एक जरूरी किताब को प्रकाशक चाहिए

akp♦ अश्विनी कुमार पंकज

हिल कुली कोंता की कहानी। साल के इस आखिरी दिन। अपने पहले उपन्यास के बारे में बात कर रहा हूं। इसे लिखने की योजना आठ साल पहले बनायी थी और लिख पाया इस नवंबर-दिसंबर में। इसे लिखने के लिए करीब डेढ़ महीने तक मॉरिशस की वर्चुअल यात्रा पर रहा। 32 दिन पानी जहाज पर और दो सप्ताह पोर्ट लुई व बेल ओम्बरे बागान में। चडरी (रांची) के कोंता उरांव और दाउदनगर (औरंगाबाद, बिहार) की कुंती पाठक के साथ 1842 के नवंबर से लेकर 1856 तक की यह एक ऐसी ऐतिहासिक यात्रा रही, जिसके बारे में प्रवासी भारतीयों पर लिखा गया अब तक का साहित्य और इतिहास दोनों मौन है। हमारे इस उपन्यास से साहित्य और इतिहास के रचनाकारों व अध्येता लोगों को इतिहास के महासागर में डूबो दी गयी शायद वह आदिवासी पगडंडी दिख जाए, जिससे देश और दुनिया अभी भी अनजान बनी हुई है। जो आदिवासी पगडंडी मॉरिशस जैसे द्वीप देशों के छुपा दिये गये इतिहास तक हमें ले जाती है। जहां श्रेष्ठता के दंभ से परे कोंता और कुंती एक नयी नस्ल का सृजन करते हैं।

चाहता हूं कि यह उपन्यास फरवरी तक आपके पास जरूर हो। इसके लिए प्रकाशक चाहिए। आप किसी प्रकाशक को जानते हों जो लेखक का सम्मान करते हुए आप तक इसे पहुंचाने का दायित्व ले सके, तो बताइएगा।

(अश्विनी कुमार पंकज। वरिष्‍ठ पत्रकार। झारखंड के विभिन्‍न जनांदोलनों से जुड़ाव। रांची से निकलने वाली संताली पत्रिका जोहार सहिया के संपादक। इंटरनेट पत्रिका अखड़ा की टीम के सदस्‍य। वे रंगमंच पर केंद्रित रंगवार्ता नाम की एक पत्रिका का संपादन भी कर रहे हैं। उनसे akpankaj@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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