ध्वनि प्रदूषण वाले धर्म पर हमला है #PK

♦ मनोज खरे

क उत्कृष्ट फिल्म “PK” में कोई तथ्यात्मक मुद्दा नहीं मिला, तो अब फिल्म में एक मुसलमान एक्टर होने को ही टारगेट बना कर सब पिल पड़े हैं। अरे महान आत्माओं, फिल्म हमेशा डायरेक्टर की कृति मानी जाती है, न कि किसी एक्टर की। यह राजकुमार हिरानी का शाहकार है न कि आमिर खान का।

कहा जा रहा है कि किसी दूसरे धर्म के बारे में ऐसी फिल्में क्यों नहीं बनायी जातीं। तो भाई यह देश हिंदू बहुल देश है। विसंगतियां सभी धर्मों में हैं, लेकिन बहुलता के कारण सबसे ज्यादा चर्चा भी हिंदुओं की विसंगतियों की ही होगी। यह स्वाभाविक है। पाकिस्तान मुस्लिम बहुल देश है। वहां बनी “बोल” या “खुदा के लिए” देख लें, फिर कहें कि अन्य धर्मों पर फिल्म नहीं बनतीं। “ओ माय गॉड” जिस कथानक पर बनी थी, उसी पर अंग्रेजी में आस्ट्रेलिया में ईसाई धर्म को लेकर “अ मैन हु स्यू द गॉड” बन चुकी थी।

यह भी आलोचना की जा रही है कि फिल्म में शंकर जी पर दूध चढ़ाने को बर्बादी बताया गया है। मजार पर चढ़ाये जाने वाली चादर भी क्या गरीब बच्चों के तन ढकने के काम नहीं आ सकती? बिलकुल वाजिब बात है। कपड़ा भी बर्बाद करना गलत है। लेकिन क्या शंकर जी पर चढ़ने वाला दूध तभी व्यर्थ माना जाएगा, जब साथ में मजार पर चढ़ने वाली चादर भी व्यर्थ मानी जाए। अरे भाई दोनों व्यर्थ हैं। साथ-साथ कहो तब भी व्यर्थ। अलग-अलग कहो तब भी।

समस्या यह है कि हम निंदा की निंदा करने के बजाय अपने गिरेबान में नहीं झांकते। क्या आज हिंदू धर्म “सुख संपत्ति घर आवे कष्ट मिटे तन का” के फार्मूले पर “काम बनाओ और संकट से बचो” की एजेंसी बन कर नहीं रह गया है, जिसकी अनेकानेक दुकानें गली-गली दिखाई देती हैं? क्या आज मनुष्य की आध्यात्मिक उन्नति में हिंदू धर्म की कोई भूमिका रह गयी है? “परहित सरस धरम नहीं भाई, परपीड़ा सम नहीं अधमाई” वाली धारणा कहां बिला गयी है? क्या हिंदू धर्म मौजूदा रूप में सर्वाधिक जल और ध्वनि प्रदूषण फैलाने वाला धर्म नहीं बन गया है?

अब आत्मावलोकन के बजाय यह मत कह दीजिएगा कि दूसरे धर्म भी तो ऐसे ही हैं या किसी दूसरे धर्म के बारे में ऐसा क्यों नहीं कहते!

manoj khare(मनोज खरे। रीवा इंजीनियरिंग कॉलेज से पढ़ने के बाद छत्तीसगढ़ स्‍टेट पावर डिस्‍ट्रीब्‍यूशन कंपनी लिमिटेड में सुपरिटेंडिंग इंजीनियर। फेसबुक पर जनमुद्दों को लेकर सक्रिय भागीदारी। फिलहाल रायपुर में रहते हैं।)

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