चोखे-चोखे बाड़े नयना कोर रे बटोहिया

♦ अनिमेष कुमार वर्मा

काल्हु रात के हम इंटरनेट पे आखर पर आ फेसबुक पे लोग के एक से बढ़के एक पोस्ट पढ़त रहनी। केतना चीजु नया जाने के, सुने के मिलल। हमरा याद नइखे की हम कब इ कुल पढ़त पढ़त सुत गईनी आ अनुगते कुछ आवाज से हमार नींद खुलल। दोसरका कमरा में शायद रेडियो अपने आप बाजे लागल रहे। हो सकेला की रात के हमरे से खुलल छूट गइल होखी एहिसे आंखि मलत हम दूसरका कमरा में आईनी त नींद आ सुस्ती सब गायब हो गईल। भुइंया दरी पे एगो बुजुर्ग आदमी बइठल रहलें जिनकर पीठ हमरा ओर रहल, आ उहां के हीं आवाज़ रहल। हमरा डरो लागत रहे की घर में केहु कइसे ढुक गईल आ गायकी सुन के अचंभि तो रहनी। अचानक उहां के हमरा ओर मुड़नी आ कहनी की आवs बबुआ बईठs … हम बईठ गईनी।

बबुआ घबड़ा जन… हम बूढ़ पुरनिया आदमी तहरा के लुटे त ना आएम नू। हमरा के लोग भिखारी ठाकुर के नाम से जानत रहे.. पता न तू सुनले होखबs की ना। एह आवाज़ में दरद रहल। हम कहनी,भिखारी ठाकुर के के नइखे जानत, आ हम आपन जानकारी से उहां के बतवे लगनी। भोजपुरी के शेक्स्पीयर कहल जाला उहां के, जे नाटक, कविता आ गीत के रूप में माटी के महक आ समाज के मय दसा के देखावले बानी। समाज के कुरीति से लेके, बेटी के बिदाई, बिधवा बिलाप, शृंगार रस, छूआ-छूत से लेके हर मय मुद्दा के समेटले रहनीं। दू मिनट बाद हम ई क़हत ओराइनी की उहां के 30-40 बरिस पहिले हीं स्वर्ग सिधार गईल रहनी।

उहां के कहनी – बात त ठीक बा तहार, बाक़िर हमहीं हईं भिखारी ठाकुर। ढेर दिन से सोचत रहनी की देख के आवल जाओ की अपना घर जवार के का हाल बा। तहरा इहां से आवे के पहिले हम ढेर लोग से भेंट कर के आईल बानी। बदलल जमाना के गीत संगीत सुने खाति हम सारण आ ओकर आस पास के मय गांव जंवार में घूम के देखनी हs। जमाना सांचहूं बड़ी बदल गईल बा।

राम जाने कइसन गीत लोगवा जे गावsता
छव गज के सारी छोड़s अंचरो न भावsता

उहां के क़हत गईनी- ई नया ज़माना के गीत आजकल एही तरे काहे बनता हो? हम गांवे जाके लईकन से बतकही करत रहनी आ कहनी की कवनो गीत सुनावs सन त… ओकरा में से पांच बारिस के लईका.. अईसन गाना गईलस की हमारा बस एतने बुझाइल की उ भोजपुरी में कुछ त कहताs आ बाउरे कहताs … ओकरो ले बेसी की केहु से हम भोजपुरी में रास्ता पूछत रहीं त ढेर जाना हिन्दीए में जवाब देत रहल लोग..हम जबले रहनी तबले अईसन माहौल ना रहल ह.. अबकी मय गाना में चोली, कमरिया निहर शब्दन के आगे त कुछ हइए नइखे ए बबुआ.. हमनी के समय में श्रृंगार रस केतना सोभर लगा रहत रहे –

हमरा बलमु जी के बड़ी-बड़ी अंखिया से,
चोखे-चोखे बाड़े नयना कोर रे बटोहिया।
ओठवा त बाड़े जइसे कतरल पनवा से,
नकिया सुगनवा के ठोर रे बटोहिया।
दंतवा ऊ सोभे जइसे चमके बिजुलिया से,
मोंछियन भंवरा गुंजारे रे बटोहिया।
मथवा में सोभे रामा टेढ़ी कारी टोपिया से,
रोरी बूना सोभेला लिलार रे बटोहिया।।

छपरा शहर में घूमत रहनी त एगो स्कूल से बहरी निकलत लईकन से बात कईनी की बबुआ महेंदर मिसिर जी के नाव सुनले बारs लोग ? केहु ना सुनले रहल.. फेनु हम पूछनी की बबुआ लोग भिखारी ठाकुर के नाव सुनले बाड़s लोग.. त सब कवनो मुड़ी डोला देहले सन…

का सुनाएम का कहेम हम महेंदर मिसीर हो
माई बहिन होखsता बिना कोनो फिकिर हो
नाहके में लागता की लवट के हम देखे आईनी
तहार नावों के कहीं कवनो नईखे अब जिकीर हो

हम मुड़ी गड़ले उहां के बात सुनत रहनी, काहे से की हमरो पता रहल की उहां के खाली सीसा देखावत बानी हमरा के.. उहां के आंखि भरल आ गला बाझल लागत रहे।

बबुआ तुहे बतावा की जवान हम कुल देख के आईल बानी उ साचे बा नु, की कवनो गलती भइल बा हमरा से की आ हम देखनी हं कुल गलत बा। भोजपुरी के एतना बड़ दुरदसा कईसे हो गईल। नवका पीढी के के आपन इतिहास से, समाज से संस्कार से रीति- रेवाज से कवनो ढेर मतलबे नइखे रह गईल। हमरा बड़का छाती चौड़ा कर के आइल रहनी ऊपर से। अब का मुंह ले के जाएम। कहत कहत उहां के अचानक चुप हो गईनी।

हम मुड़ी गाड़ले कहल शुरू कईनी- की बात राउर मय ठीक बा, बाकिर आजुओ लोग बा जे एकरा बिरुद्ध लड़ताs, बाकिर हाथी आ चींटी वाला बात बा। ढेर नीमन आ एक जईसन सोच राखे वाला लोग प्रयास कर रहल बा। हम पांच मिनट ले दलील देत रह गईनी, आ जब मुड़ी उठावनी त उहां केहु ना रहल, हम देवार से बतियावत रहनी। उहां के गईल में अचरज ना भईल। वजह हमरा पता रहे बाक़िर का कहतीं हम, कि मय लोग भोजपुरी के गाय बना के दोहन करे में लागल बा। भोजपुरी गीत संगीत के, जे एक समय में चित्रगुप्त जी के समय में बुलंदी पे रहल, आज अश्लीलता के दूसरका नाम बनल जाता। आवे वाला पीढ़ी के माई- बाउजी लोग भोजपुरी से दूर रहे के शिक्षा दे ता लोग। सरकार २०-२२ करोड़ लोग के बोलल भाषा के त आज ले मान दिया ना पाईल, आ खाली चुनाव के बेरा हर बेरी नारा लागेला। हम का बहस करतीं। मन भारी हो गईल रहे आ फेनु सुते के प्रयास करे चल गईनी। जब आंखि खुलल त हम भाग के दूसरका कमरा में गईनी। उहां अजबे सन्नाटा रहे, जईसे अबगे इहां से तूफ़ान आ के गईल बा।

कमरा में की हमार करेजा में, पता ना चलत रहे।

Animesh Kumar Verma(अनिमेष कुमार वर्मा। मातृभाषा के सिपाही। प्रवासी भारतीय। संयुक्‍त अरब अमीरात के अबूधाबी शहर में रहते हैं। भोजपुरी साहित्‍य और संस्‍कृति विमर्श पर केंद्रित फेसबुक पेज आखर से जुड़े हैं। उनसे mranimeshkumar%40gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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