दुनिया का मैक्डोनाल्डीकरण गलत है

स्टैनफोर्ड के सालाना यात्रा संभाषण सत्र 2001 के विशिष्ट मेहमान के तौर पर बिल ब्राइसन अपने लेखन और यात्राओं के बारे में अपने ढाई हजार प्रशंसकों से बात करने के लिए लंदन पधारे थे। डगलस शुल्ज ने उनका इंटरव्‍यू लिया था। पेश है उस इंटरव्‍यू का पूरा ट्रांसक्रिप्‍शन [सौजन्‍य: अशोक पांडे, कबाड़खाना]।

सामाजिक अभाव के इंडैक्स में आदिवासी सबसे नीचे

जाहिर है, बात घिसी पिटी है कि हमारे मेहमानों का परिचय दिये जाने की जरूरत नहीं पड़ती, लेकिन आप में से जो भी तुरंत किसी और नक्षत्र से यहां पहुंच कर इस रात इस हॉल में आ पहुंचे हैं, उनकी जानकारी के लिए मैं पुष्टि कर सकता हूं कि हमारे वक्ता जनाब बिल ब्राइसन इस ग्रह के सबसे पसंदीदा यात्रावृत्त लेखक हैं।

यह न सिर्फ उनकी छह यात्रा-पुस्तकों की स्तब्धकारी बिक्री है, जिसने उन्हें यह सम्मान दिया है, तथ्य यह भी है कि उनकी किताबें इतनी सुगम्य, सचेतन और सबसे ऊपर आश्चर्यजनक रूप से मजाकिया हैं। यात्रावृत्तों में उनका वही स्थान है, जो पाकविद्या में डेलिया स्मिथ और बच्चों की किताबों में जेके राउलिंग का। दूसरे शब्दों में कहूं तो वे सर्वश्रेष्ठ हैं।

आप लोगों में जो चौकस हैं, उन्होंने गौर किया होगा कि हालांकि हमने इस का प्रचार एक यात्रा संभाषण के रूप में किया था, बिल किसी स्क्रीन के सामने तीखी नोंक वाली छड़ी लिये नहीं खड़े हैं। इसके बजाय हमारी योजना यह है कि बिल और मैं करीब एक घंटे आपस में गपशप करेंगे और यह दिखाने की कोशिश करेंगे कि दो हजार लोग हमारी बातें नहीं सुन रहे हैं, और बीच बीच में मैं बिल से अपनी किताबों से कुछ हिस्से पढ़कर सुनाने का निवेदन भी करूंगा ताकि सिर्फ मुझे ही न बोलना पड़े। और आखिर में हम कुछ समय आपके उन प्रश्नों के लिए रखेंगे, जिन्हें पूछने से मैं रह गया होऊं।

बिल ब्राइसन: …और उस के बाद मैं एक ड्रिंक के लिए जा रहा हूं!

जब मैंने बिल को इस प्लान के बारे में बताया था कि वे मेरे हर सवाल का जवाब हां या न में देंगे ताकि आपको मेरी मदद करनी पड़े, बिल ने मुझसे इसका वायदा किया था।

ठीक है बिल, मैं बिलकुल शुरू से शुरू करने जा रहा हूं, जैसे पार्किन्संस करती है, देस मोइनेस, आयोवा में आपके बचपन से। क्या आपका बचपन सुखी था?

➡ दरअसल हां। मेरा बचपन बेहद सुखी था। मेरे ख्याल से इसका बड़ा हिस्सा इस बात पर निर्भर था कि मैं पचास के दशक में बड़ा हुआ। अमेरिका में पचास के दशक में बड़ा होना एक तरह से स्वर्णयुग में जीने जैसा था। अभी एक दिन मैं सोच रह था कि उन दिनों में ऐसा क्या खास था, तो वह महान आशावाद का समय था। युद्ध बीत चुका था, अर्थव्यवस्था चढ़ाव पर थी। स्पष्टतः अमेरिका को उस तरह की बहाली नहीं करनी पड़ी, जैसे यूरोप के लोगों को करनी पड़ी, सो जब अमेरिका युद्ध से बाहर आया, तो उसकी स्थिति बहुत मजबूत थी और उसके सारे उद्योग तब भी सुरक्षित थे। बस हमने टैंक बनाने बंद कर दिये और टेलीविजन और फ्रिज बनाना चालू कर दिया। सो यह अमेरिका में एक महान विकास का दौर था।

लेकिन वह उस वक्त भी एक खासा सादगी भरा समय था। दो लेन वाले राजमार्गों का समय। और मेरे ख्याल से तब प्रवृत्तियां भी फर्क थीं। आयोवा, जहां मैं बड़ा हुआ, वहां लोग एक खास अंदाज में लातीफागोई करते थे, जैसा अब नहीं करते, और वे उसकी कद्र करते थे, जिस तरह मैं समझता हूं, ब्रिटिश लोग अब भी करते हैं। हाजिरजवाबी और ठठ्ठे और इस तरह की चीजें।

अब क्यों नहीं करते?

➡ मेरे ख्याल से लोग अब पैसा कमाने और जिंदगी में आगे बढ़ने में ही संतुष्ट हो चुके हैं, और अमेरिका में हाजिरजवाबी एक तरह की बाधा बन चुकी है। मिसाल के लिए मैं सचमुच सोचता हूं कि अगर मैं किसी ब्रिटिश कंपनी में काम कर रहा होता तो मेरे बारे में इस तरह बातें होतीं – “अरे डग, सही बंदा है यार। क्या चीज है। ऑफिस के बाद उसके साथ एक एक बीयर खींचने का मजा अलग है,” लेकिन अमेरिकी कंपनी में यह इस तरह होगा, “डग का पता नहीं। मुझे नहीं मालूम वो इस प्रोग्राम में हमारे साथ है भी या नहीं। और वो उतना सीरियस भी नहीं है।” और मुझे लगता है यह कितने शर्म की बात है।

जब मैं बच्चा था, खूब हंसी ठठ्ठा हुआ करता था। मेरे पिताजी शब्दों के साथ खेलने में माहिर थे।

तो अब हमें पता लग रहा है कि आप में वो बात आयी कहां से! क्या आपके बचपन में ऐसे कोई संकेत थे कि आप बड़े होकर यात्रावृत्त लेखक बनने वाले हैं? मिसाल के लिए क्या आप कसम खाकर कहेंगे कि अपनी हाईस्कूल ईयर बुक में आपने लिखा था कि आप दुनिया के सर्वप्रिय यात्रावृत्त लेखक बनने जा रहे हैं?

➡ नहीं, मैंने यात्रावृत्त लेखक बनने की कभी सोची ही नहीं और मैं अपने आपको अब भी यात्रावृत्त लेखक नहीं समझता।

मैं तो एक आदमी हूं जो किताबें लिखता है। मैंने अपने को हमेशा किराये में ली गयी एक कलम समझा है, जो इस बात पर खुश है कि लोग मुझे लिखने के एवज में पैसे देंगे। बस यह हुआ कि मैं यात्राओं की दिशा में निकल पड़ा। मैंने ‘द लॉस्ट कंटीनेंट’ लिखी, जो तकनीकी रूप से एक यात्रावृत्त है पर मैंने उसे एक संस्मरण की तरह अधिक देखा। वह अमेरिका में बड़े होने के बारे में थी। मैंने उसे कभी भी यात्रावृत्तों की शृंखला की शुरुआत के तौर पर नहीं देखा, लेकिन हुआ यह कि उस पर अच्छी बातें कही गयीं और प्रकाशकों ने मुझे उत्साहित किया कि मैं उसी धारा में चलता जाऊं और यात्रावृत्त लिखूं। शुरू में मैं और तरह की किताबें भी लिख रहा था, जैसे कि भाषा पर। वो हाशिये में चली गयीं लेकिन मुझे उम्मीद है मैं उन तक वापस लौटूंगा।

क्या आपको काफी पहले पता चल गया था कि आप लेखक बनने वाले हैं?

➡ मुझे पता था कि संभवतः मैं किसी न किसी तरह से शब्दों के साथ काम करने वाला हूं। अंग्रेजी इकलौती चीज थी, जिसमें मैं ठीकठाक था और हमारा पुश्तैनी अखबार हमारा पुश्तैनी धंधा था। मेरे माता-पिता दोनों स्थानीय अखबार के लिए काम करते थे। मेरा भाई जो मुझसे नौ साल बड़ा और इस लिहाज से मेरे जीवन में एक स्थानापन्न वयस्क था, भी स्थानीय अखबारों में काम करता था। सो रात को खाने की मेज पर यही बातें होती थीं और मुझे किसी और चीज का खयाल ही नहीं आया। तय था कि मैं कोई न्यूक्लियर साइंटिस्ट या जानवरों का डाक्टर नहीं बनने जा रहा था। मुझे अपने बिलकुल शुरुआती क्षणों से बस पता था कि मैं शब्दों के साथ काम करूंगा।

मेरा दूसरा सवाल यह है कि आपने देस मोइनेस छोड़ क्यों दिया? ‘द लॉस्ट कंटीनेंट’ की विख्यात शुरुआती पंक्तियों को उद्धृत करें तो –

जब आप देस मोइनेस के रहनेवाले होते हैं तो आप या तो इस तथ्य को बिना कोई सवाल किये स्वीकार कर लेते हैं और बॉबी नाम की किसी लड़की के साथ शादी कर के फायरस्टोन फैक्ट्री में नौकरी पाकर हमेशा हमेशा के लिए वहीं रहें या आप अपना लड़कपन लंबे समय तक इस बात का रोना रोते हुए गुजारें कि यह क्या कूड़ा जगह है और आप इस जगह को छोड़ कर जाने तक का इंतजार नहीं कर सकते और तब आप बॉबी नाम की किसी लड़की के साथ शादी कर के फायरस्टोन फैक्ट्री में नौकरी पाकर हमेशा हमेशा के लिए वहीं रहें।

उस नियति से आप कैसे बच सके?

➡ मैं, बस ऐसे ही चला आया। और यह वाकई अजीब था क्योंकि मेरे ख्याल से उस समय हाईस्कूल में सारे ही लोग कहा करते थे “हे भगवान, मैं ग्रेजुएट होकर यहां से बाहर जाने का इंतजार नहीं कर सकता।” और जब ऐसा हो गया हो, मैं निकल पड़ा और मैंने यह तक सोचा कि हर कोई मेरे साथ आ रहा है मगर सारे वहीं रहे और सब ने फायरस्टोन फैक्ट्री में नौकरी पा ली।

मैं बाहर निकलने का इंतजार नहीं कर सकता था, क्योंकि देस मोइनेस इस कदर हैबतनाक था, लेकिन मुझे हमेशा यह सघन होश रहता था कि मैं बड़ा हो रहा हूं और असल संसार कहीं और है। अपने बचपन के शुरुआती दिनों से ही मैं ‘नेशनल जियोग्राफिक’ की तस्वीरें देखकर बहुत प्रभावित होता था। हर जगह इतनी अच्छी और इतनी दिलचस्प और भरपूर और सुंदर दिखती थी और ऐसा लगता था कि लोग काफी रोमांचक जीवन जी रहे हैं और मैं भी बाहर निकल कर वैसा थोड़ा कुछ करना चाहता था। सो जैसे ही मुझे मौका मिला, मैं निकल आया और संयोगवश यहां पहुंच गया। ब्रिटेन में।

आपने यहां ब्रिटेन में पत्रकारिता का काम किया और तब आपके जीवन में वह महत्वपूर्ण क्षण आया था, जब आप नौकरी छोड़कर अपने बच्चों के साथ उत्तरी यॉर्कशायर जा बसे थे और वह भी उन तीन हजार पाउंड्स की हिम्मत पर, जो आपको एक किताब लिखने के लिए मिलने वाले थे, और उसके बाद आप अपने बच्चों की परवरिश के अलावा ‘द लॉस्ट कंटीनेंट’ लिखने को यात्रा पर निकलने वाले थे। यह सुनना ही डरावना लगता है?

➡ मेरे लिए भी वह डरावना ही था और इसका पूरा श्रेय मेरी पत्नी को जाता है कि मैं वैसा कर सका। हुआ ये कि मैं फ्लीट स्ट्रीट में काम कर रहा था और अखबारों में उपसंपादक के तौर पर मेरा करियर खासा सुखद था। एक बार छुट्टियों में हम यॉर्कशायर गये हुए थे और मेरे ख्याल से मैं रोज के काम पर आने-जाने के क्रम से सामान्य से कहीं ज्यादा उकताया हुआ था। रोज गाड़ी लेकर लंदन में प्रवेश करने और वहां से बाहर निकलने से मैं ऊब चुका था और मैं लिखना भी चाहता था। यह मेरी हमेशा से ख्वाहिश रही थी कि मैं लिख कर अपना पेट पालूं। यॉर्कशायर से वापस आते समय मैं कुछ ज्यादा ही झींकता रहा होऊंगा क्योंकि वापस काम पर जाने के बाद एक दिन मेरी पत्नी ने मुझे फोन किया, जो वह आम तौर पर नहीं करती और बोली, “मैं तुम्हें यह बताना चाहती हूं कि मैंने मकान को बिक्री के लिए बाजार में लगा दिया है।” और मैंने कहा, “तुम ने क्या …?” तो वह बोली “और बड़ी बात यह है कि कुछ लोग कल उसे देखने आ रहे हैं।” तो उन लोगों ने अगले दिन आकर मुंहमांगी कीमत अदा की और मकान खरीद लिया, तो एक तरह से मुझे जबरन ऐसा करने को धकेला गया। मैं भयाक्रांत था क्योंकि वयस्क होने के बाद से कभी भी मैं बगैर तनख्वाह के नहीं रहा था।

आपकी किताब का विचार वापस अमेरिका जाकर वहां की छोटी छोटी जगहों की यात्रा करने का था और नतीजे में जो सामने आया वह ‘द लॉस्ट कंटीनेंट’ था। आपके यात्रा लेखन में बार बार आने वाली इस चीज ने मुझे बहुत मुग्ध किया है कि आप एक साथ आउटसाइडर भी हो जाते दीखते हैं और इनसाइडर भी। इस मामले में आप एक अमेरिकी थे, जो वापस जाकर अमेरिका के बारे में लिखने जा रहा था। जब आप अपने घर के बारे में लिख रहे थे, तब क्या आपको किसी आउटसाइडर जैसा महसूस हुआ था?

➡ मेरे ख्याल से मुझे एक हद तक हमेशा ऐसा लगता रहा। बाकी और लोगों से कहीं ज्यादा मैं असल में आयोवा से बाहर निकल कर कहीं और बस जाना चाहता था। मुझे बस यह लगता था कि मैं दूसरों की तरह उसके भीतर ठीक से फिट नहीं हो पाता था। तब मैं यहां आया और मैंने पाया कि एक विदेशी के रूप में ब्रिटेन में रहना कितना आह्लादकारी होता है। यह एक बेहतरीन स्थिति होती है। जब सब कुछ ठीक ठाक चल रहा हो तो आप आगे बढ़कर समारोहों वगैरह में हिस्सेदारी कर सकते हैं और हर चीज बहुत अच्छी होती है। और जब सब कुछ ठीक न चल रहा हो, जो यहां के मामले में पूरी तरह एक परिकल्पित स्थिति होती है, जैसे कि मान लीजिए आपकी राष्ट्रीय फुटबाल टीम जर्मनी से हार गयी तो आप पीछे खड़े रहते हुए कह सकते हैं कि क्या शर्म की बात है।

तो जब आप ब्रिटेन में बीस साल रहने के बाद ‘नोट्स फ्रॉम अ स्मॉल आइलैंड’ लिखने जा रहे थे क्या ब्रिटेन में तब भी आप अपने को एक आउटसाइडर महसूस करते थे?

➡ मैं यहां हमेशा बहुत सुकून से रहा हूं। यहां आकर मुझे बहुत जल्दी ही घर जैसा लगने लगा था और मैं यहां वाकई बस गया और खुश था। विदेशी होना मेरी खुसूसियत थी। मैं एक अमेरिकी हूं। मैं हमेशा था भी और यही मेरा पहचान चिन्ह था और एक तरह से अच्छा था। मैंने उसका बड़ा लुत्फ उठाया। इस तरह आप कुछ अलग और खास बन जाते हैं। मेरे लिए यह समस्या तब बनी, जब मैं वापस अमेरिका गया और मेरे पास अचानक यह विशिष्टता नहीं रही थी। वहां जो मैं था, एक अमेरिकी था जिसकी आवाज मजेदार सी थी और लोगों को सही सही पता ही नहीं रहता था कि वे मेरे बारे में किस तरह सोचा करें।

(इसके बाद बिल ‘नोट्स फ्रॉम अ स्मॉल आइलैंड’ से एक अंश पढ़कर सुनते हैं जिसे संभवतः कोई आउटसाइडर ही समझ सकता है।)

‘नोट्स फ्रॉम अ स्मॉल आइलैंड’ के बाद आप वापस अमेरिका चले गये और मैं जानता हूं कि ऐसा करना आपके लिए कोई आसान सांस्कृतिक फैसला नहीं रहा था। सच यह है कि आपने एक दफा कहा था कि आप जीवन में तीन काम नहीं कर सकते – पहला, आप टेलीफोन कंपनी को हरा नहीं सकते, दूसरा आप किसी वेटर की निगाह में तब तक नहीं आ सकते जब तक कि वह आपको देखने को तैयार न हो और तीसरा यह कि आप कभी घर वापस नहीं जा सकते। तो क्या आप वापस घर जा पाये?

➡ बहुत मुश्किल था। मेरी उम्मीदों से कहीं ज्यादा मुश्किल। मैंने सोचा था कि मैं बस वहां जा रहा हूं, जो मेरे लिए बहुत परिचित था, लेकिन दिक्कतें तमाम तरह की थीं। पहली यह कि मैं काफी लंबे समय से बाहर रह रहा था, और मैं अपनी कई आदतों और सोचने के तरीकों में ‘अंगरेज’ बन चुका था। सो यह एक बड़ी समस्या थी। और अमेरिका भी बहुत बदल गया था। और आखिरी यह कि मैं वयस्क होने के बाद अमेरिका में रहा ही नहीं था; मैं हमेशा किसी न किसी का बच्चा रहा था। सो वे सारी चीजें जो आप बड़े होने पर ही करते हैं – पेंशन लेना, चीजें गिरवी रखना वगैरह, वे सब मैंने ब्रिटेन में की थीं। अमेरिका में मेरे पिताजी ने यह सब किया था। सो मैं अपने ही देश में एक तरह से असहाय था। मुझे किसी हार्डवेयर स्टोर में सामान तक मांगना नहीं आता था। मुझे चीजों के नाम याद ही नहीं रह गये थे। मेरे वार्तालाप अक्षरशः इस तरह के हुआ करते थे – “मुझे थोड़ी सी वो अजीब सी चीज चाहिए जिनसे दीवारों के छेड़ भरे जाते हैं।” मेरी पत्नी के देश के लोग उसे ‘पौलीफीलिया’ कहते हैं, वहां वे उसे ‘स्पेकल’ कहते थे। बचपन से ही इतनी अंतरंगता से परिचित ऐसी जगह पर अलग-थलग पड़ जाना बेहद अटपटा था।

मुझे इस बात की भी आदत पड़ गयी थी कि यहां ब्रिटेन में आप बात बात पर लतीफे गढ़ सकते हैं पर अमेरिका में ऐसा करना बहुत खतरनाक होता। इस बारे में मैंने अपनी एक किताब में लिखा है। एक बार मैं बोस्टन में कस्टम और इमीग्रेशन से गुजर रहा था तो वहां पर मौजूद आदमी ने मुझ से पूछा “कोई फल या सब्जियां?” तो मैंने जवाब दिया “ठीक है, चार किलो आलू दे दीजिए।” उस वक्त मुझे ऐसा लगा था कि वह मुझे दबोच कर फर्श से चिपका देने वाला था।

आपने अक्सर अमेरिका में एक अलग तरह के सेंस ऑफ आइरनी की बात की है। मिसाल के लिए मुझे आपके उस पड़ोसी का वो किस्सा बहुत पसंद आया था जो अपने बगीचे में एक पेड़ काट रहा था और उसे अपनी कार की छत पर लाद रहा था…

➡ हां, एक तूफान में उसके बगीचे में एक पेड़ गिर गया था और एक दिन घर के बाहर आकर मैंने देखा कि वह पेड़ को छोटे हिस्सों में काट कर उसे निबटाने की नीयत से अपनी कार की छत पर लाद रहा था। पेड़ खासा झाड़ीदार था और कार के अगल बगल झूल रहा था। मैंने बिना सोचे जल्दीबाजी में कह दिया – ‘अच्छा तो आपकार को छिपाकर ले जा रहे हैं” और उसने मुझे देख कर कहा, “नहीं, नहीं। एक रात तूफान में यह पेड़ गिर गया था।” सो यह ऐसे ही चलता रहा। ऐसी घटनाएं होती रहीं। मैं पाता था कि मैं उन सज्जन के साथ खूब लतीफेबाजी कर रहा हूं। एक दफा मुझे एक हवाई यात्रा का दु:स्वप्न सरीखा अनुभव हुआ – फ्लाईट छूट गयी वगैरह वगैरह, तो उन साहब ने मुझ से पूछा “आप किस कंपनी के साथ यात्रा कर रहे थे?” तो मैंने जवाब दिया “पता नहीं सारी ही कंपनी अजनबी थी।” इस बात से उसे बहुत असुविधा हुई।

आपको अमेरिका वापस गये हुए पांच साल हो चुके हैं। ब्रिटेन के बारे में आपके आउटसाइडर का नजरिया अब क्या है? क्या आप संपर्क में रहते हैं?

➡ मैं हर साल छह या सात बार वापस आता हूं। जितना भी परिस्थियां अनुमति दें। अब लंदन में हमारे पास एक फ्लैट है, सो हम एक परिवार के तौर पर आया करते हैं और मैं संपर्क बनाये रखता हूं। मैं अब भी टेलीफोन पर बहुत सारे लोगों के साथ बात करता हूं और घटनाओं के बारे में जानकारियां लेता रहता हूं। सो ब्रिटेन विदेश नहीं बना है।

क्या यह आपका स्‍थायी निर्णय है? उदाहरण के लिए यह बताइए कि अमेरिका के पास क्या है, जो ब्रिटेन आपको नहीं दे सकता?

➡ जो इकलौती चीज दिमाग में आती है, वो यह कि मैं बेसबाल का दीवाना हूं। मैं बोस्टन रेड सॉक्स के प्रति खासा समर्पित हूं। बेसबाल के बारे में बढ़िया चीज यह है कि यह तकरीबन आधे साल चलता रहता है। खेल तकरीबन रोज होता है और आपके दिमाग में यह बात धंसी रहती है कि अगर शाम को करने को कुछ नहीं है तो आप टेलीविजन पर बेसबाल का गेम देख सकते हैं। यह मुझे बहुत पसंद है।

आपके यात्रावृत्तों का एक विशिष्ट आनंद आपके सहयात्रियों के चित्रण से आता है। अपनी जवानी में आपने मिसाल के लिए कुख्यात काट्ज के साथ विदेश यात्रा की थी और उसके बारे में आपने लिखा था, “काट्ज के साथ विदेश यात्रा करने की सबसे बेहतरीन बात यह थी कि बाकी बचे अमेरिका को उसके साथ गर्मियां नहीं बितानी थीं।” और तब भी तीन साल पहले आप उसे अपने साथ एप्पलाकियन ट्रेल पर उस मूर्खतापूर्ण साहसिक अभियान ‘वॉक इन द वुड्स’ में ले गये। क्यों?

➡ क्योंकि मैं अकेले यात्रा करना नहीं चाहता था और वह इकलौता शख्स था जो मेरे साथ आ सकता था। सीधी सी बात है। मैं निकलने ही वाला था जब मुझे अहसास हुआ कि मैंने खुद को कहां अटका लिया है : मैं इस विराट यात्रा पर निकल रहा था और हफ्तों हफ्तों तक मैं निर्जन इलाके में रहने जा रहा था, मुझे सचमुच ख्याल आया कि मैं अकेलापन और एकांत नहीं चाहता था। मुझे इस बात का भान ही नहीं था कि रास्ते में मुझे कितने लोग मिलने वाले थे। असल में वह एक खासी सौहार्दपूर्ण यात्रा रही, क्योंकि और भी कितने ही लोग इस तरह की हाईकिंग पर निकलते हैं। पर तब मुझे पता नहीं था। सो मैं बेताबी से चाहता था कि कोई मेरे साथ चले। मैंने किया यह कि क्रिसमस के समय लिखे जाने वाले कार्डों में अलग से नोट लिख कर डाला कि कोई भी मेरे साथ इस यात्रा पर चलाना चाहे, तो उसका स्वागत है, चाहे वह यात्रा के एक हिस्से के लिए ही हो। मैंने वह नोट अपने हरेक दोस्त को लिखा और किसी का भी जवाब नहीं आया। फिर कई दिनों बाद काट्ज का फोन आया और उसने थोड़ा हिचकते हुए कहा कि अगर वह पूरी यात्रा भर साथ आना चाहे तो। मैं बहुत खुश हो गया। जरूरत से ज्यादा प्रसन्न। मुझे पता था काट्ज बहुत मशक्कत का काम होगा। मैं नहीं जानता था कितनी मशक्कत का, जब तक कि वह आ न गया। लेकिन मैं इस कदर कृतज्ञ था कि कोई तो मेरे साथ है। जैसा कि मैंने किताब में लिखा भी है, जब तक उसकी नाड़ी चल रही थी, उसकी संगत से मुझे कोई ऐतराज न था।

उस यात्रा के मेरे सर्वप्रिय लोगों में मैरी-एलेन है, जिससे आप यूं ही टकरा गये थे, अलबत्ता मैं नहीं समझता आपने उसे साथ आने को चुना था। क्या ऐसा था?

➡ मैरी-एलेन दरअसल हमारे साथ नत्थी हो ली थी और कई दिनों तक उसने हमें पागल बनाये रखा। उसका नाम मैरी-एलेन नहीं था, पर वह ठीक वैसी ही थी, जैसा किताब में दिखाया गया है।

वास्तविक व्यक्तियों के ये चित्रण कितने सच होते हैं?

➡ निर्भर करता है। अक्सर जीवन में जब आपको मैरी-एलेन जैसा उपहार-सरीखा पात्र मिलता है, आप बहुत सच्चे बने रह सकते हैं। बाकी मौकों पर मैं थोड़ा बढ़ा-चढ़ा कर लिखता हूं या लोगों के चरित्र के अलग अलग हिस्सों के बारे में लिखता हूं। उदाहरण के लिए काट्ज के साथ: मैं कसम खाकर कहता हूं कि काट्ज के साथ चलना ठीक वैसा ही था जैसा किताब में दिखाया गया है, सिवा इसके कि वास्तविक जीवन में उसके और भी पहलू हैं जिनके बारे में उतना ज्यादा मैंने नहीं लिखा। मेरा मतलब है कि उसका एक संवेदनशील हिस्सा भी है। लेकिन उसके साथ यात्रा में इस कदर मुश्किल संघर्ष करना और उसका हमेशा गुस्से में रहना और अपने बैकपैक से नफरत करना – सब कुछ वैसा ही था। मैंने इस सबको असल में किताब में नहीं लिखा क्योंकि उसे बयान कर सकना किसी भी सूरत में मुमकिन नहीं होता, लेकिन मैं कसम खा कर कहता हूं कि हम अलग अलग रफ्तार से चला करते थे और अक्सर जब मैं उस से काफी आगे पहुंच जाया करता था, तो उस के लिए रुक जाता और वह किस रफ्तार से मेरे नजदीक आ रहा है इसका अनुमान सुदूर गूंजती उसकी “फक, फक, फक” से लग जाता था।

यह तो वही हो सकता था। और मैरी-एलेन? क्या आपके पास वास्तविक मैरी-एलेन के बारे में बताने को कुछ खास है?

➡ यही वास्तविक मैरी-एलेन है। लोग मुझसे पूछते हैं “क्या उसने वाकई वो सारी बातें कही थीं?” और मेरा उत्तर होता है नहीं, ठीक ठीक वो ही नहीं। लेकिन अगर आप मुझ से पूछें कि उसके साथ चार दिन रहना कैसा था, तो आप मेरा यकीन कीजिए वह ऐसी ही थी।

आपकी सबसे हालिया यात्रा ऑस्ट्रेलिया की थी, जिसके बारे में आपने अपनी नयी किताब ‘डाउन अंडर’ में लिखा है (अमेरिका में इसे ‘इन अ सनबर्न्ट कंट्री’ शीर्षक से छापा गया है)। सबसे पहले वह कौन सी बात थी, जिसने आपको ऑस्ट्रेलिया जाने और उस बारे में लिखने की दिशा में आकर्षित किया?

➡ हम्म, मैंने ऑस्ट्रेलिया के बारे में ज्यादा कभी सोचा नहीं था। मेरे लिए ऑस्ट्रेलिया कभी भी दिलचस्प नहीं था। वह तो पार्श्व में घटी कोई चीज थी। ‘नेबर्स’ और ‘क्रोकोडाइल डंडी’ फिल्में और इस तरह की चीजें थीं, जो कभी मेरे जेहन में ठीक से दर्ज नहीं रह सकीं और जिन पर मैंने बहुत ध्यान भी नहीं दिया था। मैं वहां 1992 में गया चूंकि मुझे मेलबर्न रायटर्स फेस्टीवल के लिए बुलाया गया था, सो मैं वहां गया और करीब करीब वहां पहुंचते ही मुझे लगा कि यह एक दिलचस्प देश है, जिसके बारे में मैं जरा भी नहीं जानता। जैसा कि मैंने किताब में लिखा है, मुझे इस बात से हैरत हुई थी कि उनके एक प्रधानमंत्री हैरल्ड होल्ट के बारे में मुझे बिलकुल पता नहीं था, जो 1967 में गायब हो गया था। मुझे आपको संभवतः इस बारे में बताना चाहिए क्योंकि बहुत सारे औरों को भी यह बात पता नहीं होती। 1967 में हैरल्ड होल्ट प्रधानमंत्री थे और विक्टोरिया की एक बीच पर क्रिसमस से ठीक पहले टहल रहे थे, जब उन्हें अचानक तैरने की इच्छा हुई और वे पानी में कूद पड़े। सौ फीट तक पानी में तैरने के बाद वे लहरों के नीचे गायब हो गये – अनुमानतः उन्हें उन बनैले अधोप्रवाहों ने अपने भीतर चूस लिया था, जो ऑस्ट्रेलियाई समुद्रीतट के बड़े हिस्से की विशेषता हैं। जो भी हो, उनका शव कभी मिला ही नहीं। इस बारे में दो बातों ने मुझे चमत्कृत किया। पहली यह कि कोई देश इस तरह अपने प्रधानमंत्री को गंवा सकता है – यह मुझे बहुत खास बात लगी थी – और दूसरी यह कि इस बारे में कभी कुछ सुने होने की मुझे कोई स्मृति नहीं थी। 1967 में मैं सोलह साल का था। मुझे इस बारे में पता होना चाहिए था और तब मुझे अहसास हुआ कि ऑस्ट्रेलिया के बारे में बहुत सी दिलचस्प बातें मुझे पता नहीं थीं। मैंने जितना अधिक इस बाबत खोजा मेरी दिलचस्पी बढ़ती चली गयी। जिस बात ने ऑस्ट्रेलिया को मेरे लिए हैरल्ड होल्ट को लेकर बहुत प्रिय बनाया वह उनकी त्रासद मृत्यु नहीं बल्कि यह थी कि अपने गृहनगर मेलबर्न ने, उनके गायब होने के एक साल बाद फैसला किया कि उनकी स्मृति में कुछ किया जाना चाहिए। सो नगरपालिका के एक स्विमिंग पूल का नामकरण उनके नाम पर कर दिया गया। मैंने सोचा – मुल्क है तो मजेदार।

आपके भीतर अजीब तरह से हैरान कर देने वाली चीजों को लेकर एक खास तरह की स्ट्रीक है। आपमें और आपके लेखन के भीतर अमेरिका और ब्रिटेन के मिश्रण मैं वापस लौटा जाए तो आप ऑस्ट्रेलिया का वर्णन एक वैकल्पिक दक्षिणी कैलिफोर्निया के तौर पर करते हैं – ‘बेवॉच और क्रिकेट’। क्या आपने ऑस्ट्रेलिया में अमेरिका और ब्रिटेन की यह मिलावट देखी?

➡ हां, मेरा ख्याल है यह एक बड़ा कारण था कि ऑस्ट्रेलिया पहुंचते ही मैं इस कदर आराम महसूस करने लगा था। अब आप देखिए एक इंसान है यानी मैं जो आधी जिंदगी ब्रिटेन में काट चुका है और आधी अमेरिका में और वह एक ऐसे देश में जा रहा है जो इन दोनों के आधे आधे से बना हुआ है। कई मामलों में ऑस्ट्रेलिया मुझे अमेरिका सरीखा लगता है। चाक्षुष पहलू से सिडनी, एडीलेड और पर्थ सरीखे शहर यूरोपीय होने के बजाय उत्तर अमेरिकी ज्यादा हैं, क्योंकि वे बहुमंजिला इमारतों से अटे पड़े हैं और वहां सड़कों का ज्यामितीय जाल है। और ऑस्ट्रेलियाइयों का रवैया और जीवन को देखने की निगाह काफी अमेरिकन है। वे बहुत मिलनसार लोग होते हैं जिन्हें अजनबियों के साथ जरा भी असुविधा महसूस नहीं होती, और उनके भीतर एक खास तरह की डाइनैमिज्म और सब कुछ कर सकने वाला जज्बा होता है जो काफी कुछ अमेरिका की याद दिलाता है। लेकिन उनकी संस्कृति की बुनियाद बेहद, बेहद ब्रिटिश है। वे चाय पीते हैं, बायीं तरफ ड्राइव करते हैं और क्रिकेट खेलते हैं। उनका सेन्स ऑफ ह्यूमर काफी ब्रिटिश है और उनकी शिक्षा व्यवस्था वगैरह बाकी सब। सो यह सब एक वाकई दिलचस्प मिश्रण है।

वे ब्रिटिश जड़ें कितनी स्‍थायी हैं? मिसाल के लिए क्या आप यह जान सके कि लोगों देश को गणराज्य बनाने के लिए अच्छा समर्थन देते हैं?

➡ अफसोस, देश को गणराज्य बनाने के लिए अच्छा समर्थन तो खास अच्छा नहीं है। मेरा मानना है कि उनकी स्थिति खासी असुविधापूर्ण है, वे लंबे समय तक ब्रिटेन का उपनिवेश रहे थे और वे जैसे भी हैं, पिछले पचास सालों से एक अलग पहचान बनाने में लगे हैं और उसमें समय लगता है। ऐसा करना मुश्किल होता है, पर वे लोग धीरे धीरे वहां पहुंच रहे हैं। मेरा ख्याल है ओलिंपिक्स ने काफी मदद की। वह एक आखिरी कदम था, जिसे लिया ही जाना था ताकि एक मुक्त आत्मनिर्भर समाज के रूप में उनकी पहचान बने और उनके भीतर वह आत्मविश्वास आये।

ऑस्ट्रेलिया में बच गयी ब्रिटिश विशिष्टताओं में एक क्रिकेट है। ऑस्ट्रेलिया में रेडियो पर क्रिकेट कमेंट्री सुनने पर ‘डाउन अंडर’ में एक बढ़िया टुकड़ा है, जिसे हम बिल से पढ़कर सुनाने को कहेंगे।

(बिल किताब से पेज 110 से 113 तक पढ़कर सुनाते हैं।)

एक और चीज, जिसने आपको बांधा, वह भौतिक तौर पर अपने अलग थलग पड़े होने के कारण ऑस्ट्रेलियाई महाद्वीप की उल्लेखनीय जैव और वन्य विविधता है। आपने किताब में ऐसी ऐसी और इतनी सारी प्रजातियों को दर्ज किया है, जिन्हें इस ग्रह पर और कहीं नहीं पाया जाता।

➡ हां, और हर वक्त नयी नयी प्रजातियां खोजी जा रही हैं। वे जानते ही नहीं वहां और क्या क्या है। ऑस्ट्रेलिया के बारे में एक और शानदार बात यह है कि यह अब भी एक न खोजा गया मुल्क है। मुझे संख्या ठीक से याद नहीं लेकिन कोई एक लाख कीट पतंगों की प्रजातियां वहां ऐसी हैं जिनका किसी वैज्ञानिक ने न निरीक्षण किया है, न उन्हें कोई नाम दिया गया है, न उनका कोई कैटलोग तैयार हुआ है। यही बात वनस्पतियों के बारे में सच है। इस तरह की करीब पचास हजार प्रजातियां हैं। ऐसी ऐसी चीजें भी हैं, जो कैंसर का इलाज कर सकती हैं। संभावनाएं अविश्वसनीय हैं। कोई भी असल में नहीं जानता वहां क्या क्या है।

और वह एक ऐसा देश है, जिसके ढंग से नक्शे तक नहीं बनाये गये हैं।

➡ बमुश्किल। ऑस्ट्रेलिया के नक्शे वैसे तो बनाये जा चुके हैं, जैसे हवाई जहाज से लैंडस्केप के काफी नजदीक से गुजरते वक्त दीखते हैं पर वास्तविक जमीनी स्तर पर एक विशाल भूखंड के नक्शे अभी बनने बाकी हैं। आप एक ऐसी जगह के बारे में बात कर रहे हैं, जो संयुक्त राज्य अमेरिका महाद्वीप यानी निचले 48 राज्यों जितना बड़ा है और जिसकी आबादी न्यूयॉर्क जितनी है। उसका इतना सारा हिस्सा अभी खाली पड़ा है। आप ऑस्ट्रेलिया में ऐसी जगहों पर भी अपने को पा सकते हैं जहां आप सड़क किनारे खड़े होकर एक तरफ देखें तो संभवतः अगले फुटपाथ को देखने के‍ लिए आपको 1500 किलोमीटर आगे जाना पड़े। मुझे यह सब बहुत अचरजकारी लगता है।

मुझे ऑस्ट्रेलिया के तटीय इलाकों से काफी दूर के इलाकों के शुरुआती खोजियों के किस्से बहुत पसंद हैं। वो कहानी क्या थी अपना खुद का मूत्र पीने के बारे में? या किसी दूसरे का?

➡ नहीं, मेरा अपना नहीं!

होता यह था कि खोजी लोग ऑस्ट्रेलिया जाया करते थे और चूंकि उनमें से ज्यादातर ब्रिटेन और आयरलैंड जैसे मुलायम और समशीतोष्ण देशों से जाते थे, उन्हें कतई पता नहीं होता था कि वे जा कहां रहे हैं, न तो वहां के आकार के बारे में उन्हें बहुत मालूमात होते थे, न वहां के पर्यावरण की मुश्किलों के। उनके जीवन की किसी भी चीज ने उन्हें इसके लिए तैयार नहीं किया होता था। सो वे समूचे महाद्वीप को आरपार कर लेने के बड़े मंसूबों के साथ सफर शुरू करते थे, जो आज के मोटरगाड़ियों के जमाने में भी खासा बड़ा काम होता है। सो उन्नीसवीं शताब्दी में ऐसा करना बेहद मुश्किल होता था और निरपवाद रूप से उन सब का सामना ऐसी परिस्थितियों से होता था जब उनके पास पीने को पानी की एक बूंद तक नहीं होती थी और उन्हें अपना या अपने घोड़े का मूत्र पीने को विवश होना पड़ता था। ऐसा आम तौर पर उल्टा असर करने वाला होता है, क्योंकि मूत्र में उपस्थित लवण प्यास को और बढ़ा दिया करते थे। ऐसा मैंने पढ़ा है – कभी जांचकर नहीं देखा।

कुछ समय के लिए आपका एक साथी भी था – आपका दोस्त एलन – जो आपके साथ कुछ समय के लिए आया था और जिसे आप ऑस्ट्रेलिया में उसके साथ घट सकने वाली हैबतनाक बातों की कहानियां सुनाकर डराया करते थे। क्या आप एलन के साथ क्वींसलैंड वाला हिस्सा पढ़कर सुनाएंगे?

➡ उस हिस्से की पृष्ठभूमि समझाना चाहूंगा पहले। मैं क्वींसलैंड के उत्तरी विषुवतीय इलाके में हूं एक बीच पर टहलता हुआ और मेरे साथ मेरे ब्रिटिश दोस्त एलन शेर्विन हैं, जो कुछ दिन मेरे साथ घूमने के लिए पहुंचा है। तब तक मैं इस तथ्य से भली भांती परिचित हो चुका था कि सैद्धांतिक रूप से हालांकि जानवर बहुत खतरनाक होते हैं, वास्तविकता में वे नहीं होते, लेकिन एलन को यह मालूम नहीं था और यह सब उसके लिए नया था। और मैं स्वीकार करना चाहूंगा कि मैंने उसके इस अज्ञान का फायदा उठाया। आपको यह भी पता होना चाहिए कि वह क्वींसलैंड में बॉक्स जेलीफिश का सीजन था। बॉक्स जेलीफिश अंडे देने के लिए इन दिनों भीतरी तटों तक आया करती थीं और यह भी कि यह धरती पर सबसे जहरीली प्रजातियों में एक होती है।

(बिल इस हिस्से को पढ़ते हैं)

आपने ऑस्ट्रेलिया को एक भाग्यशाली देश कहा है, लेकिन जो एक हिस्सा इस तस्वीर में फिट नहीं बैठता, वह वहां के आदिवासियों का कष्ट है। आधुनिक समाज में इन आदिवासियों की स्थिति को लेकर आपने जो आंकड़े उद्धृत किये हैं, वे तबाहकुन हैं और ऐसा लगता है कि इसके लिए सतही उत्तर यही दिया जाता है कि बीसवीं सदी और आदिवासी आपस में मेल नहीं खाते। आपकी किताब में सबसे दुखी करने वाला हिस्सा वह है, जिसमें आप इन दो संसारों के बीच की खाई पाटने के लिए की जा रही सोशल इंजीनियरिंग का वर्णन करते हैं। क्या आप हमें बता सकेंगे कि वह प्रयोग क्या था और उन तथाकथित “चुरा ली गयी पीढ़ियों” का क्या हुआ?

➡ उसे ही “चुरा ली गयी पीढ़ियां” कहा जाता था और यह सारे ऑस्ट्रेलिया में सबको मालूम है और सभी को उस की वजह से बेहद ग्लानि महसूस होती है।

जैसा कि आप कह रहे हैं यह सोशल इंजीनियरिंग की एक प्रक्रिया थी, जिसे सदी के शुरू में लागू किया गया और हाल के समय तक यानी साठ के दशक तक चालू थी। आदिवासी बच्चों को उनके मां-बाप से अलग कर के – हालांकि इसके पीछे भलमनसाहत की भावना होती थी – सरकारी स्कूलों – एक तरह के सरकारी अनाथालयों में ले जाया जाता था – या शहरों में रह रहे शहरी यूरोपियनों को गोद दे दिया जाता था ताकि वे गरीबी और अज्ञान के चक्र से बाहर आ सकें। इस नीति को इन लोगों के मोक्ष की तरह देखा गया जो मूलतः जंगली थे, कि उन्हें उनकी गरीबी से बाहर लाकर एक बेहतर वातावरण में रखा जाए। लेकिन सच यह था कि इस वजह से परिवार तबाह हो रहे थे। परिवार टूटते जा रहे थे। एक माता-पिता के तौर पर आपको कैसा लगेगा अगर एक दिन आपके घर के बाहर आकर एक सरकारी वैन रुके और उसमें से लोग उतर कर आपसे कहें “माफ कीजिए, हम आपके चार बच्चों को ले जा रहे हैं। हम उन्हें आपसे दूर ले जा रहे हैं। इसमें आप कोई भी विरोध नहीं कर सकते। किसी बच्चे को जन्म देने वाला आदिवासी अपने बच्चे का कानूनी अभिभावक नहीं था – यह सरकार का काम था। सरकार के पास बच्चे को उठा ले जाने की कानूनी अनुमति थी। इस मामले की सुनवाई के लिए कोर्ट कचहरी जैसा भी कुछ नहीं था। सरकार अपने “बच्चों” की कस्टडी खुद ले सकती थी, जैसा कि उस समय का कानून कहता था। वे बच्चों को उठा ले जाते थे। आप कल्पना कीजिए इस से बच्चों पर क्या असर पड़ा होगा। आप कल्पना कीजिए इस से माता-पिताओं पर क्या असर पड़ा होगा। कुछ मामलों में यह कई सालों तक चलता रहा। कभी कभी एक ही परिवार के चार बच्चे देश के चार बिलकुल अलग-अलग हिस्सों में पहुंचा दिये जाते थे। तो आपके देश में छेद दिये गये परिवार थे। आपने हर तरह की समस्या जैसे अपने बच्चों से बिछड़ गये माता-पिताओं की आत्महत्या और अल्कोहोलिज्म के लिए जमीनी काम तो कर ही दिया था। और उन बच्चों के लिए नयी जगहों पर खुद को ढालने की समस्या? – किस कदर गहरे ट्रौमा से गुजरना पड़ता था उन्हें। कभी कभी तो वे चार और पांच की आयु में उठा लिये जाते थे।

क्या उन्हें उठाये जाने के बाद किसी तरह का आपसी संपर्क हो पाता था?

➡ नहीं, क्योंकि माना जाता था कि ऐसा करना एक कदम पीछे हटना होगा। इसे परोपकार की भावना से किया गया कार्य कहा जाता था। लेकिन जिस तरह से उसका कार्यान्वयन होता था, वह खौफनाक था। मुल्क उस बात की कीमत आज भी चुका रहा है क्योंकि इस सारे तमाशे ने आदिवासियों और सरकार के लिए उनकी भावनाओं के बीच बड़ी खाई बना दी थी। बहुत से परिवार तहस नहस हुए और अल्कोहोलिज्म का एक भयानक चक्र शुरू हो गया

तो वर्तमान एकीकरण नीति को लेकर आप क्या सोचते हैं?

➡ जाहिर है, अब वे जो कर रहे हैं उसमें विवेक का इस्तेमाल ज्यादा होता है। यह अब भी एक बड़ी समस्या है। सामाजिक अभाव के किसी भी इंडैक्स में आदिवासी हमेशा सबसे नीचे आते हैं। अगर आप गिरफ्तारियों, नशीली दवाओं, गरीबी, स्वास्थ्य, शिशु मृत्यु जैसी चीजों के आंकड़े देखें तो वे सबसे नीचे होते हैं। साफ है उन्हें बेहतर जीवन देने के लिए बहुत कुछ और किया जाना है। इस समस्या का सबसे बड़ा हिस्सा यह है कि उनमें से अधिकतर सुदूर इलाकों में रहते हैं। सो उनके पास शिक्षा और रोजगार के वैसे अवसर नहीं हैं जैसे उन्हें शहरों में रहते हुए मिलते। यह एक बहुत बड़ी समस्या है और कोई भी आज तक किसी ठोस समाधान के साथ आगे नहीं आया।

ओलिंपिक्स की बात करते हैं। आप सिडनी मॉर्निंग हैरल्ड और द टाइम्स के लिए रिपोर्टिंग करने ओलिंपिक्स में मौजूद थे। दरअसल मैंने आपका लिखा तलवारबाजी और टेबल टेनिस जैसे कम चर्चित खेलों पर लिखा हुआ एक टुकड़ा पढ़ा था। मुझे बताया गया है कि वहां कुछ लोग थे जो टेबल टेनिस में आपसे बेहतर थे?

➡ मैं उन सारे ‘अल्पसंख्यक’ खेलों को देखने गया लेकिन कोई भी मुझे भाया नहीं। जैसे तलवारबाजी – सिर्फ ‘क्लिक क्लिक क्लिक’ और हो गया। फिर वे आराम करते हैं। दोबारा गार्ड लिया और ‘क्लिक क्लिक क्लिक’ और फिर हो गया। आप बस सोचते रह जाते हैं “ये खेल है क्या चीज यार?” मुझे वह बेहद उबाऊ लगा और मैंने जूडो पर ध्यान लगाया। वह भी ऐसा ही था। अब ये दो हैं लगातार एक दूसरे के गिर्द चक्कर लगा रहे हैं, जैसे कि दूसरे के जाने बिना उसकी कमीज उतार देने की जुगत में लगे हुए हैं। मैंने सोचा – ‘ये है क्या? मेरी समझ में कुछ नहीं आया।” फिर मैं टेबल टेनिस पर गया जो मेरी समझ में आ गया क्योंकि मैं उसे खेल चुका था – ओलिंपिक के स्तर पर नहीं – पर मेरी समझ में आता था वह। मेरी समझ में आया कि ये लोग उस सब से कहीं आगे पहुंच चुके लोग हैं, जिसका मैं सपना देख सकता हूं। मुझे बड़ा खराब लग रहा था कि मैं तलवारबाजों की कला की तारीफ करने लायक न था। वे मेरी समझ में इस वजह से नहीं आते थे कि वे इस कदर शानदार थे, इस कदर फुर्तीले कि मैं देख ही नहीं पा रहा था कि वे कर क्या रहे थे।

तलवारबाजी को लोकप्रिय बनाने के लिए आपके पास कुछ विचार थे…

➡ हां, कुछ सुझाव थे। मुझे लगा कि आप सरप्राइज अटैक जैसे दांवों को प्रोत्साहित कर सकते थे। मुझे लगा कि ऐसा अच्छा रहेगा। मुझे यह विचार भी भाया कि एक खिलाड़ी पारंपरिक तलवार लिये हो और दूसरा बरछी। सबसे प्रिय मुझे यह विचार लगा कि दोनों ही की आंखों पर पट्टी बांध दी जाए और दोनों को थोड़ा गोल गोल घुमाकर अचानक एक दूसरे की तरफ धकेल दिया जाए। इस से खेल लंबा खिंचेगा …

खासी गंभीर खेल पत्रकारिता है जनाब! … खैर, ‘डाउन अंडर’ में आपके एक वाक्य ने मुझे हैरत में डाला था, जब आपने तनिक निराशा के साथ कहा था कि आज के समय में यात्रा का बड़ा हिस्सा चीजों को देख लेना होता है, जब तक कि वे बची हुई हैं। कौन सी चीज गायब हो रही है?

➡ स्पष्टतः दुनिया में आप जहां भी जाएं, हर जगह एक सी में बदल रही है, और यह मुझे हतोत्साहित करने वाला लगता है। अमेरिका के किसी भी शहर में अगर आपने कॉफी पीनी है, तो स्टारबक्स कप हर जगह मिलता है। दुनिया का मैक्डोनाल्डीकरण। और ऐसा हर जगह और और ज्यादा होता दीखता है। यह सिर्फ अमेरिकी फिनोमेना नहीं है – बॉडी शॉप और एनी संस्थाएं भी इस में सहयोग कर रही हैं, जैसा कि व्यावसायिक संसार के साथ होना ही होता है, अमेरिका पथप्रदर्शक है। यह भी हतोत्साहित करने वाला है। जब मैं एलिस स्प्रिंग्स पहुंचा, तो मुझे बहुत निराशा हुई थी। मैं डार्विन से हजार किलोमीटर गाड़ी चलाकर इस खाली रेगिस्तान में पहुंचा था। मैं होटल के कमरे में घुसा और जैसे ही मैंने परदे खोले सड़क के उस पर के-मार्ट दिख गया। मैं इतनी दूर के-मार्ट देखने नहीं आया था।

आपने एलिस स्प्रिंग्स को ऐसे समुदाय के तौर पर वर्णित किया है, जो एक जमाने में सुदूर होने की वजह से विख्यात था और अब वहां हजारों लोग सिर्फ यह देखने आते हैं कि अब वह कितना सुदूर नहीं रह गया है। यह आधुनिक यात्रा की एक विडम्बना है कि आप किसी खास जगह को ढूंढते हैं, जो इस वजह से भी खास है कि काफी दूर है और वहां पहुंचने के लिए काफी मशक्कत करनी होती है और यह कि आप भी खास होने जा रहे हैं क्योंकि आपने वहां पहुंचने के लिए मशक्कत की है और जब आप वहां पहुंचते हैं, आप पाते हैं कि वहां आप ही जैसी सोच वाले असंख्य लोग जमा हैं और यही नहीं वह जगह आपका इंतजार कर रही है। यह सब दरअसल आपके स्वागत के लिए तैयार किया गया होता है। जब आप एलिस स्प्रिंग्स जैसी जगह पहुंचते हैं जहां बाकी असंख्य लोग भी उसी वजह से पहुंचे हैं, तो क्या आपको निराशा होती है?

➡ माफ कीजिए, क्या मैं एक बात कह सकता हूं। क्या हम लोग एक ड्रिंक के लिए अभी जाएंगे या नहीं?

बस पांच मिनट! आप सवाल का जवाब दे दीजिए।

➡ मैं निराश हुआ था। इससे कोई बचाव भी नहीं था। मेरी उम्मीदें काफी ज्यादा थीं। एलिस स्प्रिंग्स टिम्बकटू किस्म की जगह है। बाहर से आने वाले ज्यादातर लोग इस बारे में जानते ही नहीं, सो आप अपने दिमाग में कुछ छवियों का निर्माण करने लगते हैं। मैंने सोचा था कि वह कोई धूलभरी गायों वाला शहर होगा जहां पोस्टों से घोड़े बंधे हुए होंगे वगैरह। वहां जाकर मैं पाता हूं कि वह बिलकुल आधुनिक नगर है जो मेलबर्न या ऐसे ही किसी महानगर से सटा हुआ उपनगर भी हो सकता था। इस लिहाज से मैं निराश हुआ था। पर असल में वह अच्छा था। एलिस स्प्रिंग्स में कुछ भी गलत नहीं। बस वह उतना एक्जोटिक नहीं था, जैसे मैंने सोच रखा था।

यह कह चुकने के बाद भी, यात्रा करने से हतोत्साहित होने के बजाय, ‘डाउन अंडर’ के आखिर में मुझे ऐसा लगा कि आप वापस वहां जाना चाहेंगे। कि अभी वहां बहुत कुछ है जिसे आपने देखना बाकी है। यह कहता हुआ मैं खोटेपन का प्रदर्शन कर रहा हूं पर क्या आप वाकई निराश हुए थे क्योंकि ‘डाउन अंडर’ खत्म करने के बाद मुझे ऑस्ट्रेलिया जाने की प्रेरणा मिलने लगी थी और मैं उन सब जगहों पर जाना चाहता था जिनके बारे में आपने बताया है। सो मैं तो बेशर्मी से हर किसी को ‘डाउन अंडर’ पढने की सिफारिश करूंगा क्योंकि यह श्रेष्ठतम कोटि का यात्रावृत्त है क्योंकि इसको पढ़कर आपका मनोरंजन होता है, आप बहुत कुछ सीखते हैं, और यह आपको यात्रा करने की प्रेरणा भी देता है।

फिलहाल मैं बिल को मुक्त करता हूं।

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *