सिनेमा में गांव की याद #HeeraMoti

♦ सैयद एस तौहीद

मुंशी प्रेमचंद की चुनिंदा रचनाओं का फिल्मों में रूपांतरण हुआ था, जिसमें ‘दो बैलों की कथा’ पर आधारित और बलराज साहनी अभिनीत हीरा मोती का स्मरण कर रहा हूं। बलराज साहनी हिंदी सिनेमा की एक अविस्मरणीय शख्सियत रहे हैं। अभिनय में आज भी बलराज को बड़ा आदर्श माना जाता है। बलराज साहनी और प्रेमचंद के सामाजिक-सांस्कृतिक संघर्ष में वैचारिक आदर्शों की एक समानता समझ आती है। इन दो शख्सियतों में जो कुछ साझा था, कह सकते हैं कि उसका एक अंश इस फिल्म के माध्यम से अभिव्यक्त हुआ। प्रगतिशील आंदोलन ने संस्कृति कर्म से जुड़े लोगों को साझा मंच दिया था। इस अभियान में प्रेमचंद व बलराज साहनी की महत्‍वपूर्ण भूमिका थी। प्रेमचंद का व्यक्तित्व इस क्रांतिकारी अभियान में प्रेरणा का स्रोत था। उधर सिनेमा के स्तर पर विचारधारा समर्थन में बलराज दलित-शोषित-वंचित किरदारों को जीवंत कर रहे थे। एक तरह से इन पात्रों को जीवंत करके इनकी तकलीफों को भी साझा कर रहे थे। उन्होंने संस्कृतिकर्म को सहयोग का माध्यम बनाया।

ऐसा भी नहीं कि बलराज ने फिल्मों को व्यवसाय नहीं माना। लेकिन उनमें लीक से हटकर भी काम करने का जज्बा था। ग्रामीण पात्रों को निभाना कठिन होता है। नगरीय पात्रों की परतें उसे विशेष रूप अवश्य देती है। लेकिन देशज पात्रों की बात जुदा है। इस मिजाज के पात्रों को बलराज ने अनेक बार जीवंत किया। बिल्कुल अपनी मिट्टी का होने की वजह से गांव के किरदारों में अपार आकर्षण है। सिनेमा ने इन्हें बड़ी पारी नहीं दी। कह सकते हैं कि पोपुलर सिनेमा में नगरीय कहानी व पात्रों को तरजीह मिली। फिर भी कम समय में ही ग्रामीण पात्र स्मरणीय बनकर उभरे। इन किरदारों का वक्त आज भी याद किया जा सकता है।

झूरी (बलराज साहनी) और रजिया (निरूपा राय) का मेहनतकश परिवार खेती-किसानी पर गुजर बसर करता है। झूरी एक स्वावलंबी किसान है, मेहनत मजदूरी की कमाई को महत्‍व देता है। उसमें एक समर्पित किसान की बहुत सी विशेषताएं हैं। उसका निश्छल स्वभाव मुसीबत की एक बड़ी वजह हो जाती है। झूरी के परिवार में रजिया की छोटी ननद ‘चंपा’ (शोभा खोटे) और बैलों की एक सुंदर जोड़ी भी है। बैल मालिक के साथ मुस्तैदी से खेतों में डटे रहते हैं। झूरी और समूचा गांव इन्हें स्नेह से ‘हीरा-मोती’ कहता करता है। झूरी के परिवार को बैलों की इस जोड़ी से बहुत लगाव है। पशुओं के प्रति झूरी का निश्छल प्रेम इन पंक्तियों में समझा जा सकता है ‘हीरा मोती के ऊपर तो खलिहान वार दूं’। वह दो पसेरी अनाज के बदले उनके लिए घुंघरू के मनभावन पटटे लाकर देता है। अनाज से साहूकार का कर्जा चुकाया जा सकता था। कर्ज बकाया रहते ‘प्यार का कर्ज’ पूरा करता है। खुशियों के पल गंगा-जमुनी भाव से सजे गीत ‘कउन रंग मूंगवा, कउन रंग मोतिया’ में महसूस किये जा सकते हैं।

इधर जमींदार (कैलाश) पशुपति (असीम कुमार) को पुरखों की अच्छी सेवा का हवाला देते हुए, अपने बैलों की देखरेख का जिम्मा उसे देता है। अबकी बार मेले में जोड़ी की जीत पर लगान माफ हो जाने के वायदे के साथ उसे यह काम सौंपा गया। कुछ दिनों के बाद बैलों की एक दौड़ आयोजित हुई। जमींदार के सेवक पशुपति की जोड़ी के मुकाबले हीरा-मोती की जोड़ी दौड़ में विजयी हुई। पराजय से विचलित होकर वह पर पशुपति से झूरी को हीरा-मोती के साथ हवेली में हाजरी का संदेश देता है। जमींदार के कोप से बचने के लिए झूरी ने हीरा-मोती को अपने संबंधी गया के साथ रवाना कर दिया। मालिक द्वारा झूरी के बैलों का हाल पूछने पर पशुपति सूझ-बूझ से स्वयं एवं झूरी को जमींदार से बचा लेता है।

उधर गया हीरा-मोती को लेकर अपने गांव की ओर निकला है। बैलों की जोड़ी बड़ी मुश्किल से नये घर आयी, घर तक लाने में गया के पसीने छूट गये। पशु में अपने असल मालिक की बड़ी परख होती है। नये हाथ में सौंपे जाने बाद असहज दिखाई देते हैं। नये घर में हीरा-मोती के साथ झूरी जैसा अपनत्व नहीं होता। हां, गया काका की असहाय लड़की (बेबी नाज) में उन्हें अपनी सुध लेने वाला कोई जरूर मिला। पशु को स्नेह की बड़ी पहचान होती है, झिड़क व मार के बीच में थोड़े से अपनत्व की वजह से कुछ दिन वहां टिक सके। इस दरम्यान गांव में हाट-मेले का वक्त आया। खूब उमंग, उत्साह, उत्सव से मेला आयोजित होता है। बैलगाडियों की दौड़ में जमींदार की जोड़ी के साथ दूसरे प्रतिभागी भी आये। हीरा-मोती को लेकर गया भी यहां आया। दौडने की बात तो दूर, लाख कोशिशों के बाद भी हीरा-मोती डोले तक नहीं। लेकिन झूरी की आवाज पर दौड़ना शुरू किया, तो फिर जीतने बाद ही ठहरे। पशुपति की जोड़ी को हराकर पहला इनाम मिला, लेकिन सिक्के की दूसरी ओर जमींदार साहब के सम्मान व रसूख को खुली चुनौती देने का दुस्साहस घटित हो गया। जमींदार ने बैलों की हार को रसूख के विरुद्ध माना। मामले की गंभीरता को भांपते हुए झूरी जमींदार के द्वार पर आकर माफी तलब करता है। गरीब किसान को उसके दुस्साहस का एहसास कराते हुए जमींदार कहता है, ‘जो हाथ खिलाफ उठेगा वह तोड़ दिया जाएगा, जो हमारी बराबरी करेगा वह मसल दिया जाएगा’। एक बार फिर से झूरी पर जमींदार के रसूख को चुनौती देने का गंभीर इल्जाम है। झूरी को माफी तो जरूर मिली, लेकिन यूं ही जा ना सका। कृपा के एवज में हीरा-मोती की जोड़ी को हवेली की ड्योढी पर बांध जाने का हुक्म मिला। बैलों को लाने के लिए साहूकार बंसी (रशीद खान) झूरी के घर आया। किंतु हुक्म के विरुद्ध जाकर रजिया साहूकार को हीरा-मोती नहीं सौंपती है।

जमींदार इस दुस्साहस को चुनौती के रूप में लेता है। पिछली बार तो झूरी किसी तरह जमींदार के कोपभाजन से निकल आया, लेकिन अबकी बार मामला बहुत गंभीर है। अपमान का जवाब देने के लिए अपने सेवक पशुपति को मोहरा बनाता है। पशुपति के नाम से झूरी पर झूठे कर्ज का मामला थोप दिया गया। समय व परिस्थितियां झूरी के विरुद्ध हैं। जमींदार के भयवश पंच का कोई भी सदस्य झूरी के पक्ष में गवाही देने को राजी नहीं हुआ। पंचायत तो झूरी के हक में सुनवाई के लिए बुलायी गयी, लेकिन फैसला उसके खिलाफ हुआ। विपदा की इस घड़ी में झूरी स्वयं को निस्साहय पाता है, अब हीरा-मोती को जमींदार के सुपुर्द करने के सिवाय कोई विकल्प नहीं। बैलों को उस ड्योढी को सौंप कर झूरी मुक्त होता है। लेकिन हवेली की रस्सी तोड़ कर वे जल्द ही हीरा-मोती मालिक के पास लौट आते हैं। हीरा-मोती को देखकर झूरी के परिवार को हर्ष हुआ, लेकिन उन्हें उसी समय वहां से हटा देने का कठोर निर्णय लिया जाता है। कचहरी का फैसला होने तक झूरी उन्हें फिर से गया के पास छोड़ आता है। इसी बीच साहूकार बंसी बैलों को ढूंढते हुए झूरी के घर की ओर आता, लेकिन जोड़ी को वहां भी न पाकर चला जाता है।

जाहिर है कि पराये घर में मालिक जैसा अच्छा व्यवहार संभव नहीं, गया हीरा-मोती से चाबुक के जोर पर काम ले रहा है। अड़ि‍यल रवैये की वजह से अच्छा चारा भी नहीं दिया जाता। एक रात गया की लड़की उन्हें इस कष्ट से रिहा कर देती है। उधर न्याय की आस में बैठे झूरी के साथ कचहरी भी इंसाफ न कर सकी। वहां बंसी कर्ज अदायगी का गवाह है, जो कि शासन तंत्र का अत्याचारी तत्व है। जाहिर है सुनवाई झूरी के पक्ष में नहीं होती। न्यायालय झूरी को बकाया कर्ज अदा करने का फैसला देती है। जिसके समय पर न चुकाये जाने की सूरत में झूरी की संपत्ति नीलाम कर दी जाती है।

उधर गया के घर से छूटी बैलों की जोड़ी आजाद होकर वापस झूरी के गांव की ओर आती है। हीरा-मोती को सही-सलामत देखकर झूरी के मुख से ‘कहां बनवास ले लिया था तुमने हीरा मोती’ स्नेह में फूट पड़ा। बैलों के पीछे-पीछे उन पर दावा करने वाले खरीददार भी चले आते हैं। जोर जबरदस्ती के दम पर उन्हें साथ ले जाना चाहते हैं, लेकिन असहमति में हीरा-मोती दावेदारों को गांव के बाहर खदेड़ देता है। इस तरह ‘प्रतिकार’ के दम पर जुल्म के खिलाफ अपनी रक्षा करता है। हीरा-मोती का साहस व जज्बा देखकर गांव वालों में अपनी सीमाओं/मजबूरियों के विरुद्ध उठ खड़ा होने की हिम्मत विकसित होती है। बेजुबान पशुओं का प्रतिकार मनुष्यों में बदलाव आंदोलित करने में प्रेरणा का काम करता है। जमींदार के निरंकुश शासन के खिलाफ विद्रोह का स्वर मुखर होता है। न्याय की लड़ाई में समूचा गांव झूरी के पक्ष में एकजुट हो जाता है। झूरी की अगुवाई में लोग घर-द्वार छोड़ उसका खेत मुक्त कराने निकल पड़ते हैं। जनता की एकता, साहस एवं शक्ति के समक्ष जुल्म की सियासत मिट जाती है। किसानों को खेतों पर हक मिलने साथ जमींदारी व्यवस्था का सांकेतिक पटाक्षेप होता है।

फिल्म का एक गीत नवोदय को कुछ यूं बयान करता है,

‘नाच रे धरती के प्यारे, अरमानों की दुनिया सामने है तेरे
आज तेरे घर होने को है फिर खुशियों के फेरे’

‘हरगिज ना चलता है जोर सितम… मजबूर ना बन, सिर उठा के चल… मजबूत राहें बना कर चल’ जैसा समापन संदेश आदमी को सीमाओं के परे जाने को प्रेरित करता है। यह विचार जिंदगी का रुख पलटने का हौसला रखते हैं।

देश के समक्ष नवनिर्माण का बड़ा लक्ष्य था। सभी क्षेत्रों की सहभागिता जरूरी थी। सिनेमा भी इस दिशा में काम कर रहा था। साहित्य में उपलब्ध कहानियों को अधिक लोगों तक पहुंचाने में फिल्‍म निर्माण एक कड़ी बना। हिंदी व अन्य भाषाओं की महत्‍वपूर्ण कृतियों पर फिल्मों का निर्माण इसी का उदाहरण है। साहित्य का फिल्म की दुनिया से रिश्ता स्वतंत्र व्याख्या का विषय है। बहरहाल कथा-सम्राट मुंशी प्रेमचंद की बात करें, तो ‘मजदूर’ से शुरू हुआ सफर कृशन चोपड़ा की ‘हीरा-मोती’ से होकर ‘गोदान’, ‘गबन’ फिर ‘शतरंज के खिलाड़ी’ एवं ‘सद्गति’ तक पहुंचा। उनकी ग्रामीण परिवेश की रचनाओं पर बनी फिल्में सबसे अलग हैं। गुलजार साहब ने टेलीविजन पर उनकी याद में ‘तहरीर’ चलायी। प्रेमचंद की कहानियों को घर-घर तक पहुंचाने में सफलता मिली। हीरा-मोती इस सफर में एक महत्‍वपूर्ण अध्याय मानी जा सकती है। क्योंकि इसके बाद कथाकार की रचनाओं पर व्यापक रचनात्मक अभियान आरंभ हुआ। कह सकते हैं कि यह फिल्म प्रस्थान बिंदु थी।

हीरा-मोती के माध्‍यम से साहित्य में दर्ज किसान की बात को अन्य माध्यमों के साथ बताने की पहल हुई। सबसे पहले बाबूराव पेंटर ने ‘साहूकारी पाश’ के माध्यम से गांव-समाज की व्यथा को रखा। फिर सत्यजित राय ने ‘पाथेर पांचाली’ बनाकर गांव-किसान की समस्या पर विश्व स्तर का विमर्श जागृत किया। ऋत्विक घटक की फिल्मों ने भी हाशिये के हित में कुछ ऐसा ही किया। इसी क्रम में बिमल राय की ओर से ‘दो बीघा जमीन’ का निर्माण हुआ। महबूब खान से लेकर दिलीप कुमार, फिर नरगिस, राजकपूर और सुनील दत्त तथा मनोज कुमार एवं अमिताभ बच्चन ने भी गांव-किसान को महत्‍व दिया। सुधेंदु राय की ‘सौदागर’ अमिताभ को एक अलग लीग में स्थापित करती है। कृशन चोपड़ा का संकल्प भी सराहनीय था। भारत को ‘गांवों का देश’ मानने संदर्भ में हीरा मोती का योगदान महत्‍व रखता है।

‘हीरा मोती’ के कथानक में जमींदारी व्यवस्था की पृष्ठभूमि में मानव की सीमाओं को चुनौती देकर शोषण के विरुद्ध लड़ने को प्रेरित किया गया। शासनतंत्र आम लोगों की सहनशीलता को भय के समकक्ष मानकर अन्याय की व्यवस्था कायम करता है। व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह का मतलब शासक को चुनौती देना होता है। किसानों को साहूकारी पाश में जकड़ कर अपने ही खेतों पर बंधुआ बनाकर काम करवाना जमींदारी की पहचान बन चुकी थी। आम जन की संपत्ति शासन की मिल्कियत मानी जाती थी, जिस पर साहूकारों एवं जमींदारों एकाधिकार हुआ करता था। मालिक जनता को हमेशा शोषण का पात्र बनाये रखना चाहता है। वह कदापि नहीं बर्दाश्त करेगा कि जनता में कोई या कुछ भी उसकी बराबरी का हो। हीरा मोती में फिल्मकार ने सामंती शोषण के इसी चक्र के विरुद्ध आवाज उठायी है।

झूरी ने जमींदार के बैलों की प्रतिस्पर्धा में हीरा-मोती को विजयी कर सामंत से बराबरी का अपराध किया। जो व्यवस्था नजरें मिलाने को दुस्साहस मानती हो, उसके लिए आमजन के अधिकार कोई मायने नहीं रखते हैं। हक की लड़ाई को विद्रोह मानता है। निरंकुश शासक को स्वहित प्रिय होता है। किंतु इसे स्वीकार कभी नहीं करता कि वो किस हद तक शासन की नीति का प्रतीक है, जिसे आईना दिखाना एक बड़ा अपराध है। शासक वर्ग का चरित्र उसकी नीतियों में व्यक्त होता है। दौड़ में भाग लेकर झूरी ने मुसीबत को न्योता दिया है। उत्सव के उत्साह में उसे संज्ञान न रहा कि दौड़ में जमींदार की जोड़ी को चुनौती देना, दरअसल शासन से नजरें मिलाना है। रजिया ने भी जमींदार की हुक्म की अनदेखी कर संकट को आमंत्रण दिया। घटना कथानक को जमींदारी व्यवस्था की पहचान कराने वाले हालात से रू-ब-रू कराते हैं। समय हाशिये की विवशता को प्रकट करता है। विपदा की घड़ी में पीड़ि‍त अक्सर स्वयं को अकेला ही पाता है। शोषण ‘बांटों और राज करो’ की रणनीति पर खड़ा रहता है। इसलिए जब कभी उसका शक्ति से विरोध हुआ, वह धाराशायी हो गया। किंतु दीपक को प्रज्‍ज्वलित करने लिए कोई चिंगारी जरूरी है, हीरा-मोती का ‘विरोध’ वही था।

जिस सामाजिक व्यवस्था में इस अदभुत प्रतिकार ने जन्म लिया, वहां सर्वहारा वर्ग असहाय शोषण का शिकार है। सामंतवादी भय उन्हें मौन होकर सब कुछ सहन करने को विवश करता है। अधिकारों की लड़ाई के स्वर जिस समाज में नहीं, उसी में अपने स्वामियों के हक में ‘हीरा-मोती’ का प्रतिकार क्रांतिकारी घटना है। संघर्ष व प्रेरणा की घटना कथा में काल्पनिक मोड़ न होकर एक सहज अनुभव है। वंचित समाज की लड़ाई में हर छोटी घटना को नोटिस करने की दक्षता से इस स्तर की कहानी निकलकर आयी।

झूरी की भूमिका में बलराज साहनी का अभिनय ‘दो बीघा जमीन’ के शंभू का विस्तार सा है। प्रेमचंद के एक महत्‍वपूर्ण पात्र को परदे पर जीवंत करने का सौभाग्य बलराज साहनी को मिला। झूरी एक मेहनतकश किसान है, सच्चाई व ईमानदारी से खेतों में डटा रहता है। गरीब किसान को कभी-कभी यह मयस्सर नहीं होता। सामंती व्यवस्था ने झूरी से उससे खेती-किसानी का हक भी छीन लिया है। बलराज इस परिस्थिति में उतने ही असहाय दिखाई दिये हैं, जितना शायद प्रेमचंद का पात्र ‘झूरी’ रहा होगा। साहित्य व समाज के प्रति अभिरुचि ने उन्हें यह मकाम दिया था। ग्रामीण परिवेश के सांचे में ढले पात्रों को परदे पर एक से अधिक बार जीवंत करने का सौभाग्य बलराज साहनी को मिला था। बलराज साहब की गंवई छवि ने आगामी राह में लगभग सभी समकालीन अभिनेताओं को ऐसे पात्र निभाने को प्रोत्साहित किया। बहुजन समाज की व्यथा का उन्हें आभास था। हाशिये के पात्रों को स्क्रीन पर जीवंत कर सामाजिक दायित्वों को निभाया था। इस तरह के किरदारों को व्यापक विमर्श का विषय बनाने में महत्‍वपूर्ण योगदान दिया। धरती के लाल, दो बीघा जमीन, हीरा-मोती, काबुलीवाला का जिक्र बलराज साहनी के बिना संभव नहीं। बलराज इस किस्म के किरदारों के स्वाभाविक पसंद थे। बिमल राय ने साहित्यिक कृतियों पर फिल्में बनाने की एक परंपरा विकसित की थी।

बलराज साहब की फिल्मों पर यथार्थवाद व नव-यथार्थवाद आंदोलन का प्रभाव रहा। सामाजिक उत्तरदायित्व से ओत-प्रोत अभिनय कई अवसरों पर जीवंत हुआ। झूरी का चरित्र तत्कालीन ग्रामीण जीवन को व्याख्यायित करता है। झूरी के किरदार में बलराज खेतों में झूम कर मेहनत का उत्सव मनाते हैं, तो कभी ‘ओ ललनवा रे ललवना’ को ठेठ गंवई अंदाज में गुनगुनाते देखे जा सकते हैं। वहीं असहाय विवशता में मायूसी का समंदर भी आंखों में तारी हुआ। बलराज ने बनावट के उसूलों को तिलांजलि देकर सहजता के नये स्तर भी स्थापित किये। किसान की भूमिका में पात्र व अभिनेता में विभेद नहीं किया जा सकता। वह ग्रामीण परिवेश के स्वाभाविक हिस्सा प्रतीत हुए हैं। उस समय के अभिनेता धोती पहन कांधे पर हल व फावड़ा को उठाकर गौरवान्वित महसूस करते थे। बलराज साहनी इस परंपरा के अग्रणी वाहकों में से एक थे।

इससे पहले वे वक्त की धारा मोड़ देने वाली ‘धरती के लाल’ एवं ‘दो बीघा जमीन’ में ग्रामीण की भूमिका में नजर आये थे। राहत के पलों में चौपाल पर हुक्के का कश लेने की उम्मीद बलराज के झूरी से ही की जा सकती थी। फिर पशुधन के प्रति आदमी की संवेदना को अभिव्यक्त करने में भी सफल रहे थे। निरंजन (धरती के लाल) एवं शंभू (दो बीघा जमीन) के पात्रों के अनुभव की झलक ‘झूरी’ में मिलती है। हीरा-मोती के झूरी की परिस्थितियां उस स्तर की चुनौतीपूर्ण न हो लेकिन शोषित-दलित वर्ग की पीड़ा वही थी। यह कहा जा सकता है कि झूरी की कहानी ‘हाशिये’ की तस्वीर थी। झूरी के दुखों का मुख्य कारण शोषण का सामंतवादी केंद्र है। प्रस्तुत कथानक में जमींदारी व्यवस्था के निरंकुश स्वरूप का एक उदाहरण समक्ष है।

हाशिये के लोगों की फिक्र में ‘सामानांतर सिनेमा’ ने भी एक आंदोलन चलाया। सिनेमा को ‘एक्टिव चेंज’ की मुहिम बनाकर बड़े परिवर्तन का लक्ष्य रखा गया। जीवन के यथार्थ को सामने रखने की पहल हुई। नवनिर्माण लक्ष्य को नजर में रखते हुए ग्रामीण परिवेश को प्राथमिकता दी गयी। मृणाल सेन से लेकर श्याम बेनेगल एवं गौतम घोष तथा प्रकाश झा तक ने गांव की व्यथा को फिल्म का विषय बनाया। प्रेमचंद व सामानांतर सिनेमा ने जिन पात्रों के उत्थान के लिए संघर्ष किया, आज भी हाशिये पर हैं। शोषण, गरीबी, भुखमरी की विकराल समस्याओं से उबर नहीं सके हैं। मनरेगा जैसी महत्‍वकांक्षी योजना भी इनका भला नहीं कर सकी। समकालीन व्यवस्था सामंतवादी सत्ता के मौन समर्थन की दिशा में है। हरियाणा एवं यूपी द्वारा खाप पंचायतों को मिली क्लीन चीट इस संदर्भ में उल्लेखनीय है। झूरी-जोखू-होरी जैसे लोगों के साथ आज भी अन्याय हो रहा। जिन पात्रों की कहानी आदमी में संवेदना का सृजन करती है, उनकी स्थिति में बदलाव के लिए इस ओर से सार्थक प्रयास आवश्यक है। सजग सहयोग से प्रेमचंद के चिंतन को दिशा देना होगा। हिंदी सिनेमा की आमजन धारा में ‘हीरा-मोती’ का योगदान महत्‍व का विषय है। सर्वहारा वर्ग संदर्भ में फिल्म तत्कालीन हालात को सक्षम रूप में व्यक्त करती है। शोषण का स्वरूप अब बदल गया है, लेकिन उसका दमनकारी चक्र तीव्र है। उदारवादी-नव उदारवादी नीतियों की एक बड़ी कीमत झूरी, रजिया जैसे लोगों को आज भी चुकानी पड़ रही है। किसान की मेहनत पूरे देश का पेट भरने की कूव्वत रखती है। किंतु उसी भोजन को ग्रहण करते समय शायद ही कोई किसान को धन्यवाद कहता है। सिनेमा में भी इस किस्म के किरदारों को अपेक्षित महत्‍व नहीं मिल रहा।

‘हीरा मोती’ ने सिनेमा में जनसेवा की भावना को ग्रामीण संदर्भ से रखा था। इस परिवेश की कहानियां अब हिंदी सिनेमा में नहीं आतीं। आज की अधिकांश फिल्में नगर-महानगर की कहानियों को बढ़ा रही हैं। आधुनिकता के आवरण में लिपटी यह नगरीय कहानियां हिंदी सिनेमा को वैचारिक बारंबारता की ओर ले जा रही हैं। व्यावसायिक आकर्षण के मद्देनजर परिवर्तन का हौसला सीमित है। लोकप्रिय सिनेमा का वर्त्तमान ग्रामीण परिवेश से कटा है। जड़ों से विमुख नगरीय आबादी को गांवों (जड़ों) की झांकी के लिए अतीत की ओर देखना है। आज का सिनेमा अतीत से मिले वैचारिक तत्‍वों को लागू नहीं कर सका है। बहुत समय हुआ, किसी फिल्मकार ने ग्रामीण परिवेश की दमदार फिल्म नहीं बनायी। अधिकांश लोग नगरीय ‘हैंगओवर’ से जूझ रहे हैं।

आज हीरा मोती और ग्रामीण परिवेश से सजी सभी फिल्मों की याद आती है। लेकिन हिंदी सिनेमा इस ओर से कटा हुआ मालूम पड़ता है। गैर हिंदी भाषी क्षेत्रों में अब भी सकारात्मक रुचि नजर आती है। ग्रामीण जीवन की बागडोर क्षेत्रीय सिनेमा (हिंदी क्षेत्र में भोजपुरी सिनेमा) के पाले में है, जिसे वो बहुत से मामलों में विकृत रूप में रखता है। हालात के मद्देनजर सकारात्मक उत्थान समय की जरूरत है। इस दिशा में पहल से हमारा सिनेमा एक बडे दायित्‍व को निभा सकेगा।

Saiyad S Tauheed(सैयद एस तौहीद। जामिया मिल्लिया से स्नातक। सिनेमा केंद्रित पब्लिक फोरम की लोकप्रिय साईट से लेखन की शुरुआत। आजकल सिनेमा व संस्कृति विशेषकर हिंदी फिल्मों पर लेखन। उनसे passion4pearl@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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