जय हो, जय हो, हिटलर की नानी की जय हो!

♦ कमल मिश्र

दोस्तों, पता नहीं आप को भी ऐसा कुछ अनुभव हुआ या नहीं, लेकिन बीते दिनों कम से कम मुझे लगातार ऐसा महसूस होता रहा था जैसे ‘दीवान’ स्तरीय बहसों में उलझने और हमारे दौर के निहायत जरुरी सवालों से टकराने के बजाय अघोषित तौर से फेसबुकिया किस्म की अभिव्यक्तिओं और आत्म-प्रचार का एक निर्विवादित मंच बनता जा रहा है। पिछले कुछ महीनों के दौरान कई मौकों पर मुझे ऐसा लगा जैसे हिंदी की सार्वजनिक और जालीय दुनिया में एक आला बौद्धिक प्रतिमान स्थापित करने की अपनी जवाबदेही से ‘दीवान’ निरंतर विमुख होता जा रहा है। और यह सब तब हो रहा था जब कि हिंदी में सोचने समझने वाली जमात को ‘अभिव्यक्ति’ और ‘विमर्श’ के इस स्तरीय मंच की बेइंतहां जरुरत है। लेकिन ऐसा लग रहा है कि शायद मैं ही गलत समझ रहा था। और मैं व्यक्तिगत रूप से रविकान्त का आभारी हूँ, जिनके सचेत और गंभीर प्रयासों से एक बार फिर ‘दीवान’ पर बहसों का मेयार ऊँचा होता जान पड़ता है!

गणतंत्र दिवस के ऐन पहले ‘दीवान’ पर प्रकाशित अपनी सारगर्भित टिप्पणी में भाई अभय तिवारी जी ने हाल में घटी कई एक शर्मनाक स्त्रीविरोधी घटनाओं से भारतीय समाज के मर्ज की पहचान करने के क्रम में उस बड़े संकट की ऒर इशारा किया हैं – “जहाँ संवैधानिक व्यवस्था में क़ानून बनाकर बदलाव तो कर दिए गए मगर सामाजिक बदलाव का पक्ष पूरी तरह उपेक्षित रहा!” साथ ही, अभय जी का ये स्पष्ट मानना है कि, “हमारा संविधान तो एकता, समानता और न्याय के प्रगतिशील मूल्यों पर आधारित है जबकि भारतीय समाज में कई स्तरों पर पिछड़ापन और पतनशीलता नज़र आती है।” चूँकि, आधा देश स्त्रीविरोधी, जातिवादी, साम्प्रदायिक, और न जाने किस-किस अपराध का भागीदार हो सकता है। इसलिए, अभय जी बेहद वाज़िब सवाल उठाते हैं कि, तब फिर क़ानून बनाकर, लोगों को अपराधी घोषित करके, उन्हे दण्डित करके क्या हासिल होगा? और, क्या दण्ड का डर ही बदलाव की बुनियादी शर्त है? तथा, असली बदलाव कैसे होता है? भीतर से या बाहर से? जिसके जवाब में वो बस इतना भर कहते हैं कि, “मेरी समझ में बाहर से केवल हिंसा हो सकती है, विकासमान परिवर्तन केवल भीतर से ही मुमकिन है।”

दोस्तों, खुद व्हाइट हाउस द्वारा जारी की गयी उस ताजा रिपोर्ट के बारे में पढ़ते हुए, जिसमें यह साफ कहा गया है कि अमेरिका में प्रत्येक पांच में से एक महिला अपने जीवनकाल में बलात्कार का शिकार होती है और आधी से अधिक ऐसी महिलाएं 18 साल की उम्र से पहले ही इस हमले का सामना करती हैं, मुझे अभय जी द्वारा प्रस्तुत ‘भीतर’ से बदलाव का सुझाव पहली नजर में काफी दमदार प्रतीत होता है। हालाँकि, विकासमान परिवर्तन के लिए आवश्यक ‘भीतरी’ बदलाव का प्रस्ताव करते हुए अभय जी ने क्योंकि इस खास बदलाव के सभी पहलुओं पर विस्तार से चर्चा नहीं की है, इसलिए उनका यह प्रस्ताव अत्यंत आकर्षक होने के बावजूद थोडा अस्पष्ट जान पड़ता है। यह साफ नहीं हो पाता कि क्या ‘वैयक्तिक सुधार’ जैसी कोई दृष्टि अभय भाई के लिए प्रेरणा श्रोत है और इसलिए ही उनकी यह मान्यता कि ‘बाहर से केवल हिंसा हो सकती है।’ जो भी हो इस सन्दर्भ में अभय जी का यह कहना कि ‘बाहर से केवल हिंसा हो सकती है’ मुझे तो थोडा सा अतिश्योक्तिपूर्ण लगता है। आप सभी सोचते होंगे, क्यों?

तो क्या इस बार गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र को दिए गए संदेश में आपने राष्ट्रपति महोदय को यह कहते हुए नहीं सुना कि “हम विचार-विमर्श और सहमति से समस्याएं हल करते हैं, बल प्रयोग से नहीं।” वैसे अगर आप मुझसे अब यह जानना चाहेंगे कि फिर क्यों बाबा नागार्जुन को 1975 में यह लिखना पड़ा था कि– इसके लेखे संसद=फंसद सब फ़िजूल है / इसके लेखे संविधान काग़ज़ी फूल है/ इसके लेखे/ सत्य-अंहिसा-क्षमा-शांति-करुणा-मानवता/ बूढ़ों की बकवास मात्र है/ इसके लेखे गांधी-नेहरू-तिलक आदि परिहास-पात्र हैं/ इसके लेखे दंडनीति ही परम सत्य है, ठोस हक़ीक़त/ इसके लेखे बन्दूकें ही चरम सत्य है, ठोस हक़ीक़त/ जय हो, जय हो, हिटलर की नानी की जय हो / जय हो, जय हो, बाघों की रानी की जय हो / जय हो, जय हो, हिटलर की नानी की जय हो! — तो मैं ये साफ कर दूं कि ऐसे मुश्किल सवाल आप अगर साहित्य की समाज- शास्त्रीय आलोचना करने वाले विशेषज्ञों के समक्ष उठाने के लिए बचा कर रखें तो बेहतर होगा। यहाँ मैं तो बस आप का ध्यान राष्ट्रपति महोदय के अभिभाषण के उस विशेष अंश की तरफ दिलाना चाहता हूँ जिसने स्वयं मेरा चित्त कल सबसे अधिक आकर्षित किया। गौरतलब है कि देशवासियों को सम्बोधित अपने वक्तव्य में राष्ट्रपति महोदय ने कहा कि, “शिक्षा अब केवल कुलीन वर्ग का विशेषाधिकार नहीं है वरन सबका अधिकार है। यह देश की नियति का बीजारोपण है।” और राष्ट्रपति महोदय, जिन्हें भरोसा है कि हम शिक्षा में विश्व की अगुवाई कर सकते हैं, ने यह भी आह्वाहन किया है कि “हमें एक ऐसी शिक्षा क्रांति शुरू करनी होगी जो राष्ट्रीय पुनरुत्थान का केंद्र बन सके।” अब इस बात से तो मुझे लगता है कि अभय जी भी सहमत होंगे कि समाज में विकासमान परिवर्तन के लिए ‘बाहर’ से बदलाव लाने का एक बेहतर और अहिंसक जरिया शिक्षा भी है।

वैसे इन दिनों जहाँ अपना डेरा है वहीँ पड़ोस में एक सरकारी विद्यालय भी है। सम्भवतः 26 जनवरी रविवार को पड़ता देख इस बार विद्यालय ने 25 जनवरी को ही गणतंत्र दिवस मनाने का फैसला किया था। इसलिए कल दिन में काफी देर तक लाउड स्पीकर पर ‘माँ तुझे सलाम’ से लेकर ‘राधा तेरा ठुमका’ जैसे गानों के बोल मोहल्ले की फ़िजा में तैरते रहे। स्कूली बच्चों को गणतंत्र के उत्सव में इस कदर उत्साह से भागीदारी करते देख अपना दिल भी गार्डन-गार्डन हो गया। तब लाज़मी था कि अपने स्कूल के दिनों की याद भी आयी। हालाँकि, सरकारी स्कूल– जिसे मेरे अपने मध्यवर्गीय परिवार के कुछ सदस्य ‘गदहिया गोल’ भी कहते थे– में पढ़ने का विशिष्ट तजुर्बा मुझे थोडा देर से ही मिला। दरअसल, परिवार वालों ने अपने उच्चवर्णीय आग्रहों और मध्यवर्गीय आकाँक्षाओं के दबाव में मेरी प्राथमिक शिक्षा के लिए मुझे ‘जेसी बाल मंदिर’ जैसे हिंदी माध्यम के एक प्राइवेट स्कूल में भेजने का इंतजाम कर रखा था। लेकिन बड़ी राहत की बात ये हुई कि अपने क्षेत्रफल के लिहाज से देश के सबसे बड़े मगर विकास के मानकों के आधार पर प्रदेश के सबसे पिछड़े जिले में चाह कर भी वो मैट्रिक स्तर पर मेरे लिए कोई बेहतर विकल्प नहीं तलाश सके, और अंततः उन्हें मेरा दाखिला जी.आई.सी.याने ‘गवर्नमेंट इंटर कॉलेज’ में करवाना पड़ा। जहाँ 1990 के शुरुआती वर्षों में मासिक शिक्षा शुल्क होता था महज पाँच रुपये, और सरकारी तनख्वाह पर अपनी गुजर-बसर करने वाले ज्यादातर अध्यापको की दिलचस्पी कक्षा में पढ़ाने से ज्यादा प्राथमिक तौर से छात्रों को अपने ठिकाने पर 150 रुपये मासिक के ‘ट्यूशन’ के लिए बुलाने में मुब्तिला होती थी। किशोरवय के ज्यादातर तेज -तर्रार छात्र भी इसीलिए यहाँ स्कूल की कक्षाओं में अपना वख्त बर्बाद करने के बजाय अक्सर ‘काम’ की बातों में उस समय का सदुपयोग करते पाये जाते थे। स्कूल के सबसे ऊर्जस्वी छात्रों का जुटान होता था इसके बेहद विस्तृत खेल प्रांगण में। कहने को तो स्कूल के इसी विशाल मैदान में चुनावी बयार बहने पर इंदिरा गांधीं, राजीव गांधी, वी पी सिंह, चंद्रशेखर, देवगौड़ा सहित अनेक दिग्गज भी समय समय पर हेलीकाप्टर के जरिये ‘लैंड’ करते रहे थे। लेकिन मौजी छात्रों की मस्ती के रंग में भंग यदा कदा तब होता जब बजरंगी सिंह यादव जैसा कोई ‘सरफिरा’ प्राध्यापक तबादले के बाद हेड मास्टर के रूप में स्कूल का चार्ज ले लेता और सहयोगियों के साथ घूम-घूम कर स्कूल के विशाल मैदान में कन्चे, गिल्ली-डंडा, क्रिकेट, फुटबाल और पतंगबाजी के रियाज में लगी हुई युवा प्रतिभाओं को, या स्कूल की चहारदीवारी से लगे शायरी माई के शांत वृक्ष- बट में गाँजे का दम साध रहे और जुए के फड पर बैठे होनहारों को, क्लास रूम में कैद करने का खलनायकीय उपक्रम करता। वैसे इसी दौरान प्रदेश भर में मौज के अभ्यासी छात्र-छात्राओं का दम तो एक बार तब भी फूल गया था जब उत्तर प्रदेश में गठित भाजपा सरकार ने नक़ल विरोधी अध्यादेश ला कर बोर्ड की परीक्षाओं में उत्तीर्ण होना एक महनीय लक्ष्य घोषित कर दिया था। लेकिन भला हो समाजवादी पार्टी का जिन्होंने इस मामले में पूरी मुलायमियत का रुख अपनाया और पढ़वैया छात्र-छात्राओं की उखड़ती साँसे एक बार फिर संभल गयीं।

खैर, दिल्ली में अपने पड़ोस के सरकारी स्कूल के बच्चों को गणतंत्र दिवस के रंग में रंगा देख कर सरकारी विधालय में गणतंत्र दिवस के उपलक्ष में बंटने वाले लड्डुओं की मिठास मुझ पर भी ताजा हो गई। और फिर याद आया वो स्कूली परिवेश जहाँ के सहज-उन्मुक्त माहौल में, बी. एच. यू., जामिया मिल्लिया इस्लामिया तथा दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे प्रख्यात शिक्षा केन्द्रों में प्रवेश के पहले, संपन्न हुयी मेरी और मेरे जैसे अविकसित इलाकों से ताल्लुक रखने वाले दूसरे अनेकों भारतीय नागरिकों की अनुकूल शिक्षा-दीक्षा। लेकिन राष्ट्रपति महोदय के अभिभाषण के अतिरिक्त भी प्रायः शिक्षा और समाज निर्माण के मुद्दों पर विशेषज्ञों को सुनते हुए मैं खुद को बड़ा निराश महसूस करता हूँ। अब आप को कहीं ये न लगे कि मैं कोई घोर निराशावादी हूँ इसलिए यह स्पष्ट कर दूं कि इस बारे में मेरी निराशा की मूल वजह है ऐसे तमाम विशेषज्ञों में शिक्षा को ले कर एक सम्यक दृष्टि का आभाव। आप गौर करें तो पता चलेगा कि या तो कुछ लोग सार्वभौमिक शिक्षा के नाम पर प्राथमिक शिक्षा पर पूरा जोर पेलते नजर आते है या फिर उच्च शिक्षा पर। ऐसे विमर्शों में माध्यमिक शिक्षा अगर गलती से शामिल भी होती है तो केवल अधिक रोजगारपरक बनाये जाने के कोलाहल स्वर रूप में। मुझे हमेशा ये लगता है कि अगर इस मुल्क को जिम्मेवार नागरिक दरकार हैं तो माध्यमिक शिक्षा को कहीं ज्यादा समाजोन्मुख और स्तरीय भी बनाना होगा।

[कमल मिश्र सुपरिचित लेखक-टिप्‍पणीकार हैं। उन्‍हें दीवान मेल ग्रुप पर अक्‍सर पढ़ा जा सकता है।]

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