इस जिंदगी का कोई निर्देशक नहीं होता!

♦ उमेश पंत

बांद्रा स्टेशन की तरफ आती हुई सड़क। हाथ में कत्‍थई लाल रंग के दिल के आकार के 25-30 गुब्बारों का एक गुच्छा। वो सफेद टॉप और नीली रंग की जींस पहनी हुई लड़की हाथ में छतरी के हैंडल की तरह एक डोरी थामे पूरे आत्मविश्वास से इस गुच्छे को लिये आगे बढ़ती जा रही थी। चेहरे पर न कोई डर न कोई घबराहट। चौदह फरवरी का दिन और बूढ़े, बच्चे, वयस्कों से भरी एक व्यस्त सड़क।

कुछ देर उसे देखने के बाद आस पास देखा। लड़के, लड़कियां और बुजुर्ग भी इस दृश्य को एक व्यस्त संकरी सड़क के कई आम दृश्यों में ये एक दृश्य समझ कर बिना ठिठके अपने अपने ठिकानों की तरफ चले जा रहे थे। ठीक उस वक्त एक बात दिमाग में आयी। अगर ये जगह दिल्ली होती तो? शायद दिल के आकार के चटख लाल रंग के गुब्बारों को लिये ये लड़की दृश्य में कहीं नहीं होती। होती तो उसके चेहरे पर खिली ये बेपरवाही शायद गायब होती। आसपास के लोगों की नजर शायद उस पर घूरने की हद तक टिकी होती। मनचलों की फब्तियां उसके कानों के किनारे से गुजरती हवा में तेजाब की तरह सरसरा रही होती। और कुछ भी हो सकता था, और हो सकता है कुछ भी न होता। दिल के आकार के इन लाल गुब्बारों ने एक पल के लिए मुंबई की कद्र दिल में और बढ़ा दी। प्यार का एक दिन मुकर्रर होना भले ही प्यार में इजाफा न करता हो पर उस दिन प्यार के प्रतीकों को बेखौफ आत्मसात कर लेने की सुविधा मिलना एक शहर के लिए आपके अपनापे को जरूर बढ़ा देता है।

अभी अभी एक राष्ट्रीय समाचार चैनल पर जीतेंद्र नाम के उस साधारण से दिखने वाले लड़के को इंटरव्यू देते सुना, जिसने उस साधारण से दिखने वाले आदमी का अभिनय किया था, जो ऐसे ही आम आदमी, आम आदमी का खेल खेलकर मुख्यमंत्री बन गया। अपनी एक साधारण सी टीम के बनाये उस स्पूफ के जरिये जिसने देशभर में पहचान पा ली। उसकी टीम जिसने चूतियापे को क्यूटियापे के कलेवर में पेश करके लाखों फैंस बना लिये। अपने ही सामने साधारण से लोगों के असाधारण से सपनों को बड़ा होते हुआ देखना, आम लोगों को खास पहचान पाते हुए देखना, यकीन मानिये एक साधारण अनुभव नहीं होता।

ठीक दो दिन पहले यही लोग अंधेरी के एक छोटे से हॉल में जिसे ऑडीटोरियम कहना अतिशयोक्ति की तरह होगा, एक शो कर रहे थे। तकरीबन 60-70 लोगों के बैठने की क्षमता वाले उस छोटे से कमरे में क्यूटियापा की टीम के लोग हू लेट थे डॉग्‍स आउट नाम का एक प्ले कर रहे थे। उस प्ले में काम करने वाले तकरीबन सभी लोगों के चेहरे यू ट्यूब और सोशल मीडिया में नजर रखने वाले लोगों के लिए अनभिज्ञ नहीं थे। हू लेट थे डॉग्‍स आउट नाम के इस प्ले का न टाइटल ऑरिजनल था, न ही उस प्ले का मूल ढांचा। पर जो चीज उस प्ले को देखने लायक बना रही थी वो ये कि प्ले में कोई कहानी ही नहीं थी, उसका कोई एक प्‍लॉट नहीं था, उसके किरदारों का कोई एक ग्राफ नहीं था, उस प्ले की कोई एक मुकम्मल शुरुआत नहीं थी, न ही उसका कोई एक निर्धारित अंत था। वो कभी भी शुरू और कभी भी खत्म हो सकता था। ठीक वैसे जैसे जिंदगी।

उस प्ले के किरदारों की विडंबना भी यही थी कि ये किसी को भी नहीं पता कि उस प्ले का निर्देशक कौन है? ठीक वैसा जैसा जिंदगी में होता है। हर मोड़ पे कोई नया किरदार आता है और जिंदगी को एक दिशा देने लगता है, तब पता चलता कि दरअसल अब तक जो घटनाएं हो रही थीं वो घटनाएं इसी निर्देशन के लिए हो रही थीं। पर कुछ ही देर में पता चलता है कि ये एक भ्रम था और आगे जो घटनाएं होगी उनको निर्देशित करने वाला कोई और होगा, पर कौन, ये कोई पता नहीं लगा सकता। हर आदमी जो खुद को आपकी जिंदगी के उस हिस्से का निर्देशक कह रहा है दरअसल वो पूरी जिंदगी में एक छोटा सा किरदार भर है। हम दरअसल एक ही जिंदगी में कई सारी ऐसी कहानियों के पात्र बन जाते हैं, जिनकी न कोई ठीक-ठीक शुरुआत होती है न कोई ठीक-ठीक अंत। इस प्ले का मुख्य कथानक अगर कुछ था तो शायद यही था।

प्ले में किरदार एक ऐसी कहानी का रिहर्सल कर रहे हैं, जिसके पात्र वो असल जिंदगी में भी खुद ही हैं। इस प्ले को देखना दरअसल अपनी जिंदगी जीते हुए लोगों को उसी जिंदगी का रिहर्सल करते हुए देखने जैसा अनुभव है।

निधि बिष्ट (जिनको ऑनलाईन गलियों में घूमने फिरने का शौकीन देश का एक बड़ा हिस्सा अब शायद मीनाक्षी लेखिका के नाम से भी जानता होगा) और (अर्जुन केजरीवाल के रूप में पहचान बनाने वाले) जितेंद्र कुमार ने क्यूटियापा के स्पूफ बौलीवुड आम आदमी पार्टी में किये अपने शानदार अभिनय को इस प्ले में भी दोहराया। निधि सिंह, आकांक्षा ठाकुर, कैरव शर्मा ये सारे किरदार, बिना कहानी के इस प्ले को तकरीबन एक घंटे तक देखने लायक बनाने की मुहिम में कामयाब रहे।

प्ले में कहीं टीवी के सीरियल्स की कहानियों पर चुटकी थी, तो कहीं पुराने हिंदी फिल्मी गानों की अदाकारी के स्पूफ के जरिये हंसाने की लगभग कामयाब हो गयी सी कोशिश। इन बातों के साथ छोटे से मंच पर इस प्ले के जरिये एक और बड़ी बात जो कही गयी वो ये थी कि किस तरह मुंबई जैसे बड़े शहर में रंगमंच जैसी पुरानी विधा से जुड़ने वाले लोग दरअसल वो नहीं हैं जो रंगमंच को एक कला के रूप में देखते हैं। इनमें से ज्यादातर वो लोग हैं जो एक्टिंग करना चाहते हैं पर जिन्हें फिल्मों या टीवी में शायद काम ही नहीं मिला इसलिए वो रंगमंच से जुड़ गये। एक कटाक्ष उन लोगों पर जिन्हें रंगमंच की कोई समझ नही है, ये उनके लिए बस फैशन की तरह है। हालांकि थिएटर के लिए पागलों की तरह समर्पित लोगों की भी एक ठीकठाक तादाद आज भी हमारे देश में शायद है, पर वो तादाद बहुत तेजी से कम हो रही है।

ये प्ले भले ही एक रंगमंचीय प्रदर्शन की कसौटी में कसने पर उतना खरा न उतरता हो पर इस प्ले में जुटी 60-70 लोगों की भीड़ को दरअसल एक नया ट्रेंड सेट करने की तरह से देखा जा सकता है। कैसे ऑनलाइन मीडिया के जरिये एक अनजान क्रिएटिव नौजवानों का समूह पहले अपनी पहचान बनाता है और फिर जब वो ऑफलाइन दुनिया में लोगों के बीच लाइव जाता है तो लोग उसे कैसे हाथों हाथ लेते हैं। छोटी सी शुरुआत करके बड़े से सपने देखने का माद्दा रखने वाले लोगों के लिए एक उम्मीद जताता सा एक प्ले। उम्मीद है कि ऐसी कोशिशें बड़े फलक में और बेहतर प्रस्तुतीकरण के साथ आगे भी देखने को मिलती रहेंगी और इस मुंबई डायरी के पन्नों में शामिल होती रहेंगी।

Umesh Pant(उमेश पंत। सजग चेतना के पत्रकार, सिनेकर्मी। सिनेमा और समाज के खास कोनों पर नजर रहती है। मोहल्‍ला लाइव, नयी सोच और पिक्‍चर हॉल नाम के ब्‍लॉग पर लगातार लिखते हैं। यूपी से ग्रामीण पाठकों के लिए निकलने वाले अखबार गांव कनेक्‍शन से भी जुड़े हैं। उनसे mshpant@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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