पशु प्यार के फरिश्ते हैं #Rumi #Hachi

♦ सैयद एस तौहीद

इंसान और पशु का रिश्ता संसार का सबसे अनोखा रिश्‍ता होता है। इंसानों की संवेदना उस रिश्‍ते को कायम रख सकती है। अधिकतर लोग पशुओं को लेकर संवेदनशील होते भी हैं… अधिकतर नहीं भी। दरअसल इस रिश्ते को नफा-नुकसान की नजर से देखे जाने से मानवीयता का दायरा बदलता व घटता जा रहा है। पशुओं को लेकर क्रूरता के अनेक उदहारण सामने आ रहे हैं। पशु व पक्षियों की बहुत सी प्रजातियां या तो मिट चुकी हैं या मिटने के कगार पर हैं। मुनाफों के लिए पशुओं का निर्मम व्यापार हो रहा है। जाने-अनजाने इस दुष्‍चक्र की एक कड़ी हम बन गये हैं। जबकि दुनिया में बहुमूल्य खुशियों की खोज पशु-संगी पर जाकर समाप्त होती है। इन साथी-संगी द्वारा किये गये एहसानों की कीमत लगाना मुमकिन नहीं। क्या किसी पशु की वफादारी को बराबरी से लौटाया जा सकता है? क्या पशुओं के बिना एक बराबरी का जहान मुमकिन होगा?

पशुओं की वफादारी की जायजा लेना हो तो Lasse Hallström की Hachi देखें। वफादारी में श्‍वान (कुत्ते) की बराबरी नहीं की जा सकती। उसके वफा के गुणों को एक महान श्रद्धांजलि हाल्स्ट्रोम की यह फिल्म है। पशु साथी-संगियों में कुत्ता इंसान के सबसे पुराने साथियों में एक है। इ्नकी वफादारी की मिसाल जमाने से कायम है। यह अपने शारीरिक हाव-भाव से आनंद के अनेक स्तर को जीना जानते हैं। अपने हिस्से की दुनिया को तलाशने या उस पर अनुराग व्यक्त करने का इनका अंदाज बड़ा ही कमाल का होता है। वर्तमान को जिंदादिल उमंग के साथ जीने का सलीका इन वफा के सैलानियों से सीखा जा सकता है। अध्‍यात्‍म की एक शिक्षा इनसे दोस्ती करके प्राप्त की जा सकती है। यदि आपने कभी किसी कुत्ते को अपनाया हो या अपनाने की तमन्ना रखते हों… लास हालस्ट्रोम की फिल्म में डूबने से खुद को रोक नहीं पाएंगे। आदर्श नीति-कथाओं की तरह इसे एक आध्‍यात्मिक दस्तावेज के रूप में भी ग्रहण किया जा सकता है। एक बेजुबान में प्रिय को पाने की कामना का करुणामय चित्रण।

कथा आदर्श हीरो की खूबियों पर क्लासरूम विमर्श से निकलती है। प्रोफेसर का पोता वहां खुद के नायक के बारे में बता रहा है… उसका आदर्श एक वफादार पशु है। स्वर्गीय दादा (प्रोफेसर) का वफादार हाची उसका हीरो था। दोस्ती व वफा की बेमिसाल बातें उसने उसी फरिश्ते से सीखी थी। त्याग व समर्पण की यह कथा सिर्फ पार्कर परिवार तक सीमित नहीं रहती। एक खूबसुरत बात का दुनिया तक पहुंचना लाजिमी था। कहानी अकिता प्रजाति के बाल श्‍वान के जापानी मठ में पाये जाने से विस्तार लेती है। मठ वाले उसका नामकरण कर अमेरिका के किसी पते पर रवाना कर देते हैं। लेकिन बीच रास्ते में हाची से लगा एड्रेस टैग निकल जाता है। जिस खटोले में उसे ले जाया जा रहा था, उससे सामान की एक बेड्रिज स्टेशन के प्लेटफार्म पर गिर जाता है। उसके साथ ही नन्हा हाची उससे बाहर निकल स्टेशन पर आ जाता है। आजाद होकर नयी जगह पर इधर-उधर तफरीह करने लगता है। इसी सिलसिले में प्रोफेसर पार्कर विलसन (रिचर्ड गेर) से जा टकराता है। प्रोफेसर उसे स्टेशन मास्टर के पास ले जाता है। लेकिन स्टेशन मास्टर कोई तवज्‍जो नहीं देता। नतीजतन प्रोफेसर, जिन्हें कुत्तों से काफी प्यार था, हाची को अपने साथ घर ले आता है।

प्रोफेसर पार्कर की पत्नी केट पालतू जानवरों में कुत्तों को लेकर उदासीन प्रवृत्ति की थी। घर की मालकिन का नजरिया पार्कर को मालूम था। पार्कर के यह आश्वासन देने के बाद कि वो इस श्‍वान को रखने के लिए नहीं लाये हाची को घर में जगह मिल जाती है।

सुबह होते ही पार्कर हाची के मालिक की खोज में फिर से रोड आइलेंड स्टेशन आता है। उन्हें यह जानकर थोड़ा अचरज होता है कि अब तक किसी व्यक्ति ने उस नन्हें हाची पर अपना हक नहीं दर्ज किया था। शहर के किसी भी बसेरे में पशुओं की बड़ी भीड़ की खबर से प्रोफेसर की खोज थोड़ा और डूब जाती है। ऐसे हालात में वो मिले हुए पशु के ऊपर एक विज्ञापन स्टेशन पर लगा कर उसे फिर से घर ले आता है। हालांकि हाची के प्रति पार्कर की बढ़ती जिम्मेदारी को देख कर नहीं लगता कि वो उसे लौटाने को मन से तैयार हैं। इंसान व पशु के बीच एक प्यारा सा बंधन सांसें ले रहा है। इन खुशमिजाज पलों का दृश्यों में भी लुत्फ उठाया जा सकता है। मालकिन केट भी इन पलों की भावनात्मक महानता को कबूल कर हाची को अपनाने के लिए विवश हो जाती है। नया मेहमान वक्त के साथ पुराना होता है। प्रोफेसर के लिए वफादार साथी बनने की तमन्ना हाची के मन में भी है। वह प्रोफेसर के पीछे स्टेशन जाने की आदत बना लेता है। पार्कर जब भी काम पर जाते, हाची भी साथ जाता है। मालिक की वापसी तक वो वहीं पर इंतजार करता है।

एक रोज पार्कर काम पर जाते हैं, तो वापस लौट कर नहीं आते। दिल के दौरे से म्युजिक के प्रोफेसर पार्कर की क्लासरूम में ही मौत हो जाती है। हाची का जान से भी प्यारा साथी अब दुनिया छोड़ चुका है। दूसरे जहान से प्रोफेसर की वापसी अब मुमकिन नहीं है। घर वालों को पता है कि मृत्यु ने घर के मुखिया को छीन लिया। वफा के सिपाही को बहलाने की बहुत कोशिशें होती हैं, लेकिन वो मासूम भाग-भाग कर रेलवे स्टेशन चला जाता है। क्या मुहब्बत के मारे पशु को भी यकीन था? क्या उसने मालिक की जुदाई कुबूल कर ली? वो इंतज़ार करता है… बरसों तक।

परदे की यह पेशकश हकीकत में पेश आयी एक कहानी से प्रेरित है। घटना टोक्यो विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर व उनके अजीज वफादार हाची से जुड़ी है। प्रोफेसर उयुनो व हाची के बीच एक अनूठा बंधन था। वफादार जानवर ने मालिक के साथ रेलवे स्टेशन चले जाने की आदत बना ली थी। हमेशा ही प्रोफेसर के पीछे लग जाता था। वो वहीं देर तक इंतजार करता ताकि वापसी में मालिक के दीदार के साथ घर लौट सके। शिबुया स्टेशन के वेंडर इस प्यारे रिश्ते के गवाह भी थे और मुरीद भी। दिल का दौरा पड़ने से प्रोफेसर की एक दिन अचानक मौत हो गयी। मासूम पशु रोज की तरह उस दिन भी इंतजार कर रहा था, लेकिन प्रोफेसर वापस नहीं आया। वो वहीं इंतजार करने लगा, जहां अपने मालिक को उसने आखिरी बार देखा था। आखिरी सांस तक इंतजार करता रहा।

शिबुया स्टेशन में इंतजार की जगह स्थापित हचिको की कांस्य प्रतिमा कहानी को बयान करती है। प्यार-दोस्ती-वफा की यह मिसाल बहुत कम देखने को मिलती है। कथा के विकास के क्रम में दर्शकों का पशु के गुणों से एकात्म हो जाता है। उसका दुख हमारा दुख बन जाता है। विरह की पीड़ा का अनुभव काफी मार्मिक हुआ करता है। इंसान की खातिर इस मासूम पशु का प्रेम देख रूमी ने भी कहा है कि पशु प्यार के फरिश्ते हैं। हाची को सलाम! प्यार व वफा को सलाम!! खुदा की नायाब दुनिया को सलाम!!!

Saiyad S Tauheed(सैयद एस तौहीद। जामिया मिल्लिया से स्नातक। सिनेमा केंद्रित पब्लिक फोरम की लोकप्रिय साईट से लेखन की शुरुआत। आजकल सिनेमा व संस्कृति विशेषकर हिंदी फिल्मों पर लेखन। उनसे passion4pearl@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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