हमारे महानगरों की आत्‍मकथा है #Ugly

♦ अनुज शुक्ला

नुराग कश्यप की ‘अगली’ महानगरीय विस्तार में उपजी मध्यवर्गीय परिवारों की अपनी विडंबना है। यह एक ऐसा सच है, जिसमें रिश्तों का बिखरना है, उससे उपजे नये मूल्यों की देन – एक नये तरह का प्रतिशोध और आत्म-उत्पीड़न है, बिल्कुल चुपचाप। इसका खामियाजा भुगतना पड़ा ‘कली’ नाम की एक बच्ची को। हमारे यहां नये बनते महानगर का यही सच है, विकास की आपाधापी में व्यस्त। पता नहीं महानगरों में ऐसे ही कितने परिवार और लोग बिखर रहे हैं।

फिल्म की कहानी कुछ यूं है – एक स्ट्रगलर एक्टर राहुल कपूर अपनी बेटी को घुमाने के लिए उसे पूर्व पत्नी के घर से बाहर लेकर जाता है। इस बीच वह एक स्क्रिप्ट सुनने के लिए कार में ही अपनी बेटी कली को छोड़कर दोस्त चैतन्य के घर चला जाता है और उसका इंतजार करने लगता है। जब उसका दोस्त वहां पहुंचता है, तो वह राहुल कपूर को बताता है कि कार में कली है ही नहीं। कली के गायब होने से शुरू हुई फिल्म में कली की खोज के दौरान राहुल, शालिनी, उसका वर्तमान पतिशौमिक बोस, चैतन्य, जाधव, सिद्धांत से जुड़ी तमाम सिलसिलेवार घटनाएं हैं। महानगर के इन सब चरित्रों के अपने रंग हैं, जो एक-दूजे से दूर होकर भी गुत्थम-गुत्था हैं। फिल्म के बीच-बीच में फ्लैशबैक भी है। यह फिल्म में नजर आ रहे कई चरित्रों की जटिलता को समझाने में मदद करते हुए कहानी को अधिक से अधिक विस्‍तार देता है। यह पूरी तरह चुस्त फिल्म है, जो गंभीरता के बावजूद अंत तक दिलचस्पी बनाये रखती है। अंत में गायब कली मिलती जरूर है, लेकिन कुछ ऐसे कि उसके मिलने का अब कोई अर्थ ही नहीं बचता। बचता है तो अजीब तरह का सन्नाटा और खामोशी ही, जिसे इस फिल्म को देखते हुए ही समझा जा सकता है।

दरअसल अगली की कहानी एक ऐसे समाज की कहानी है, जहां कई तरह की शिकवा-शिकायतें हैं, बेवफाई है, बदला है। एक-दूसरे के प्रति केयरनेस और वफादारी भी है। लेकिन यह अलग तरह का है, बिल्कुल अपारंपरिक। यही बात इसे अपने समय से थोड़ा आगे लेकर जाती है। हमारी फिल्म इंडस्ट्री का स्वरूप जिस तरह का है, उसमें सिनेमा के माध्यम से ‘अगली’ जैसी कहानी को कहने का साहस बहुत कम ही लोग करते हैं। जैसा पहले बताया गया कि इस फिल्म का बजट बहुत मामूली (जो करीब 4.5 करोड़ रुपये) है, उसने अनुराग को यह आजादी दी कि वे टिकट खिड़की की परवाह किये बिना अपने मन की हमारे नये महानगरीय समाज की मौजूदा आपबीती कह सके।

बहरहाल, पूरी फिल्म देखने के बाद आप खुद से यह सवाल कर सकते हैं कि सही मायने में कली का अपराधी कौन है? कली का बाप राहुल या उसका सौतेला बाप शौमिक बोस, उसकी मां शालिनी या फिर बैलून बेचता फेरीवाला या हमारा सिस्टम (पुलिस)। वैसे किसी एक को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता, अगर इसके लिए किसी एक को जिम्मेदार माना जाता है, तो वह हमारे समय के सच (शायद जिससे प्रेरित होकर अनुराग ने इसे रचा) को नकारना भी हो सकता है। कह सकते हैं कि यहां अपराधी नये मूल्यों से उपजी विडंबनाएं हैं। किसी भी समय की जटिलता को फिल्माना बहुत मुश्किल काम है। इस लिहाज से देखें तो अनुराग ने अगली के जरिये कमाल का काम कर दिया है। वासेपुर की बात करें, तो अगली की तुलना में उसे फिल्माना ज्यादा आसान था। अगली में समाज की नयी जटिलताएं है, जिसे हू-ब-हू फिल्मा लिया है अनुराग ने। फिल्म में एक दो जगह सब बेहतरीन होने के बावजूद कुछ खटकता भी है। वह है कली के गायब हो जाने के बाद एफआईआर करवाने के दौरान का दृश्य। इसमें कोई शक नहीं कि यह दृश्य कमाल का है, बावजूद इसका कुछ लंबा हो जाना बाद में थोड़ा नाटकीय जैसा दिखने लगता है।

फिल्म के सभी कलाकारों का अभिनय बेहतरीन है। खासकर राहुल भट्ट और विनीत कुमार सिंह का। दोनों इस फिल्म में कमाल के अभिनय के लिए याद किये जाएंगे। हालांकि जीवंत अभिनय रोनित रॉय ने भी किया है, लेकिन उनका चरित्र कुछ यूं रच दिया गया मानो वह उनकी पहले की फिल्म ‘उड़ान’ का ही एक्सटेंशन हो। पता नहीं क्यों, लेकिन ऐसा लगता है कि उनके चरित्र में कुछ और रंग होने चाहिए थे। ऐसा होने पर फिल्म में और डेप्थ होती। हो सकता है यह रोनित के चरित्र को समझने में मेरी अपनी नासमझी भी हो लेकिन बहुत ज्यादा शेड नहीं होने से फिल्म में उनका चरित्र थोड़ा कन्फ्यूजन पैदा करता है। वैसे बहुत गहराई तेजस्विनी कोल्हापुरे के रोल में भी नहीं है, लेकिन जितना है, बेहतर ही किया उन्होंने। बाकी अन्य कलाकारों ने भी पूरी शिद्दत से अपने हिस्से के चरित्र को जिया है। इसके लिए उनकी तारीफ की जानी चाहिए। कुल मिलाकर अगर फिल्म से एक दो चीजों को निकाल दिया जाए, तो अगली एक जबर्दस्त फिल्म है, इसे सिर्फ अनुराग ही बना सकते हैं।

Anuj Shukla(अनुज शुक्‍ला। फिल्‍मों पर नियमित लेखन। महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा में पढ़ते हुए विभिन्‍न अखबारों, पत्रिकाओं, वेबसाइट्स के लिए स्वतंत्र लेखन। लोकमत महाराष्ट्र में शुरुआती पत्रकारिता के बाद फिलहाल भोपाल में दैनिक भास्कर डॉट कॉम में काम करते हैं। मीडिया मिथ्‍या नाम का निजी ब्‍लॉग। उनसे anuj4media@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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