बात कि ‘कह-मुकरी’ रचने का प्रयास जरूर करें। अधिक नहीं तो रोज कम से कम एक से दो ‘कह-मुकरी’ तो रचें ही। क्योंकि, शास्त्रीयता के आवरण में छुप गयी खुसरो की इस थाती को हमें पुनः काव्य की मुख्यधारा में लाना है और लोगों को इसमें छिपी महत्ता और ऊर्जा से अवगत कराना है। पर ये किसी एक-दो या चार लोगों के द्वारा नहीं हो सकता। इसके लिए अनिवार्य है कि हाथ से हाथ जुड़ते जाएं और ‘कह-मुकरी’ प्रेमियों की एक ऐसी कड़ी तैयार हो कि फिर जहां देखो वहां ‘कह-मुकरी’ की मौजूदगी मिले।

Piyush Dwivedi Bharat(पीयूष द्विवेदी भारत। मूलतः उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले से हैं। वर्तमान स्थिति नोएडा है। अभी स्नातक के छात्र हैं तथा अखबारों, वेबसाइट्स आदि के लिए स्वतंत्र रूप से लिखते भी हैं। इनसे 08750960603 और sardarpiyush24@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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