हंसी गरीब नहीं होती… [फोटो कैसे देखें?]

कबाड़खाना वाले अशोक पांडे अपनी तरह के अनोखे भारतीय सृजनधर्मी हैं। उनके जीने और उनके कहने का अंदाज उन्‍मुक्‍त और प्रतिबद्ध अभिव्‍यक्ति की प्रतिध्‍वनि है। पिछले दिनों उन्‍होंने फेसबुक पर लोगों को सिखाया-बताया कि किसी भी तस्‍वीर को कैसे देखें। यह ठीक उसी तरह का ट्यूटोरियल है कि किसी फिल्‍म को कैसे देखें या किसी निबंध या कविता को कैसे पढ़ें। यह अपने आप में एक नया आइडिया है और इसमें एक मजेदार और रचनात्‍मक खेल जैसा आनंद आएगा, जब आप किसी तस्‍वीर की विवरणिका (डीटेलिंग) तैयार करेंगे। उनकी कुछ फोटो-टिप्‍पणियां यहां हम चिपका रहे हैं। आखिरी फोटो-टिप्‍पणी विलुप्‍त गीत संग्राहक और टीवी पत्रकार सैयद मो इरफ़ान की है, जो अशोक पांडे की देखा-देखी उन्‍होंने अपनी फेसबुक वॉल पर आगे बढ़ायी। आप देखें और आनंद लें: मॉडरेटर

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समें आठ लोग दिखाये गये हैं। बायें से दायें – चैक की कमीज पहने हुए एक आदमी की पीठ जरा सी दिखायी गयी है। दूसरा आदमी तीसरे से कुछ कह रहा है। चौथा आंखें मूंदे ठेले पर लेटा हुआ पता नहीं कुछ भी सुन रहा है या नहीं। पान खाने की आदत से ग्रस्त पांचवां आदमी कैमरा देख कर अदा झाड़ता दिखाया गया है। सफेद कुरते वाले छठे आदमी की भी पीठ और मुंडी दिखायी गयी है। सातवां आदमी पूरा नहीं दिखाया गया है, क्योंकि वह कंपोजीशन से बाहर चला गया है। आठवां भी कंपोजीशन से बाहर जाते-जाते अपनी सूरत की मोटी सी झलक दिखाता दिखाया गया है।

दूसरे से पांचवें नंबर के लोग एक साइकिल ठेले के शारीरिक संपर्क में हैं जबकि दूसरे आदमी के सिर के ठीक पीछे एक स्कूटीनुमा वाहन का शीशा दिखाया गया है। चौथा आदमी संभवतः ठेलास्वामी है। टंगा हुआ एक मरियल टायर, पानी रखने का प्लास्टिक का बर्तन और हवा भरने की ट्यूब का हिस्सा भी दिखाया गया है। फोटो की सैटिंग कस्बाई लगती है। बिल्डिंग का वास्तुशिल्प उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में प्रचलित मिक्स्ड मुगलबिहारी वास्तुशिल्प का प्रतिनिधित्व करता है।

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समें एक दाढ़ीवाला बूढ़ा सुस्ताते हुए दिखाया गया है। बंद आंखों के किनारों पर तनावभरी रेखाएं बता रही हैं कि वह सो नहीं रहा है। बूढ़े के कपड़े बाबाओं जैसे हैं, पर वह बाबा नहीं है। उसके माथे इत्यादि पर बाबा होने के कोई निशान नहीं हैं। उसने सुतली से बंधी गठरीनुमा झोले का सिरहाना बना रखा है और खाने का उसका हैंडलदार डिब्बा झोले से सटाकर रखा दिखाया गया है। सीमेंट का फर्श है और बूढ़े के पांव नंगे हैं। शायद उसके पास जूता नहीं है क्योंकि अगर वह होता तो शायद उन्हें पहने होता। ऊंघते-सुस्ताते वक्त जूते अमूमन नहीं उतारे जाते। बूढ़े के पैरों के बायीं तरफ एक और मनुष्य का हाथ दिखाई दे रहा है। हाथ की अवस्था देखकर बताया जा सकता है कि इस का स्वामी एक बगल कर के लेटा-सोया है। इसका अर्थ यह हुआ कि फोटो की सैटिंग ऐसे स्थान में बनायी गयी है, जहां गरीब लोग सुस्ताने आते हैं। इन दोनों गरीबों के बैकग्राउंड में एक आभामय लड़का-आदमी कंपोजीशन को संपूर्ण बनाने का काम कर रहा है।

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समें दो लोग, दो रजाइयां और एक नीली भीत दिखाये गये हैं। एक आदमी ने रजाई उल्टी ओढ़ी है, एक ने सीधी। एक की परछाई दिख रही है दीवार पर, एक की नहीं। जक्स्टापोज करके देखें तो पाएंगे कि दोनों ही गरीब हैं। फिर पीछे जिसे फोटोग्राफी में बैकग्राउंड कहा जाता है, उस में करीब आधा दर्जन रजाइयां दिखायी गयी हैं, जिनके अंदर सोते प्रतीत होते लोग भी गरीब ही होने चाहिए। यहां भी कस्बाई सैटिंग दिखायी गयी है।

photo 6

समें ढेर सारा कूड़ा और एक आदमी दिखाया गया है। कूड़े को हाईलाईट करती हुई लाल रंग की प्लास्टिक की एक महंगी पन्नी फोटो के सेंटर से थोड़ा सा दायीं तरफ और थोड़ा सा नीचे दिखायी गयी है। कूड़े की फोटो ऐसे एंगल से खींची गयी है कि आदमी भी उसी कूड़े जैसा दिखाई दे रहा है। आदमी के एक हाथ में लाठी और दूसरे में छाता है। उसके दायें कंधे पर चारखाने वाला सूती तौलिया दिखाया गया है। तौलिये का हवा के साथ गतिमान होना और आदमी के हाथ में दिखाया गया छाता बताते हैं कि बरसात होने वाली है। यह फोटो भारत में खींची गयी है। यह एक सामाजिक फोटो है।

photo 7

इसमें एक बच्चा एक बेपनाह रईस हंसी हंसता दिखाया गया है। हंसी गरीब नहीं होती।

तस्‍वीर सौजन्‍य: ज्‍योति पांडे

तस्‍वीर सौजन्‍य: ज्‍योति पांडे

सैयद मो इरफ़ान ♦ इस चित्र में दिखाया गया है कि घर में कैसे बैठें। चित्र पुराना है और फटा-फुटा है। आजकल ऐसे चित्रों की कोई पूछ नहीं होती। आजकल ऐसे घरों को और उनमें इस प्रकार बैठने को भी अभद्र माना जाता है। खैर… पृष्‍ठभूमि में दीवार पर दो रंग पुते हैं। सफेद रंग के अलावा गाढ़ा पेंट इसलिए पुता है कि बैठनेवाले की पीठ पर चूना न लग जाए और उसके सिर और पीठ से रगड़ खाकर भी दीवार वैसी की वैसी ही बनी रहे। दिखाया गया है कि दायीं ओर बैठा व्यक्ति पुरुष है तथा बायीं ओर महिला। स्त्री के पैर से छूता हुआ एक बच्चे का पैर भी दिखाया गया है। पुरुष की देहयष्टि बताती है कि वह शारीरिक श्रम के बजाय कोई ऐसा काम करता है, जिससे उसके जीवन में सुख है। दोनों घुटनों के नीचे लगे गाव-तकिये इस प्रकार दिखाये गये हैं, मानो वे बरसों से इसी प्रकार दबे रहने के अभ्यस्त हैं और कतिपय उपकृत भी। पुरुष किसी ऐसी बात का जिक्र कर रहा है, जिसे सुनने में स्त्री अपना पूरा मन लगाये हुए है। सामने रखे पीकदान से पता चलता है कि व्यक्ति पान खाने का शौकीन है। पास ही रखा तंबाखू का डिब्बा और छोटी पोटली भी बता रहे हैं कि व्यक्ति पान खाता है। स्त्री का बायें कान पर हाथ रखना गायिकाओं जैसा है। इस तरह चित्र दिखा रहा है कि स्त्री गाने की अभ्यासजनित मुद्रा से जकड़ी हुई है। स्त्री की आंखों में पुरुष के प्रति कृतज्ञ भाव है और दिखाया गया है कि वह भी पान की गिलोरी दायें गाल में दबाये हुए है। पुरुष भी शायद कोई नामचीन व्यक्ति है परंतु वह इस अनौपचारिक मुद्रा में इसलिए नहीं बैठा है कि विनम्र और कैजुअल दिखकर अपनी मार्केटिंग करना चाहता है बल्कि इस प्रकार बैठे हुए वह एक युग गुजार सकता है, ऐसा दिखाया गया है।

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