हर मसले को काले-सफेद नजरिये से न देखें

रायपुर साहित्‍य महोत्‍सव विवाद वाया जलेस: गतांक [1, 2, 3] से आगे

रायपुर साहित्योत्सव से उपजे सवालों पर जनवादी लेखक संघ का आधिकारिक बयान मुझे संतुलित लगा, जिसमें उत्सव के स्वांग और छलावे की खबर लेते हुए, हिस्सेदारी करने वाले उन लेखकों से, जो प्रगतिशील-जनवादी पृष्ठभूमि के हैं, उम्मीद की गयी है कि ऐसे छलावे से खुद को बचा कर रखें।

यह नितांत सच है कि इधर के वर्षों में लेखक-संगठनों की भूमिका सीमित हुई है। लेखकों का एक बड़ा हिस्सा संगठित-प्रयासों से अलग-थलग खुद को स्वंतंत्र-चेता के रूप में देखता है। सांप्रदायिक शक्तियों से एकजुट हो मुकाबला करने की जरूरत वाले इस दौर में ऐसी स्थिति और कुछ वरिष्ठ साथियों की सर्वज्ञाता होने और किसी भी संगठन या लेखक को खारिज करने का वैध-अधिकारी होने की मुद्रा चिंताजनक है।

यह रुख कि काले-सफेद के खानों में ही तमाम मसलों को नहीं देखा जा सकता, उचित है।

♦ मनोज कुलकर्णी

रायपुर सम्मेलन प्रकरण को ले कर चल रहे ईमेल विवाद को मैं शांतभाव से पढ़ता रहा। इस विवाद से यह तो स्पष्ट होता ही है कि जलेस पिछले दस साल से सांप्रदायिक फासीवाद के विरुद्ध लेखकों की व्यापक एकता के लिए जो कोशिश कर रहा है, वह एकता कायम करना कितना कठिन काम है। सत्तर के दशक में इसी तरह कांग्रेस के तानाशाही कदमों के खिलाफ भी एक कोशिश की गयी थी, जिसकी सकारात्मक परिणति बांदा सम्मेलन में हुई थी, मगर कुछ दिनों बाद ही कांग्रेस समर्थक वाम धड़े ने वह एकता तोड़ दी और बाद में आपातकाल का समर्थन तक कर दिया, जिसकी वजह से लेखकों का बड़ा हिस्सा उससे अलग हो गया। बाद में नये सिरे से वे लेखक जलेस के रूप में संगठित हुए। जलेस ने इसी तरह की कोशिश इस दौर की तानाशाही ताकतों के खिलाफ लामबंद होने के लिए की, जिसकी परिणति इलाहाबाद के साझा सम्मेलन में इस बरस फरवरी में हुई, जिसमें अब तक के सारे सम्मेलनों से कहीं ज्यादा लेखकों की भागीदारी देखी गयी और इस सम्मेलन की घोषणा ने राजनीतिज्ञों को भी मशाल की तरह आसन्न संकट के बारे में चेताया, जो सांप्रदायिक फासीवाद के बढ़ते खतरे से निपटने के लिए व्यापक एकता की कार्यनीति बनाकर संघर्ष करने में असफल रहे। इस तरह विश्वसनीय विकल्प के अभाव में और उसके बिखरे बिखरे होने की वजह से मतदाताओं के 31 प्रतिशत वोट के आधार पर ही सांप्रदायिक फासीवाद केंद्र की सत्ता पर काबिज हो गया और यही हालत उन राज्यों में भी हो रही है, जहां व्यापक एकता कायम नहीं हो पा रही। झारखंड और कश्मीर इसके ताजा उदाहरण हैं।

लेखकों की व्यापक एकता में संकीर्णतावाद और शुचितावाद आज सबसे बड़ी बाधा है, जो कई लेखकों के ईमेल दर्शाते हैं, वीरेंद्र यादव का जनसत्ता वाला लेख भी नेक इरादों के होते हुए उसकी ही झलक देता है। सांप्रदायिक ताकतें कितनी खुश होंगी यह देखकर कि किस तरह लेखक आपस में ही जूते चला रहे हैं और आपस में ‘निंदा’, ‘भर्त्सना’ और न जाने क्या क्या करने में मशगूल हैं, जन का दुश्मन जैसे उनके निशाने पर न हो कर जलेस ही उनका मुख्य निशाना हो। जलेस की अपनी आधार नीति ‘जनवाद की रक्षा और विकास’ है, जनवाद के आधार मूल्य जन की ‘स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व’ हैं। जलेस एक संगठन के तौर पर अपने सदस्यों या आम लेखकों की नागरिक स्वतंत्रता पर चोट नहीं कर सकता, यह उनके निजी विवेक पर ही निर्भर करेगा कि वे कहां शिरकत करें या न करें, क्यों करें या क्यों न करें, अगर करें तो वहां क्या कहें या न कहें, यह उनकी अभिव्यक्ति की आजादी है। किसी तरह का रेजीमेंटेशन या moral policing जलेस की कार्यशैली का हिस्सा नहीं हो सकती जैसी कि कुछ शुचितादी लेखक शायद अपेक्षा करते होंगे। खुशी यह देखकर होती है कि हमारे सदस्यों में इस एकता के लिए संजीदगी दिखाई देती है, जबकि ऐसे लेखक जो किसी संगठन में नहीं हैं, निंदा, भर्त्सना में ही आत्मसुख ले सकते हैं। जलेस तो बकौल कबीर उन्हें भी ‘नियरे राखिए’ की कोशिश में ही लगा रहेगा, क्योंकि वह इस विविधता में ही एकता देखने के लिए प्रतिबद्ध है, और यह एकता आज के दौर में सबसे ज्यादा जरूरी है। मैं निजी तौर पर सभी लेखक साथियों को मुक्तिबोध की एक पंक्ति की ही याद दिला सकता हूं, ‘संक्रमणकाल है धैर्य धरो, ईमान न जाने दो…’

♦ चंचल चौहान

एक बात तो है कि जनवादी लेखक संघ ने लेखक की स्वतंत्रता का सम्मान करके वह काम किया है, जो आज तक किसी लेखक संगठन ने सोचा भी नहीं था। केवल प्रतिबद्धता से काम नहीं चलता, आज संगठनों को व्यावहारिक होने की जरूरत है। इसके अभाव में लेखक संगठनों का जो हाल हुआ है, वह हमारे सामने है। आखिर क्या कारण है कि ज्यादातर समकालीन लेखक किसी संगठन में नहीं हैं?

♦ प्रभात रंजन

जरा अपनी तोप का मुंह ‘उधर’ तो घुमाइए!

किसी भी लेखक संगठन को अपने लेखकों के साथ (गलती करने के बावजूद) संवाद क्यों नहीं करना चाहिए? जनवादी लेखक संघ क्या कोई सेना है, जिसमें रह कर अनुशासनहीनता करना अक्षम्य अपराध हो? कोई लेखक संगठन तभी बना रह सकता है, जब उसमें इतना आंतरिक लोकतंत्र हो कि उसका चेतावनी देकर छोड़ देना ही पर्याप्त हो। ऐसे समय में जब आप चौतरफा चुनौतियों से घिरे हों, लेखक संगठनों की भूमिका सीमित होती जा रही हो, अपने ही फोड़े पर नाखून मारने और उसे चाट-चाट कर घाव को गहरा कर लेने की फजूल कवायद से बचना चाहिए।

अगर आप रायपुर जाने वाले जनवादी और प्रगतिशील लेखकों के कृत्य को जन विरोधी कार्रवाइयों के खिलाफ व्यापक मोर्चेबंदी के लिए और समूची लेखक बिरादरी के लिए आघात पहुंचाने वाला मानते हैं, तो क्या इस बात में अवसरवादिता की गंध नहीं सूंघनी चाहिए कि हम उन लेखकों को बख्श दें जो घोषित जनवादी या प्रगतिशील तो नहीं हैं लेकिन लोकतंत्र में भरोसा रखने का दम भरते रहने के बावजूद राययुर कूच कर गये? आप अपनी आग उगलती तोप का मुंह उस तरफ क्यों नहीं करते?

रायपुर नहीं जाने का फैसला लेने वालों का मैं साफ तौर पर समर्थन और सम्मान करता हूं, लेकिन जलेस के बयान की धज्जियां उड़ाने, उसे तोड़-मरोड़ कर समझने और समझाने की कार्रवाई से किसका हित सधेगा? ऐसा करके हम किसकी चाल का शिकार हो रहे हैं?

♦ राकेश तिवारी

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *