देश की जमीन अब अमीरों की, रईसों की

म आदमी पार्टी ने चार जनवरी को अपने दिल्ली डायलोग के जरिये भूमि-अधिग्रहण अध्यादेश का विरोध किया था। सरकार के असंवेदनशील अध्यादेश पर आम आदमी पार्टी ने कड़ी आपत्ति जतायी और आज देश के कोने-कोने से कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किया। हर जिला मुख्यालय पर पार्टी सदस्यों ने प्रधानमंत्री के नाम प्रतिवेदन दिया। कार्यकर्ताओं ने ये मांग की है कि केंद्र सरकार किसान विरोधी अपने इस अध्यादेश को वापस ले और भूमि अधिग्रहण कानून को न्यायसंगत बनाये। विरोध प्रदर्शन का ये सिलसिला आगे भी जारी रहेगा और कई राज्यों में इस अध्यादेश के खिलाफ पार्टी कार्यकर्ता सड़क पर आएंगे।

मोदी सरकार ने कानून में संशोधन करके पांच श्रेणियों की परियोजनाओं को कई तरह की छूट दे दी है। ये पांच श्रेणियां हैं: रक्षा, औद्योगिक कॉरिडोर, ग्रामीण क्षेत्रों में ढांचागत निर्माण, सस्ते मकान एवं निम्न ग़रीब वर्ग के लिए आवास योजना और पीपीपी मॉडल के तहत बनने वाली सामाजिक ढांचागत परियोजनाएं जहां की भूमि सरकार की ओर से दी जानी हो।

किसी भी परियोजना को अब इन पांच में से किसी न किसी श्रेणी में डालकर अधिग्रहण को कानूनन जायज ठहराया जा सकेगा।

अब सरकार बिना जमीन मालिकों के सहमति के भी अधिग्रहण कर सकती है। अब सरकार के लिए ये जरूरी नहीं होगा कि वो जमीन का कब्जा लेने से पहले वहां के समाज पर पड़ रहे इसके प्रभाव का आकलन करे। पांच साल तक मुआवजा न मिलने या सरकार द्वारा जमीन पर कब्जा न लेने की सूरत में जमीन पर वापस अपना दावा करने का अधिकार था। सरकार ने अध्यादेश के जरिये लोगों का ये अधिकार भी छीन लिया है।

अब निजी कंपनी के अलावा प्रोप्राइटरशिप, पार्टनरशिप या किसी एनजीओ के लिए भी सरकार जमीन ले सकती है। “रक्षा” शब्द की परिभाषा बदलकर “राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए कोई भी परियोजना” और “रक्षा उत्पाद” को शामिल कर लिया गया है। इनमें से कोई भी “ढांचागत निर्माण परियोजना” या “निजी परियोजना” हो सकती है। अब अगर कोई भूमि अधिग्रहण अधिकारी कुछ गलती भी करता है, तो हम बिना सरकार के इजाजत के उसे अदालत में नहीं ले जा सकते।

2013 का अधिनियम पारित होने से पहले बीजेपी समेत सभी दलों ने इस पर व्यापक चर्चा करके अपनी राय दी थी। यहां तक कि जिस संसदीय समिति ने इसे पारित किया, उसकी अध्यक्षा सुमित्रा महाजन थीं, जो आजकल लोकसभा की अध्यक्षा हैं। राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज जैसे कई भाजपा नेताओं ने तब किसान-हित की बड़ी बड़ी बातें की थी। बिल पर वोट करने वाले 235 सांसदों में से 216 ने इसका समर्थन किया था। आम आदमी पार्टी जानना चाहती है कि क्यूं ऐसे व्यापक समर्थन के बाद बने कानून को सरकार ने एक झटके में अध्यादेश के जरिये खारिज कर दिया? ऐसा करना अनैतिक ही नहीं, लोकतांत्रिक प्रक्रियायों के प्रति वर्तमान सरकार की कमजोर प्रतिबद्धता का भी परिचायक है।

आम आदमी पार्टी सरकार के अध्यादेश लाने के निर्णय को ही असंवैधानिक मानती है। संविधान में अध्यादेश लाने का प्रावधान दो सत्रों के बीच किसी आपात स्थिति के लिए किया गया है। आज ऐसी कौन सी आपातकालीन परिस्थिति है? किसानो, आदिवासियों और आम लोगों की कीमत पर किन चुनिंदा पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए मोदी सरकार को ऐसा कदम उठाना पड़ा? अध्यादेश पर हस्ताक्षर करने से पहले राष्ट्रपति प्रणव मुख़र्जी ने भी यह जानना चाहा है कि आखिर मोदी सरकार को ऐसी कौन सी जल्दबाजी है?

पिछला भूमि अधिग्रहण कानून एक जनवरी 2014 को लागू तो हो गया, लेकिन कई राज्यों की विधानसभाओं में नियम नहीं बन पाने के कारण पूरी तरह से क्रियान्वित नहीं हो पाया था। आम आदमी पार्टी जानना चाहती है कि कैसे, एक वर्ष से भी कम समय में, इस कानून को जांचे बगैर, सरकार ने अधिनियम की व्यवहारिकता का आकलन भी लगा लिया और संशोधन की आवश्यकता समझ ली?

सच्चाई तो यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तय कर लिया है कि वो कुछ गिने-चुने पूंजीपतियों और व्यापारी घरानों को फायदे पहुंचाएंगे और देश के किसानों, आदिवासियों और ग्रामीणों को उनकी इस चाल का पता नहीं चलेगा। 2013 में पारित कानून के हर सकारात्मक बिंदु (जो कि भाजपा के भी सक्रिय समर्थन से बने था) को इस जनविरोधी अध्यादेश ने खत्म कर दिया है। हम वापस अंग्रेजों के सन 1894 वाले कानून पर आ गये हैं। क्या देश के किसानों के लिए यही है प्रधानमंत्री जी का तोहफा?

आम आदमी पार्टी इस अति-गंभीर मुद्दे को पूरे जोर-शोर से उठाएगी और सरकार के ऐसे जनविरोधी कृत्यों को कभी सफल नहीं होने देगी। पार्टी केंद्र सरकार को ये याद दिलाना चाहती है कि भूमि-अधिग्रह कानून का मकसद लोगों को न्याय दिलाना होना चाहिए न कि उनको दबाना। आम आदमी पार्टी एक बार फिर मांग करती है कि प्रधानमंत्री इस किसान विरोधी अध्यादेश को वापस ले।

[Press Release]

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