गैर-आदिवासी नेतृत्‍व की ओर इशारा

झारखण्ड विधानसभा के जनादेश के मायने

♦ राहुल सिंह

लेक्ट्रानिक मीडिया की छवियों से विकसित होनेवाली समझदारी के लिए भले झारखंड के चुनाव परिणाम अप्रत्याशित लगे, पर जानकार लोगों के लिए इस बार यह थोड़ा प्रत्याशित है। झामुमो को लेकर राष्ट्रीय दलों भाजपा और कांग्रेस का रवैया लगभग एक-सा था। दोनों ने उसे तवज्जो नहीं दी। पर जहां भाजपा द्वारा झामुमो की अनदेखी के मूल में उनकी रणनीति थी, तो वहीं कांग्रेस अपनी अहमन्यता में डूबी थी। कांग्रेस राष्ट्रीय दल के गुमान में एक कदम भी पीछे हटने को तैयार नहीं थी। बिना किसी जमीनी तैयारी के ताल ठोंकते कांग्रेसियों में जो चुनाव जीतने में कामयाब रहे हैं, उनकी आत्मा जानती है कि उनकी जीत पार्टी की जीत से कहीं ज्यादा उनके व्यक्तिगत कोशिशों का परिणाम रही है।

झामुमो को कांग्रेस की तुलना में ज्यादा गंभीरता से भाजपा ने लिया था। यही वजह रही कि नरेन्द्र मोदी ने अपने चुनावी रैलियों में ‘बाप-बेटे’ को लक्ष्य किया था। इतना ही नहीं, दुमका के बरहेट में मोदी ने चुनावी सभा की, जहां से हेमंत सोरेन खुद चुनाव लड़ रहे थे। कोल्हान और संताल परगना में सेंधमारी पर ही मोदी लहर की परख होनी थी। शहरी क्षेत्रों में भाजपा का जनाधार तो पहले से मौजूद था। असल में झारखंड में दो ही दल पूरी ताकत के साथ चुनाव लड़ रहे थे। एक भाजपा और दूसरी झामुमो। झारखंड की जनता ने उन्हें क्रमशः सत्ता और विपक्ष की निर्णायक बागडोर सौंप दी है।

चुनाव से पहले झारखंड की कायदन पहली ‘ब्रेकिंग न्यूज’ भाजपा-आजसू गठबंधन थी। अंतिम समय तक बेहतर सौदे-प्रस्ताव की ताक में रहनेवाले झारखंडी राजनीति के सबसे अवसरवादी व्यक्ति सुदेश महतो को चुनाव से पहले घुटने टेक देने की भंगिमा उनके खोते जनाधार को जाहिर कर रही थी। अपनी तयशुदा हार से बचने के लिए उन्होंने अपनी पार्टी को लगभग दांव पर लगा दिया। दिल्ली से गठबंधन करके लौटने के बाद भी उनके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थी। कमोबेश यही भाव उनके समर्थकों के चेहरे पर भी थे। हटिया सीट को दिल्ली में बेचकर सिल्ली को बचाने की उनकी कोशिश अब दयनीय साबित हो चुकी है।

बाबूलाल मरांडी अपने बूते भाजपा से अलग होकर जिस ऊंचाई तक जा सकते थे, वहां से उतार का रास्ता ही बचता था। और वे उसी रस्ते पर हैं। इस चुनाव से पहले उनके पास खुद को पुनर्जीवित करने का एक स्वर्णिम अवसर ‘घर-वापसी’ के रूप में मौजूद था। जनता खुले मन से इसे स्वीकार करने के पक्ष में थी। लेकिन महत्वाकांक्षा का कोई तार्किक आधार न हो, तो अंततः वह दयनीयता की चौखट पर माथा पीटते नजर आती है। सत्ता से बाहर रहने के दौरान और खास कर चुनावी सभाओं में बाबूलाल मरांडी के वक्तव्यों को ध्यान दें, तो वे ऐसे वायदे करते नजर आ रहे थे जो उनके कार्यकाल में लिये गये उनके फैसलों से बिलकुल उलट थे। ऐसा पहली बार हुआ था कि वे अपने लिए एक सुरक्षित सीट तलाश रहे थे। लेकिन वे दोनों जगहों से चुनाव हार गये। चुनाव से पहले सबसे ज्यादा भगदड़ उनकी झाविमो में मची थी और आगामी चुनावों में उनके बचे हुए विधायक भी अपना रास्ता तलाश लेंगे।

झारखंड चुनाव को लेकर भाजपा की गंभीरता का अनुमान नरेन्द्र मोदी की रैलियों की संख्या और उसकी ‘टाईमिंग’ से लगाया जा सकता है। यूपीए के दस साल के शासन में बतौर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एक बार भी झारखंड नहीं आये थे। अपने छह महीने के संक्षिप्त प्रधानमंत्रित्व काल में नरेन्द्र मोदी दसियों बार झारखंड आये। पांच चरणों के चुनाव में उनकी रैलियां ज्यादातर ऐसे दिनों में हुई जब किसी दूसरे क्षेत्र में मतदान हो रहे थे। दिन भर उनकी रैलियों के उद्बोधन को समाचार चैनल प्रसारित करते रहते थे। यह कानूनन तो किसी आचार संहिता का उल्लंघन नहीं था, पर प्रचार का यह अच्छा चोर दरवाजा भाजपा ने ढूंढ निकाला था। बावजूद इसके जिस तरह हेमंत सोरेन खम ठोंक कर खड़े थे, उनकी उस दृढ़ता की अनदेखी नहीं की जा सकती है।

यह हेमंत सोरेन के जीवन के कठिन चुनावों में से एक था क्योंकि सारा दारोमदार उनके कंधे पर था। वरिष्ठ नेताओं के रहते उनकी ताजपोशी ने पार्टी के स्तर पर जिस किस्म के असंतोष को हवा दी थी, अगर इस चुनाव में वे अपनी साख और कद नहीं बचा पाते तो पार्टी में टूट का खतरा हो सकता था। चुनाव से पहले झामुमो के खिलाफ मोर्चा खोले साइमन मरांडी को उन्होंने जैसे बाहर का रास्ता दिखाया और हेमलाल मूर्मु समेत स्टीफन मरांडी जैसे वरिष्ठ नेताओं की घर-वापसी करायी, उससे उनकी सूझ-बूझ का पता चलता है। इस चुनाव के असल नायक के रूप में वे उभरे हैं। आदिवासी मसलों पर पिता वाली आक्रामकता से इतर हेमंत सोरन गाहे-बगाहे रजरप्पा (छिन्न्मस्ता मंदिर) में अपने परिवार के साथ पूजा करते या अपने बच्चों का मुंडन कराते दिखते रहे हैं। पिता की तुलना में उनकी एक उदार छवि जनमानस में है।

शायद ही लोगों ने ध्यान दिया हो कि आदिवासी मसलों को अपने राजनीतिक एजेंडे पर सबसे ऊपर रखने का काम गीताश्री उरांव ने किया, जो चुनाव हार चुकी हैं। खासकर जो लोग चुनाव हार गये हैं, उनको ध्यान में रखें तो इस जनादेश से एक साफ संकेत निकलता है कि झारखंड की जनता पहले की तुलना में ज्यादा परिपक्व हुई है। जैसे भ्रष्टाचार के आरोपों में संलिप्त पूर्व निर्दलीय मुख्यमंत्री मधु कोड़ा और हरिनारायण राय चुनाव हार चुके हैं। यूपीए के आखिरी चौदह महीनों के शासन में राजेन्द्र सिंह और उनके बेटे को लेकर जिस किस्म के आरोप लगते रहे, हार एक स्तर पर उन आरोपों की पुष्टि करती है। संभवतः राजेन्द्र सिंह से नजदीकियों का खामियाजा राजद की अन्नपूर्णा देवी को भी हार के तौर पर भुगतना पड़ा। अपने उलूल-जुलूल बयानों को लेकर सुर्खियों में रहनेवाले मन्नान मलिक का चुनाव हारना भी समझ के परे नहीं है। रकीबुल हसन से संपर्क की खबरें राजद के सुरेश पासवान और झामुमो के हाजी हुसैन अंसारी के लिए भारी साबित हुईं।

झारखंड के चार पूर्व मुख्यमंत्री इस बार एक साथ चुनाव हार गये हैं। इनमें अर्जुन मुंडा (खरसावां), मधु कोड़ा (मझगांव), बाबूलाल मरांडी (दोनों जगहों से), हेमंत सोरेन (दुमका) शामिल हैं। इसके दो स्पष्ट संकेत यह भी हैं कि अब राज्य की जनता गैर आदिवासी मुख्यमंत्री के बारे में गंभीरता से सोच रही है। क्योंकि भाजपा के पक्ष में जनादेश होने के बावजूद वह अर्जुन मुंडा के पक्ष में नहीं है। दूसरा, जनता अब चाहती है कि उनका विधायक या सांसद क्षेत्र में वक्त दे। दुमका के एक आम संथाल ने निजी बातचीत में बहुत मार्के की बात कही थी कि गुरुजी या हेमंत दुमका में उतने ही दिन रहते हैं, जितने दिन आचार संहिता लागू रहती है। क्षेत्र को भूल कर राजधानी में विचरण करनेवाले ऐसे नेताओं को इस बार थोक में झारखंड की जनता ने हैसियत बताने का काम किया है।

बगोदर से माले के इकलौते विधायक बिनोद सिंह की हार और मासस के अरुप चटर्जी की मार्जिनल जीत से वामपंथ के घटते जनाधार का पता चलता है। झारखंड के गठन के चौदह वर्षों के बाद पहला ऐसा जनादेश मिला है, जिसके मायनों को समझ कर झारखंड के राजनीतिक दल अपनी आदतों में सुधार कर सकते हैं और एक बेहतर लोकतंत्र के निर्माण में सहायक हो सकते हैं।

शासन का जनादेश भाजपा के पक्ष में है और विपक्ष की जवाबदेही झामुमो को जनता ने सौंपी है। विपक्ष के तौर पर झामुमो भाजपा के लिए एक बड़ा सिरदर्द साबित हो सकती है। एक आक्रामक विपक्ष का उनके पास एक शानदार इतिहास है। हिंसक प्रदर्शनों से उन्हें गुरेज नहीं है। सड़क और रेल का चक्का कभी भी कहीं भी रोक देने की कूबत रखनेवाली झामुमो से भाजपा को पार पाने के लिए शायद फिर से सीबीआई की धूल लगी फाइलों की मदद लेनी पड़े।

(राहुल सिंह। युवा आलोचक, कहानीकार। हिंदी की कई साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित लेखन। इन दिनों एएस कॉलेज, देवघर में हिंदी पढ़ाते हैं। राहुल से alochakrahul@gmail.com पर संपर्क करें।)

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