भारत एक नवउपनिवेशवादी देश है

नवगठित नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी माओवादी के संयोजक कॉमरेड नेत्रा बिक्रम चंद ‘बिप्लव’ से विष्णु शर्मा की बातचीत

पहले पुष्प कमल दहाल (प्रचंड) के नेतृत्व वाली एनेकपा (माओवादी) का विभाजन हुआ और मोहन बैद्य (किरण) तथा बिप्लव ने एक अलग पार्टी का गठन किया। जो लोग प्रचंड की नीतियों से असंतुष्ट और निराश थे, उन्हें लगा कि अब पार्टी सक्रिय होकर नेपाली क्रांति के अधूरे कार्यभार को आगे बढ़ाएगी। दो वर्ष के ही अंदर एक बार फिर निराशा का वातावरण पैदा हुआ और बिप्लव के नेतृत्व में एक नयी पार्टी का गठन हुआ, जो प्रचंड और किरण दोनों की नीतियों को खारिज कर रही है। लोग अब दम साध कर देख रहे हैं कि यह पार्टी उनकी उम्मीदों पर खरी उतरेगी और दुश्‍चक्र में फंसी नेपाल की राजनीति को बाहर निकाल सकेगी अथवा एक बार फिर लोगों को निराश होना पड़ेगा: आनंद स्‍वरूप वर्मा

आपके साथी आपको नेपाल का चे ग्वेरा कहते हैं। क्या वास्तव में नेपाल में ‘चे ग्वेरा’ संभव हैं? क्या यहां से वापस जाना संभव है?

➡ मैं इस बारे में इस तरह से सोचता हूं कि मानव सभ्यता के लिए उत्कृष्ट योगदान करने वाले व्यक्तित्वों में चे ग्वेरा भी एक अनुकरणीय व्यक्तित्व हैं। उनकी कुछ सफलताएं हैं और कुछ असफलताएं भी हैं। संपूर्ण में चे ग्वेरा एक उच्चतम सभ्यता के लिए जीवन बलिदान करने वाले क्रांतिकारी हैं। हूबहू तो अनुकरण नहीं किया जा सकता लेकिन हम उनका अनुकरण कर सकते हैं।

इसका मतलब है कि आप पुनः जनयुद्ध के रास्ते जा सकते हैं?

➡ क्रांति किसी की इच्छा से होने वाली चीज नहीं है। राज्यसत्ता जनता के प्रति, उसके प्रस्तावों के प्रति किस तरह का रवैया अख्तियार करता है, इन बातों से क्रांतियां निर्धारित होती हैं। इस कारण जनयुद्ध भी राज्य और जनता के बीच के अंतर्विरोध से सामने आने वाली परिघटना है। इस कारण जनयुद्ध से इंकार नहीं किया जा सकता।

लेकिन कॉमरेड, जैसा दिख रहा है, वह यह है कि पूर्व से ही आपका संघर्ष अपनी ही पार्टी के कॉमरेडों से अधिक और राज्यसत्ता से कम है। एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) में कॉमरेड प्रचंड के साथ वैचारिक संघर्ष में आपकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। यह संघर्ष पार्टी विभाजन का कारण भी बना। उसके तुरत बाद आपने कॉमरेड किरण के साथ वैचारिक संघर्ष शुरू कर दिया। कल आप (24 नवंबर को) औपचारिक तौर पर पार्टी से अलग हो गये। क्या कॉमरेड बिप्लव फूटपरस्त राजनीति करते हैं?

➡ ये हमारी व्यक्तिगत बात नहीं है। ये राजनीतिक संघर्ष का प्रतिबिंब है। कल भी प्रचंड कॉमरेड के साथ हमारी लड़ाई व्यक्तिगत नहीं थी। आज भी कॉमरेड किरण से यह लड़ाई व्यक्तिगत नहीं है। यह संघर्ष नेपाली समाज की जो पुराने किस्म की राज्य की संरचना है, सत्ता के अंग हैं, उन्हें परिवर्तन करने के लिए हो रहे संघर्ष का ही परिणाम है। मैं इसे ऐसे समझता हूं। और इसे आगे बढ़ते हुए नेताओं से मत-भिन्नता होती है। ये किसी नेता विशेष के साथ झगड़ा, वैमनस्य की बात नहीं है।

हाल ही के एक साक्षात्कार में आपने कहा था कि चीन को आप एक मित्र शक्ति की तरह देखते हैं।

➡ हां, ये उतनी बड़ी बात नहीं है। कम्युनिस्ट पार्टी होने के नाते और वहां कम्युनिस्ट नेतृत्व की सरकार होने के नाते चीन से कई विषय में स्वाभाविक ढंग से निकटता हो सकती है।

नेपाल के संबंध में भारत को आप कैसे देखते हैं?

➡ भारत हमारा पड़ोसी देश है। हमारे साथ इसके कई सकारात्मक संबंध भी हैं और इसका कई मामलों में गलत रवैया भी है।

लेकिन पुराने दस्तावेज में, जिसका कल तक आप समर्थन कर रहे थे, भारत को नवउपनिवेशवादी देश बताया गया है?

➡ हां, इसका हमने थोड़ा विश्लेषण किया है। खासकर ब्रिटिश शासन से मुक्ति के बाद भी उसके अवशेष भारतीय तंत्र में आज भी मौजूद हैं। उसका नेपाल को देखने का तरीका, नेपाल का उपयोग करने और उसे अपने प्रभुत्व में रखने वाला है।

आपको नहीं लगता कि पार्टी विभाजन का निर्णय आप लोगों ने बहुत जल्दबाजी में किया। हम देखते आये हैं कि नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी में लंबे समय तक दो लाइन का संघर्ष चलाने-चलने की परंपरा है। कॉमरेड प्रचंड की लाइन पर आप लोगों ने 2006 से 2012 तक दो लाइन संघर्ष चलाया। इससे पहले, जनयुद्ध के समय में भी डॉ बाबूराम भट्टराई और कॉमरेड प्रचंड की लाइन का संघर्ष भी लंबा ही चला था। लेकिन आप तो ’गुरिल्ला युद्ध’ शैली में पार्टी से अलग हो गये?

➡ ऐसा बिलकुल नहीं है। इसमें दो बाते हैं। हमारे अंदर की बहस मुख्य बात है। एक सतह की बात है और दूसरी सार की बात है। हम क्या कह रहे हैं कि यह कोई नितांत नयी बहस भी नहीं है। यह माओवादी पार्टी के संक्रमणकाल में प्रवेश करने के बाद, शांतिकाल में आने के बाद निरंतर चली आ रही बहस, प्रचंड कॉमरेड के साथ हुई बहस की ही निरंतरता है। इसलिए हम इसे नयी या कोई बड़ी बहस नहीं मानते। आज नेपाल में जिस किस्म की एक प्रतिक्रियावादी राज्यसत्ता जनता के ऊपर लादी जा रही है, उसका सामना कैसे करें – यह उस किस्म की बहस है। इसलिए कई साथी तो यहां तक कहते हैं कि हमने देर कर दी। आप कह रहे हैं कि जल्दी हो गया। माओवादी शांतिकाल की यह दस वर्ष की यात्रा वास्तव में एक अंधेरी सुरंग की यात्रा की तरह हो गयी है। और माओवादी आंदोलन की अपनी ही कमजोरियों से कार्यकर्ता और जनता के निराश होने की स्थिति बन रही है। हम इसे सुलझाने की कोशिश कर रहे थे। जब वहां रहते हुए इसके नहीं सुलझने की स्थिति बन गयी, तो हमें यह कदम उठाना पड़ा।

भारत के नये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नेपाल की राजनीति में बहुत दिलचस्पी दिखा रहे हैं। ऐसा लगता है वे यहां के वर्ग संघर्ष को धार्मिक अंधराष्ट्रवाद में बदल देना चाहते हैं। आपका इस विषय पर क्या कहना है?

➡ इसके दो पहलू हैं। यदि अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक पहलू से देखें तो नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री हैं। उन्हें इसी सीमा के अंदर रहना चाहिए। दूसरी ओर, यदि हम इसे राजनीतिक और वैचारिक स्तर में देखें तो पूंजीवाद की रक्षा करना मोदी की जिम्मेदारी है। वर्तमान की नेपाली राज्यसत्ता का संरक्षण करना, उसे स्थापित करना उनकी रुचि का विषय होगा। यही नहीं, नेपाल में भी कई कट्टरवादी ताकतें हैं, उनके साथ उनके क्या संबंध होंगे, ये हमारी रुचि का विषय नहीं है।

फिर भी भारत की पिछली सरकार और वर्तमान सरकार में अंतर तो देख रहे होंगे?

➡ नहीं, गुणात्मक तौर पर कोई अंतर नहीं है।

आप नेपाल के संक्रमणकाल में अपने लिए कैसी भूमिका तलाश रहे हैं?

➡ संक्रमणकाल से हम एक नया नेपाल चाहते थे। दस साल के जनयुद्ध की उपलब्धि‍ संस्थागत हो और जनता अपनत्व महसूस कर सके, ऐसे परिणाम हम चाहते थे। इस बात में हमारे साथ धेखा हुआ है। संसार के इतिहास में कहीं भी ऐसा नहीं हुआ, जैसा नेपाल में किया गया। देश के क्रांतिकारी आंदोलन में सबसे अधिक बलिदान करने वाली पार्टी के कार्यकर्ताओं को, नेताओं को विभिन्न किस्म के चक्रव्यूह में फंसा कर समाप्त करने का जिस तरह का प्रपंच यहां खड़ा किया गया, वो बिलकुल भी स्वीकार्य नहीं है। हम चाहते हैं कि जिस तरह का योगदान माओवादियों ने किया, जनता ने किया और जिस माओवादी आंदोलन के परिणामस्वरूप परिवर्तन आया, उसका नेतृत्व माओवादियों को दिया जाना चाहिए।

कॉमरेड, आप प्रचंड के नेतृत्व वाली माओवादी पार्टी और किरण के नेतृत्व वाली माओवादी पार्टी की कैसी भूमिका देखते हैं? भविष्य में दोनों पार्टियों के साथ आपकी पार्टी के संबंध कैसे होंगे?

➡ मैं क्या देखता हूं कि नेताओं की व्यक्तिगत सीमाएं भी कभी-कभार आंदोलन को निर्धारित करती हैं। प्रचंड कॉमरेड की सीमाओं ने माओवादी पार्टी को विभाजित कर दिया। किरण कॉमरेड की भी एक सीमा है। कॉमरेड किरण के पास एक अवसर था। हमने उनसे कहा भी, लेकिन वे भी अपनी सीमाओं के चलते आगे नहीं जा सके। दोनों कॉमरेडों की सीमाओं को भविष्य के आंदोलन का पूरक बनाने के विषय में हमें सोचना चाहिए। उनकी सीमाओं को समझते हुए और उनसे सीख लेते हुए आगे जाने की आवश्यकता है।

[समकालीन तीसरी दुनिया से कॉपी-पेस्‍ट]

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