लेखक अपना ग्‍लानिबोध सार्वजनिक करें

रायपुर साहित्‍य महोत्‍सव विवाद वाया जलेस: गतांक से आगे…

खरे साब का जो भी सौभाग्य रहा हो, यह हिंदी के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस भाषा में काम करने वाले संभवनाशाली विचारक भी चीजों को सफेद और स्याह में ही बांट कर देखने के सरलीकरण की गिरफ्त में हैं… और अपने सरलीकरण को लेकर इतने आश्वस्त भी!! यह बेहद चिंताजनक आत्मविश्वास है।

मैं काले और सफेद के बीच किसी भी दर्जे के धूसर को न देख पानेवाली इस विकल दृष्टि के आत्मविश्वास से अपनी शत-प्रतिशत असहमति प्रकट करता और इसकी निंदा करता हूं।

साथ ही, चूंकि मैं स्वयं ऐसी ही विकल दृष्टि का परिचय नहीं देना चाहता, इसलिए यह रेखांकित करना उचित होगा कि रायपुर महोत्सव का बहिष्कार करके उन्होंने जो विवेक दिखाया है, वह मुझ जैसे कई लोगों के लिए उन्हें सम्माननीय और अनुकरणीय भी बनाता है। वे अपनी जबान और अपने तेवर से खुद अपना दर्जा इस कदर गिराने पर क्यों उतारू हैं, समझ नहीं आता।

जो लोग रायपुर चले गये, उन्हें सीधा खल-पात्र की श्रेणी में डाल देने की उम्मीद जलेस से क्यों की जा रही है? यह काले और सफेद में बांट कर देखने वाला नजरिया है। उनमें कई लोग ऐसे हैं, जिनकी सेक्युलर प्रगतिशील साख को इस एक घटना से खत्म हुआ नहीं माना जा सकता। हमें थोड़ा, बहुत थोड़ा ही सही, यह भी जानने की कोशिश करनी चाहिए कि वहां उन्होंने कहा क्या। हां, उन्होंने जो कहा, उसे भी एक फासीवादी पार्टी और सरकार ‘असहमति का सम्मान’ के मुहावरे के साथ अपने हक में भुना सकती है, यह समझने की जरूरत है। इसीलिए जलेस का बयान ‘इस्तेमाल करने और इस्तेमाल हो जाने’ की द्वंद्वात्मक स्थिति के बारे में समझ बनाने की जरूरत पर बल देता है। अगर सफेद-स्याह वाला सरलीकृत नजरिया रखें, तो ऐसी कोई भी जरूरत गयी गतालखाते में! फिर तो रायपुर गया हुआ हर लेखक ‘बिके हुए’, ‘प्रतिक्रियावादी’, अतएव ‘खल’ की श्रेणी में ठहरेगा। उनसे आगे के लिए सतर्क दृष्टि रखने की उम्मीद या इस आयोजन को लेकर उनका कोई भी नुक्ता जानने की कोशिश क्या करना? विष्णु खरे जी जलेस से यही पोजीशन चाहते हैं।

♦ संजीव कुमार, उप-महासचिव, जलेस

जलेस महासचिव की टिप्‍पणी बिल्‍कुल सामयिक और संतुलित है, बल्कि मौजूदा हालात में यह हस्‍तक्षेप जरूरी भी था। इस टिप्‍पणी में कहीं कोई संशय या अतिरेकी स्‍वर नहीं है। आयोजनों में भाग लेना, न लेना लेखक की अपनी स्‍वतंत्रता है, लेकिन उससे जुड़े अहम पक्षों पर संगठन के दृष्टिकोण को सामने रखा ही जाना चाहिए था, जो इस तरह के आयोजनों से जुड़ी धुंध को साफ करने के लिए आवश्‍यक है। हम किसी के प्रति असम्‍मान या कटु भाषा का प्रयोग न करें। इतनी सदाशयता और शिष्‍टाचार लेखकों के बीच बना रहना चाहिए। विष्‍णु खरे जी का अपना चित्‍त और उनकी बयानगी की अपनी सीमाएं हैं, वे अपने बेबाकीपन में कब कितना अतिरेक बरत जाएं, कहना कठिन है, जो अंतत उन्‍हीं के लिए विचारणीय रह जाता है। संजीव की राय से मैं भी सहमत हूं।

♦ नंद भारद्वाज

विष्णु खरे के बयान में कड़वे शब्दों का जो इस्तेमाल है, उससे असहमत होते हुए भी मैं उनके रुख और रवैये से पूरी तरह सहमत हूं। मैं जलेस का सदस्य नहीं हूं, अब किसी भी संगठन का सदस्य नहीं हूं, पर एक लंबे समय तक जन संस्कृति मंच का सदस्य और पदाधिकारी रहा हूं। इस नाते यह कहना चाहता हूं कि जलेस का यह बयान एक ऐसी लेखकीय स्वतंत्रता की वकालत करता है, जो स्वैराचार की हिमायत करती है। छत्तीसगढ़ सरकार के आयोजन में भाग न लेने के बारे में वीरेंद्र यादव ने बहुत स्पष्ट शब्दों में लिखा है और उनकी टिप्पणी जनसत्ता में छप चुकी है। एक जन विरोधी सरकार के आयोजन में भाग ले कर हमारे लेखकों ने, खास तौर पर जो अपने को प्रगतिशील मूल्यों से जुड़ा कहते हैं, समूची लेखक बिरादरी और जन विरोधी कार्रवाइयों के खिलाफ व्यापक मोर्चेबंदी को जो आघात पहुंचाया है, वह साफ है। वैसे भी आज हिंदी के साहित्यिक जगत की हालत अच्छी नहीं है। सारी पुरानी प्रतिज्ञाएं ताक पर धर दी गयी हैं। ऐसे में रायपुर जाने वालों ने अक्षम्य काम किया है। जलेस अपनी जाने, वैसे भी जलेस, प्रलेस और जसम ने अपनी आब खो दी है। अब तो कहीं से आब-ए-बका-ए-दवाम ही की गुजारिश की जा सकती है, जो नयी जान फूंके।

♦ नीलाभ

जलेस का बयान जिन लोगों को अनुपयुक्त/अस्वीकार्य/निंदनीय लगा, उनका सम्मान करते हुए कुछ बातें:

1) बहस की सामान्य मल्ल्युद्धीय संरचना हमें इस बात के लिए मजबूर करती है – हालांकि इस मजबूरी से पार पाना असंभव नहीं है – कि अगले को दूसरी एक्सट्रीम पर धकेल दें। इससे तर्क-वितर्क आसान हो जाता है। जलेस के बयान को लेखकीय स्वतंत्रता की पैरोकारी के एक छोर पर धकेलने की जो कोशिश नीलाभ जी की बात में दिख रही है, वह उनकी अपनी सुविधा के लिए है। अगर आप ऐसा न करें, तो आपको अधिक जटिल स्थिति के साथ डील करना पड़ेगा। कौन पड़े इस झंझट में? पर मैं आपकी सुविधा के लिए यह धकेलाना कुबूल नहीं करूंगा।

2) जलेस का बयान महोत्सव में भागीदारी को स्पष्ट रूप से अनुचित बताता है, पर सेक्युलर जनवादी साख वाले लेखकों को संदेह का लाभ देने के पक्ष में है और आगे उनसे अधिक सतर्क दृष्टि की उम्मीद करता है। कोई मुझे बता दे कि विनोद कुमार शुक्ल और मैत्रेयी पुष्पा जैसे रचनाकारों को संदेह का लाभ क्यों न दिया जाए? कोई मुझे बता दे कि विनीत कुमार और जगदीश्वर चतुर्वेदी जिस तरह बड़े मीडिया से लेकर संघ-परिवार तक की बखिया उधेड़ते आये हैं, वह उनकी इस भागीदारी से कैसे अनकिया हो गया? हां, जलेस का बयान यह भी कहता है कि इनकी इसी साख को रमण सिंह की सरकार, या कोई भी जनविरोधी तंत्र अपने पक्ष में भुनाना चाहता है। आगे उनसे अधिक सावधानी और सतर्कता की उम्मीद इसीलिए है। ऐसे भी भागीदार हैं, जो इस गुजारिश या उम्मीद को ही हास्यास्पद मानेंगे और कहेंगे कि हर आयोजन ऐसे ही तंत्र की ओर से होता है, ‘क’ का बहिष्कार करें तो ‘ख’ का क्यों नहीं, लिहाजा हम तो हर मंच का इस्तेमाल करेंगे। चीजों को सापेक्षता में न देखने वाले ऐसे लोग हमारे संवाद के दायरे से ही बाहर हैं, यह बताने की जरूरत नहीं।

3) विष्णु खरे जी इस बयान को ‘राम और रावण की एक साथ जय बोलनेवाला’ बयान मानते हैं। उन्हें याद दिलाना जरूरी है कि उदाहरण और रूपक बहुत मासूम नहीं होते। वे आपका भेद भी खोलते हैं। राम और रावण का यह रूपक बताता है कि खरे जी एक ही (आधिकारिक) रामकथा से परिचित हैं। तमाम दूसरी कथाएं – वर्जंस नहीं, टेलिंग्स – जिनमें अलग-अलग तरह के राम और रावण हैं, उनके लिए वजूद में ही नहीं हैं। यह सत्य के बारे में एक खास तरह की जिद्दी समझ की ओर इशारा करता है, और यही समझ महोत्सव-भागीदारी का भी एक आधिकारिक वृत्तांत रच लेने के लिए उन्हें बाध्य करती है, जिसमें रायपुर गया हुआ हर लेखक सब कुछ जानते-समझते हुए एक अपराध में शामिल दिखता है। इस बात की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी जाती कि यह भागीदारी असावधानी का नतीजा भी हो सकती है, या इस बहसतलब समझ (खुशफहमी?) का नतीजा भी हो सकती है कि अपनी बात पूरे दमखम से कहने का मंच मिले तो छोड़ें क्यों, अपने मेजबान को ही खरी-खरी क्यों न सुना आएं?

4) नीलाभ जी! जो प्रतिज्ञाएं ताक पर रख दी गयी हैं, उनमें अगर सफेद-स्याह-वाद और स्यापा-वाद भी शामिल हैं, तो ताक पर रखा जाना अच्छा ही हुआ। मैं जानता हूं, आप तुक मिलाते हुए मुझ पर स्याद्वाद का आरोप लगाएंगे, पर मुझे लगता है कि यह यांत्रिकता बनाम द्वंद्वात्मकता की लड़ाई है। रायपुर प्रसंग में अपने सेक्युलर-जनवादी रुझान के साथियों की भर्त्सना यांत्रिक दृष्टि का नतीजा कही जाएगी, क्योंकि वह इन साथियों के अवदान को अनकिया बताती है और उनका पक्ष क्या था, शिरकत के पीछे उनका सोच क्या था, इसकी ओर से आंख-कान मूंद लेने पर बल देती है। साथ ही, ‘इस्तेमाल करने और इस्तेमाल हो जाने’ की द्वंद्वात्मक स्थिति पर सोचने की जहमत नहीं उठाती। जब भागीदार कहते हैं कि उन्होंने अपने प्रतिरोधी स्वर के लिए मंच का इस्तेमाल किया, तो उनके इस नुक्ते में सत्य का कोई अंश मानने से सीधा इनकार कर देना आपके लिए मुमकिन होगा, द्वंद्वात्मक जटिलताओं को संबोधित करने के इच्छुक किसी व्यक्ति के लिए नहीं।

5) संगठनों को discredit करने का अभियान आज सांप्रदायिक ताकतों की सबसे बड़ी सेवा है। आलोचना करके, भिड़ंत करके, जैसे भी हो संगठनों को कारगर बनाएं, उन्हें सभ्य या असभ्य गालियां देकर हाशिये पर धकेलना और इस तरह दुश्मन को मजबूती देना रायपुर में भागीदारी करने जैसा ही काम ठहरा। जिस तरह उन भागीदारों से जलेस ने अधिक सतर्क दृष्टि का परिचय देने की उम्मीद जतायी, उसी तरह आपसे भी अधिक सतर्क दृष्टि का परिचय देने की उम्मीद की जानी चाहिए। अलबत्ता, जिस तरह उन भागीदारों को जलेस ने किसी ‘आधिकारिक’ रामकथा के खलनायक यानी रावण के रूप में नहीं देखा, उसी तरह आपको भी नहीं देखा जाना चाहिए।

6) अब कुछ हलके मूड में। खरे साब ने लिख भेजा है (reply to all नहीं किया):

तू इधर-उधर की न बात कर
ये बता कि धूसर कौन है?

पहले तो ‘तू’ पढ़कर लगा कि बड़े गुस्से में हैं, पर देखा कि शेर है, इसका मतलब मामला एकदम उलटा है। ‘तू’ के मानी बिलकुल बदल गये। बहरहाल, जवाब ये है:

ये इधर-उधर की न बात है
खरे ही कब-कब खरे रहे!

♦ संजीव कुमार, उप-महासचिव, जलेस

श्री संजीव को मैंने यह मिसरा कुछ बदल कर – ये बता कि धूसर कौन था – लिखा था :

तू इधर-उधर की न बात कर
ये बता कि कारवां क्यूं लुटा

मेरा यह सवाल मजाहिया नहीं, असली था कि रायपुर जानेवालों में से जलेस किसे ”धूसर” समझता है। लेकिन श्री संजीव मुझे लेकर तत्काल संदर्भहीनता के साथ व्यक्तिगत हो गये।

हालांकि यह भी सच है कि मामला Fifty Shades of Grey (“धूसर की पचास रंगतें”) जैसा-भी हो सकता है।

विष्णु खरे

यह सांप्रदायिक शक्तियों की जीत है कि प्रगतिशील जमात के तमाम लेखक और विचारक आपस में उलझ गये हैं। भाजपा सरकार ने पिछली सरकार की नीतियों को अपने ढंग से आगे बढ़ाते हुए देश की स्वाधीनता के सामने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के जरिये जो विकराल संकट उपस्थित कर दिया है, तब बहस के केंद्र में यह मुद्दा होना चाहिए। रचनाकारों से जिस सतर्कता की अपेक्षा जलेस के बयान में की गयी, उससे असहमति क्योंकर हो? हां, रायपुर साहित्य महोत्सव में शामिल होने वाले रचनाकारों से अनुरोध है कि वे अपने स्वाभाविक संकोच से मुक्त हों और अपना ग्लानि-बोध सार्वजनिक करें।

♦ बजरंग बिहारी

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *