एक ट्वीट ने संपादक को संघी बना दिया

♦ जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

त्तर प्रदेश सरकार ने “पीके” को मनोरंजन कर से मुक्त करने का फैसला क्या लिया, गोया संघियों पर बिजली गिर पड़ी है। अपनी संघी पक्षधरता के लिए ख्यात दैनिक जागरण के संपादक संजय गुप्ता ने ट्विट किया है।

Sanjay Gupta Twit

संजय गुप्ता के ट्विट को देखकर पहली प्रतिक्रिया तो यही होगी कि यह किसी पेशेवर संपादक की राय नहीं हो सकती, यह तो किसी संघी की राय हो सकती है! किसी फिल्म को राज्य सरकार करमुक्त करती है, तो यह आम जनता के हित में लिया गया फैसला ही कहा जाएगा। क्योंकि फिल्म देखने तो सभी धर्म और जाति के लोग जाते हैं, करमुक्त फिल्म का मतलब है निम्नमध्यवर्ग और मध्यवर्ग के दर्शकों को राहत पहुंचाना। हमें विभिन्न राज्य सरकारों से इस तरह की मदद की जरूरत रहती है कि वे साफ सुथरी बेहतर मनोरंजक फिल्म को करमुक्त स्क्रीनिंग की सुविधा दें, इससे सिनेमा संस्कृति को बल मिलता है।

दूसरी बात यह है कि संजय गुप्ता जानते हैं कि राज्य का काम है विवेकवाद का प्रचार करना, समाज में उन फिल्मों को राज्य सरकार प्रमोट करे जो विवेकवाद या वैज्ञानिकचेतना का प्रचार प्रसार करती हों, धार्मिक नानसेंस को नंगा करती हों, यह काम राज्य और केंद्र सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी में आता है, कायदे से मोदी सरकार को “पीके” को सारे देश में टैक्स फ्री दिखाने का आदेश देना चाहिए। सामाजिक विकास और औद्योगिक विकास के लिए इस तरह की फिल्मों को प्रमोट किया जाना चाहिए।

हमारे अनेक फेसबुक मित्र हैं जो आमिर खान की मोदी से मित्रता को देख रहे हैं। मेरा मानना है “पीके” फिल्म के कलाकारों का राजनीतिक विचारधारा और प्रतिबद्धता से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है। “पीके” फिल्म बुनियादी तौर पर नानसेंस को निशाना बनाती है और उसके लिए नाटकीय ढंग से नानसेंस तर्कों का प्रयोग किया गया है, सेंसपूर्ण तर्क उसमें प्रच्छन्नभाव से चले आये हैं, सेंसपूर्ण तर्क तो दर्शक के मन में है, जिनको फिल्ममेकर नानसेंस हमलों के जरिये उभार देता है। पर्दे पर तो नाटकीयता का पूरा खेल चलता रहता है। धर्म के नानसेंस पर जब भी नानसेंस से हमला होता है, तो आम लोग तिलमिलाते हैं और मजा भी लेते हैं, जबकि परेश रावल की फिल्म “ओ माई गॉड” में नानसेंस का जबाव सेंस से दिया गया था। इसके विपरीत “पीके” फिल्म में शुरू से आखिर तक नानसेंस के हलके तर्कों का धार्मिक नानसेंस के खिलाफ इस्तेमाल किया गया है। यह विज्ञानसम्मत चेतना वाली फिल्म नहीं है, यह सहज ग्राम्यबोध के जरिये धार्मिक पाखंड और नानसेंस को उजागर करने वाली फिल्म है।

Jagadishwar Chaturvedi(जगदीश्‍वर चतुर्वेदी। मथुरा में जन्‍म। कलकत्ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हिंदी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन। तकरीबन 30 कि‍ताबें प्रकाशि‍त। जेएनयू से हिंदी में एमए एमफि‍ल, पीएचडी। संपूर्णानंद संवि‍वि‍ से सि‍द्धांत ज्‍योति‍षाचार्य। फोन नं 09331762360 (मोबाइल) 033-23551602 (घर)। ई मेल jagadishwar_chaturvedi@yahoo.co.in, पता : ए 8, पी 1/7, सीआईटी स्‍कीम, 7 एम, कोलकाता 700054)

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