साइबर स्‍पेस पर जनवादी लेखक गूंगे क्‍यों?

♦ जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

रायपुर साहित्य महोत्‍सव पर जनवादी लेखक संघ का बयान अनेक विलक्षण और संकीर्ण बातों की ओर ध्यान खींचता है। मसलन, बयान में लिखा गया है, छत्तीसगढ़ सरकार का यह आयोजन “लेखकों तथा जनवादी रुझान के बुद्धिजीवियों के बीच विभेद और बिखराव के अपने एजेंडे को पूरा करना चाहता है।” सवाल यह है यदि आपलोग जानते ही हैं कि वे क्या चाहते हैं, तो फिर आपस में लड़ क्यों रहे हैं? लेखकों में जानबूझ कर फूट कौन पैदा कर रहा है? स्वयं लेखक या भाजपा सरकार? वस्तुगत स्थिति यह है कि वहां जाने वाले किसी लेखक ने न जाने वाले लेखकों के खिलाफ कुछ नहीं लिखा और न बोला! साहित्यिक मान-मर्यादाओं और लोकतांत्रिक आचार-व्यवहार की अवहेलना उन लेखकों ने की, जो अपने को “वामरक्षक” कहते हैं। फूट के स्रोत ये “वामरक्षक” हैं! फूट डालने का काम वहीं से आरंभ हुआ। सार्वजनिक निंदा अभियान उन्होंने चलाया। असदजैदी-मंगलेशडबराल आदि ने तो अपमानजनक भाषा तक का इस्तेमाल किया। आश्चर्य की बात है इन “वामरक्षक” लेखकों के हमलावर और फूट डालने वाले बयानों की जलेस ने निंदा तक नहीं की! असभ्य आचरण वाले लेखकों की निंदा न करके जलेस किस तरह का संदेश देना चाहता है?सवाल उठता है कि असभ्य आचरण की रक्षा करना लेखक संघ की भूमिका में कब से आने लगा?

जलेस की एक अन्य महत्वपूर्ण खोज की ओर ध्यान दें, “कुछ जनवादी और वामपंथी लेखक अपने विवेक से उस साहित्योत्सव में शामिल होकर अपना स्वतंत्र और जनपक्षधर दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से व्यक्त कर पाये, इससे यह जाहिर नहीं होता कि उक्त आयोजन भाजपा-आरएसएस का राजनीतिक प्रपंच और स्वांग नहीं था।” जलेस के नेतागण जानते हैं हर सरकारी कार्यक्रम स्वांग ही होता है। उससे ज्यादा यदि वे सोचते हैं, तो गलतफहमी होगी! क्या यूपी सरकार के द्वारा 60 से ज्यादा लेखकों को दिया गया पुरस्कार स्वांग नहीं है? क्या अखिलेश सरकार के शासन में कम दंगे हुए हैं? क्या जलेस अपने अध्यक्ष और दूसरे लेखकों को पुरस्कार लेने से रोक पाया? क्या यूपी में कारपोरेट लूट और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की खुली लूट नहीं हो रही? सिर्फ समाजवादी पार्टी की सरकार होने मात्र से क्या यूपी सरकार की समस्त कारगुजारियां पुण्य में बदल जाती हैं? क्या इफको के द्वारा आयोजित कार्यक्रम में नामवर सिंह का जाना सही है? क्या इससे मोदी सरकार को अपनी इमेज चमकाने का मौका नहीं मिलेगा? केंद्रीय हिंदी संस्थान के मोदी सरकार आने के बाद दिये गये पुरस्कारों से मोदी सरकार की इमेज चमकेगी या नहीं? मैं पुनः ध्यान खींचना चाहता हूं कि इस तरह वर्गीकृत करके नहीं देखा जाना चाहिए। जलेस जिस तरह से पूरी समस्या को देख रहा है, वह साहित्य का संकीर्ण और तदर्थ नजरिया है। जलेस से सवाल है कि आदिवासियों के खिलाफ पुलिस और सैन्यबलों का सबसे ज्यादा दुरुपयोग किस दल ने किया है? बस्तर से लेकर उत्तर-पूर्व के राज्यों तक किसने सबसे ज्यादा हिंसाचार फैलाया है, कांग्रेस ने या भाजपा ने? बस्तर में माओ विरोधी ऑपरेशन की जड़ें कहां से पैदा हुई हैं? मनमोहन सिंह की केंद्र सरकार का क्या रुख रहा पहले? क्या मनमोहन सरकार का रुख आदिवासी हितैषी था? सारे तथ्य और आंकड़े जलेस के बयान के खिलाफ जाते हैं, इसके बावजूद जलेस सच्चाई देखने को तैयार नहीं है यह देखकर आश्चर्य होता है। मैं यहां वाम सरकारों का खासकर पश्चिम बंगाल सरकार का आदिवासियों के प्रति जो उपेक्षापूर्ण रुख रहा है, उसकी ओर ध्यान नहीं खींचना चाहता। जलेस का नजरिया संकीर्ण ही नहीं, गलत आधारों पर टिका है। उसमें एकांगिकता है।

कारपोरेट लूट के सभी बड़े मानक तो यूपीए सरकार ने बनाये, फिर क्या यह मान लिया जाए कि उन दिनों जो लेखक उस सरकार के द्वारा वित्तपोषित संस्थाओं के कार्यक्रमों में जाते थे, वे सही काम कर रहे थे? हर सरकारी संस्था संस्कृति-साहित्य का स्वांग करती है। यहां तक कि वाम सरकारें भी यह स्वांग करती रही हैं। फर्ज करो छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार न होती, किसी और दल की सरकार होती और सारी चीजें वही हो रही होतीं तो क्या सब कुछ जनतांत्रिक हो जाता? सरकार तो सरकार है और इस मामले में सांप्रदायिकता, कारपोरेट लूट, शोषण–उत्पीड़न आदि को यदि आधार बनाकर ही देखा जाएगा, तो मुश्किल होगी। कौन सी ऐसी सरकार है, जहां पर ये सब चीजें नहीं घट रहीं। सरकार सांप्रदायिक है तो क्या देश छोड़कर चले जाएं लेखक? नौकरी न करें? विपक्ष के सांसद संसद में न जाएं? मजदूर वर्ग मिलकर भारतीय मजदूर संघ के साथ आंदोलन न करे?

क्या संघ की फासिस्ट हरकतों को मजदूर संगठन सीटू आदि नहीं जानते? क्या वे बीएमएस के साथ मिलकर संघर्ष नहीं करते? वे क्यों साझा संघर्ष करते हैं? लेखकों से मजदूर संगठनों और संसद से भिन्न आचरण करने की मांग क्यों की जा रही है? जलेस का मानना है “भाजपा लेखकों में यह भ्रांति फैलाना चाहती है कि वह असहमतियों का सम्मान करती है। भाजपाई सरकार के इस छल पर लेखक गंभीरता से विचार करेंगे, ऐसी हम आशा करते हैं।” यह सच है, लेकिन जलेस और उससे जुड़े लेखक क्या कर रहे हैं? फेसबुक जैसे महान मीडियम पर लेखकों की क्या भूमिका है? जरा इन लेखकों की फेसबुक वॉल पर जाकर गौर करें तो सच्चाई सामने आ जाएगी!

भाजपा से वैचारिक जंग चंद बयानों और आकांक्षाओं के आधार पर नहीं लड़ी जा सकती। भाजपा के खिलाफ जंग के लिए लेखकों को अहर्निश लिखना होगा, कितने जनवादी-प्रगतिशील लेखक हैं जो भाजपा के साइबर हमलों के खिलाफ फेसबुक–ब्लॉग-ट्विटर आदि में लिख रहे हैं? जो कुछ लिख रहे हैं, वह क्या हस्तक्षेप के लिहाज से काफी है? किसने रोका है जनवादी लेखकों को लिखने से? वे चुप क्यों रहे, जब मोदी के साइबर हमले हो रहे थे? वे कौन से कारण हैं, जो जनवादी लेखकों को मुक्त साइबर प्रतिवाद से रोक रहे हैं? साइबर प्रतिवाद में पैसे नहीं खर्च होते, किसी की अनुमति की भी जरूरत नहीं है, सिर्फ लेखक के विवेक और निडर अभिव्यक्ति से ही काम चल सकता है। लेकिन जनवादी लेखक तो गूंगे लेखकों की तरह आचरण कर रहे हैं, इससे अप्रत्यक्ष तौर पर मजदूरों-किसानों और आम जनता का नुकसान हुआ है। जनवादियों के साइबर मंचों पर चुप रहने से मोदी-संघ को प्रच्छन्न मदद मिली है।

जलेस का मानना है “यह समय आयोजन में शिरकत करने वालों की भर्त्सना का नहीं, बल्कि उनके साथ सार्थक संवाद कायम करने का है।” जलेस फिर सारे मसले को गलत ढंग से देख रहा है। संवाद-विवाद उनसे कीजिए, जो हमले कर रहे हैं, जो लोग वहां गये उन्होंने सही माना इसीलिए वहां गये और यह उनका हक है और हम सभी को उनका सम्मान करना चाहिए। कौन किस आयोजन में जाएगा, यह फैसला लेखक का अपना निजी फैसला होगा। इस सम्मेलन में जो लोग गये, इनमें अधिकांश लेखकों का सांप्रदायिकता के खिलाफ लिखने का शानदार रिकॉर्ड रहा है। आदिवासियों-दलितों-स्त्रियों-बच्चों आदि पर लिखने में इन लेखकों की बड़ी भूमिका रही है। बल्कि मुश्किल यह है कि जो लेखक प्रतिवाद कर रहे हैं उनके प्रतिवादी रिकॉर्ड को जरा ध्यान देखें? मसलन असद जैदी-मंगलेश डबराल का फेसबुक पर मोदी के खिलाफ क्या रिकॉर्ड है, जरा इनकी फेसबुक वॉल पर जाकर देख लें जनवादी लेखक संघ के नेतागण। मजेदार बात है कि जो लेखक मोदी की हुंकार के सामने दुम दबाकर बैठे हैं, वे मोदी विरोधी होने का दावा कर रहे हैं। मैंने मोदी की हर नीति और हर बयान की रीयल टाइम में आलोचना लिखी, उसको ये दोनों लेखक गालियां दे रहे हैं और उन गालियों को हमारे मित्रगण ने अपनी वॉल से लंबे समय तक हटाया भी नहीं, क्या यही आदर्श लोकतांत्रिक समाज है, जिसे जलेस बनाना चाहता है? जलेस के नेताओं के इस बयान में जिस तरह की विचारधाराहीन लीपापोती की गयी है, उसकी कम से कम मुझे उम्मीद नहीं थी। यह लीपापोती जलेस को कहीं नहीं ले जाएगी, इससे संगठन की साख खराब हुई है।

हाल के वर्षों में हिंदी लेखकों में दादागिरी और भाषाई असभ्यता के प्रयोग बढ़े हैं। खासकर फेसबुक पर यह चीज आये दिन उन लेखकों के द्वारा हो रही है, जिनको साहित्य अकादमी पुरस्कार मिले हैं या जो इस पुरस्कार की आशा लगाये बैठे हैं। सारी दुनिया में कहीं पर भी लेखक गालियां नहीं बकते, लेकिन हिंदी में यह परंपरा है कि हिंदी लेखक अपमानजनक भाषा का पानी की तरह प्रयोग करते हैं। लेखकों में अपमानजनक भाषा का बढ़ता प्रयोग इस बात का संकेत है कि लेखक लंपट होता जा रहा है, उसमें असभ्यता पैर पसार रही है। समस्या यह है कि नयी परिस्थितियों में लेखक किस तरह व्यवहार करे? किस नजरिये से देखे? जलेस का सरकार और लेखक के अंतर्संबंध को देखने का कोई सुसंगत नजरिया नहीं रहा है, कम से कम अब तो इस पहलू पर दो-टूक ढंग से संगठन सोच ले। समस्या “इस्तेमाल करने और (खुद) इस्तेमाल हो जाने” की नहीं है, समस्या लोकतांत्रिक कम्युनिकेशन और लोकतांत्रिक आचरण की है। “इस्तेमाल करने” या “इस्तेमाल हो जाने” का नजरिया पुराने समाजवादी फ्रेमवर्क की देन है, यह नजरिया पूरी तरह अप्रासंगिक हो चुका है। लेखक को हमें समाजवादी फ्रेमवर्क में नहीं लोकतांत्रिक-साइबर फ्रेमवर्क में देखना होगा, लेखक के आचरणों की संविधान प्रदत्त अधिकारों की रोशनी में नयी व्याख्या तैयार करनी होगी। लेखक को हांकने या आदेश देने के मनोभाव से देखना बंद करना होगा। इस दौर में नये कम्युनिकेशन मीडियम आ गये हैं। अतः उन माध्यमों के परिप्रेक्ष्य में लेखक, राज्य और समाज के संबंधों को नये सिरे से परिभाषित करना होगा। जलेस अभी तक पुराने फ्रेमवर्क में सोच रहा है, यह उसके बयान में निहित है। पुराना नजरिया जलेस को कहीं नहीं ले जाएगा, इससे संगठन का लेखकों से अलगाव और बढ़ेगा। लेखक कोई इस्तेमाल होने की चीज नहीं है। लेखक तो कम्युनिकेशन का मीडियम है। ऐसा मीडियम है, जिसका मालिक वह स्वयं है।

Jagadishwar Chaturvedi(जगदीश्‍वर चतुर्वेदी। मथुरा में जन्‍म। कलकत्ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हिंदी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन। तकरीबन 30 कि‍ताबें प्रकाशि‍त। जेएनयू से हिंदी में एमए एमफि‍ल, पीएचडी। संपूर्णानंद संवि‍वि‍ से सि‍द्धांत ज्‍योति‍षाचार्य। फोन नं 09331762360 (मोबाइल) 033-23551602 (घर)। ई मेल jagadishwar_chaturvedi@yahoo.co.in, पता : ए 8, पी 1/7, सीआईटी स्‍कीम, 7 एम, कोलकाता 700054)

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