#FB पर खुदाई में पुराना जंबूद्वीप मिला

इस गोले के लोग अपनी तरह से साम्राज्‍यों की बाल की खाल निकालते हैं। आमतौर पर सामाजिक रूप से इस विधा को तंज कहते हैं, साहित्‍य में व्‍यंग्‍य कहा जाता है। हिंदी साहित्‍य की बात करें, तो हरिशंकर परसाई और शरद जोशी जैसी प्रतिभाओं का उत्‍पाद नगण्‍य हो गया है। लेकिन सोशल मीडिया इस अकाल में सारस जैसी उम्‍मीद बीच-बीच में थमाता रहता है। मोहल्‍ला लाइव को जानकारी मिली कि फेसबुक पर खुदाई चल रही है, जिसमें पुराना जंबूद्वीप मिला है। साथ ही कई किस्‍से-कहानियां-ऐतिहासिक पांडुलिपियां भी। हम यहां पत्रकारीय धर्म का निर्वाह करते हुए कुछ टुकड़ी पेश कर रहे हैं: मॉडरेटर

➧ गालिब की कहानी

स्तिनापुर में एक मुहल्ला हुआ करता था ‘काली जी का थान’। यहां असत् प्रफुल्लाभिमान नामक एक प्रतापी ऋषि रहा करते थे। भारत में जब म्लेच्छों ने कब्जा किया, जो हस्तिनापुर का नाम बदल कर दिल्ली कर दिया। इसके बाद तो जो खेला हुआ कुछ पूछो मत। म्लेच्छों ने ‘काली जी का थान’ नामक मुहल्ले का नाम रख दिया ‘गली क़ासिमजान’। संत असत् प्रफुल्लाभिमान जनता में अति लोकप्रिय हुआ करता था। उसकी इस शोहरत पर म्लेच्छों को ईर्ष्‍या हुई। उन्होंने इस महान संत का अपहरण कर लिया और उनका नाम बदल कर संत ‘असत् प्रफुल्लाभिमान’ से ‘असद उल्ला खान’ रख दिया। यह प्रतापी ऋषि बच्चों में बहुत लोकप्रिय था। बच्चे उधर से गुजरते हुए संत को चिढ़ाते हुए कहते — मर जा गली वाला बाबा। बच्चों में इसी नाम से उनकी यह लोकप्रियता बढ़ती चली गयी। इसे देखते हुए म्लेच्छों ने इसे भी भुनाया और चिढ़ाये जाने वाले जुमले ‘मर जा गली वाला बाबा’ को ‘मिर्जा गालिब’ करके उनका लेखकीय उपनाम रख दिया। इस विराट हिंदू ने तमाम दोहे रचे, जिसे म्लेच्छों ने अपना लिया और उसे शायरी कहने लगे। मिर्जा गालिब नाम से इस संत की आज भी दुनिया भर में शोहरत है।

➧ मीडिया की कहानी

हते हैं जब समस्त यूरोप, प्राचीन जंबूद्वीप हिंदूराष्ट्र से अलग हो गया था (प्राकृतिक कारणों से क्योंकि जबरदस्ती भागने की औकात नहीं थी उनकी), तो उसकी सभ्यता और संस्कृति जीरो बटा सन्नाटा थी। वो लोग नंगे घूमते थे और इधर भारत में मीडिया का आविष्कार हो गया था।

अंग्रेज मीडिया का ‘म’ नहीं खोज पाये थे और यहां ‘न’ खोज लिया गया था। जी हां नारद, देवर्षि नारद। वह इस अनंत ब्रम्हांड और अकल्प्य भूमंडल के पहले ऑल इन वन मीडिया पर्सन हैं। देवताओं ने उन्हें हाई क्वालिटी कैमरे के लिए दिव्य दृष्टि, ओबी वैन से चार कदम आगे और सौ गुना तेज अंतर्ध्यान होकर घटनास्थल पर पहुंचने की शक्ति दी हुई थी। कहते हैं स्वर्ग में नारद आज भी अवैतनिक मीडिया के रूप में कार्यरत हैं।

उसके बाद एक विराट हिंदू ऋषि अगस्त्य फिरकी ने इसे औपचारिक रूप से मानवों के लिए भी उपलब्ध कराया, क्योंकि देवताओं ने नारद को अपने लिए रिजर्व कर लिया था।

जब अंग्रेजों ने आंखें खोलीं, तो सबसे पहले हमारे आविष्कारों को अपना बता कर दुष्प्रचार करना शुरू किया और अगस्त्य का नाम बदल कर आगस्टस हिक्की कर दिया। आगे की कहानी तो सब जानते हैं, कितनी बार बताएं।

➧ पाइथागोरस की कहानी

प्राचीन काल में जंबूद्वीप पर एक पृथा नाम के ऋषि थे। उन्हें गणित, बीज गणित और ज्यामिति में महारथ हासिल थी। उन्होंने एक प्रमेय सिद्ध किया था, जो जंबूद्वीप में बहुत कम लोगो को ही पता था। सिकंदर ने जब पुरु से सिंधु नदी के तट पर युद्ध किया और उसे पराजित किया था, तो पुरु ने पृथा ऋषि की सारी पांडुलिपियां सिकंदर को दे दी। बाद में उसमें से उस प्रमेय पर काम हुआ, जिसे यूनानी लोगों ने विश्व भर में पाइथागोरस थेओरेम के नाम से अपना बता के दुनिया भर में वाहवाही लूटी। पर अब यह नही चलने देंगे। आधुनिक ऋषि हर्षवर्धन जी ने विश्व के सामने पाइथागोरस थेओरेम पर अपने उत्तराधिकार का दावा ठोंक दिया है।

➧ टेलीविजन की कहानी

टेलेविजन माने दूरदर्शन, और प्राचीन जंबूद्वीप में दूरदर्शन की शक्ति महाभारत काल में संजय के पास थी। एक सेटेलाइट भी था, जो कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल के ऊपर फिक्स था और ऑडियो विडिओ सिग्नल्स संजय को भेजता था। संजय धृतराष्ट्र को रवि शास्त्री, गावस्कर, हर्षा भोगले और सिद्धू की तरह डायरेक्ट कमेंटरी सुनाते थे। महाभारत कालीन यह टेक्नोलॉजी मूल रूप से वेदव्यासजी द्वारा रचित महाभारत में वर्णित थी, पर बाद के अनुकृति बनाने वालों ने (कॉपी करनेवालों ने) उसमें से यह प्रोद्योगिकी वाला हिस्‍सा मूल कथानक में गैरजरूरी समझ कर डिलीट कर दिया। फिर जब उन्नीसवीं सदी में इसाई मिशनरी लोग यहां आये, तो उन्होंने न जाने कहां से एक मूल वेदव्यास रचित महाभारत की प्रति प्राप्त कर ली। वे उसे यूरोप ले गये, जिसके बरसों तक अध्ययन और डिकोडिंग करने के बाद उसमें से टेलीविजन बनाने की तकनीक हासिल की गयी और साथ ही सेटेलाइट ट्रांसमिशन की तकनीक भी आगे चल कर विकसित हुई। इससे निर्विवाद रूप से सिद्ध होता है कि टेलीविजन के अविष्कारक मूल रूप से हम लोग ही हैं, क्योंकि अब से करीब पांच हजार साल पहले की किसी किताब में किसी ऐसी प्रोद्योगिकी का वर्णन नहीं मिलता है। सिवाय हमारे महाभारत के।

➧ मिनरल वाटर की कहानी

प्राचीन काल में जंबूद्वीप वासी हमेशा हाथ में एक कमंडल ले कर चलते थे। इस कमंडल में वो पीने योग्य शुद्ध जल रखते थे, जो कभी कभी किसी को पनिसमेंट देते समय श्राप देने के काम आता था। उसी शुद्ध जल को आज मिनरल वाटर के नाम से जाना जाता है। यह तथ्य सिद्ध करने के लिए काफी है कि मिनरल वाटर भी जंबूद्वीप की खोज है।

➧ बिजली की कहानी

जी हां, हमारे इतिहास के साथ छेड़छाड़ सिर्फ अंग्रेजों ने नहीं की, सिर्फ कांग्रेस की देशद्रोही सरकार ने ही बेवकूफ नहीं बनाया बल्कि हमारे धार्मिक ग्रंथ छापने वालों ने भी घना लोचा किया है। हमारी मासूमियत और शांतिप्रियता का नाजायज फायदा उठाया है। इन कॉपी पेस्ट वेदों, पुराणों, उपनिषदों में कहीं इस बात का जिक्र नहीं है कि समुद्र मंथन में 14 नहीं बल्कि 15 रत्नों की प्राप्ति हुई थी। और वह पंद्रहवां रत्न था ‘बिजली’।

आपने धार्मिक सीरियलों में देखा होगा कि जब कोई ऋषि-मुनि क्रोधित होकर श्राप देते हैं, तो बिजली कड़कती है। शक्तिमान जब गोल घूम कर गंगाधर से शक्तिमान बनता था, तब भी बिजली कड़कती थी। तो यह कोई साधारण आकाशीय बिजली नहीं होती बल्कि वही शुद्ध वैज्ञानिक तकनीक से विकसित की गयी बिजली है, जिसे ऋषि मुनि स्विच से एक्टिवेट करने की बजाय मंत्रों और मस्तिष्क की तरंगों से कंट्रोल करते थे।

इतने वृहत् कार्य में उपयोग होने वाली बिजली को अंग्रेज रेडियो बजाने, पानी गरम करने, मोबाइल चार्ज करने और बल्‍व जलाने में करने लगे और दुनिया भर में इसका प्रचार हो गया। इससे साबित होता है कि इलेक्ट्रिसिटी भी जंबूद्वीप की खोज है।

ऐसी और भी कहानियां सुनने, पढ़ने, देखने के लिए जंबूद्वीप की नियमित सैर पर जाएं…

JambuDweep

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