आज फैज की लाइनों के मायने बदल गये हैं

♦ सैयद एस तौहीद

जिंदगी की कीमत बदलते वक्त के साथ जैसे हाशिये पर चली गयी है। फिर चाहे वो आस-पास या पड़ोस में हुई कोई जानी या अनजानी मौत हो या जापान के हिरोशिमा या सीरिया या पेशावर में मारे गये दूसरे बेगुनाह लोग। फिरकापरस्त फिजाओं में बेकसूर जिंदगियों की मिटते हम देख रहे हैं। आम आदमी जैसे हर पल मौत का इंतजार कर रहा हो! सरकारी महकमा छोटी सी छोटी सरकारी संपत्ति को लेकर सजग रहा करता है, लेकिन क्या वो भीड़ में कोई एक चेहरा अथवा आम आदमी की जीवन सुरक्षा को लेकर भी संवेदनशील होता है? सामानांतर सिनेमा ने आम आदमी और हाशिये के सवालों को कई बार उठाया है। ऐसी सिनेमाई विरासत में सईद अख्‍तर मिर्जा की अपनी जगह है।

सईद मिर्जा फिल्‍म की नसीम में बाबरी विध्‍वंस से पहले एवं उसके बाद उपजे देश के सामाजिक राजनीतिक हालात का मार्मिक ब्योरा है। सांप्रदायिक तनावों से जूझता एक जरूरी संदेश। तनावपूर्ण माहौल में मुस्लिम परिवार की मुश्किलें इस फिल्‍म का विषय है। कहानी तीन पीढ़ियों के वैचारिक मतभेद को दिखाती है। एक पीढ़ी दादाजान की है, जो किसी किस्म के धार्मिक उथल-पुथल को तात्कालिक मुश्किल मानने वाले भारतीय हैं। दूसरी पीढ़ी में उनका बेटा-बहू हैं। बेटा समझता है कि मुसलमान होने के कारण उन्हे दफ्तर में बिना वजह परेशान किया जा रहा है। उनकी सोच अतिवादी नहीं, लेकिन हालात की उपज जरूर है। मुश्ताक व जफर तीसरी पीढ़ी के किरदार हैं।

कहानी पंद्रह बरस की किशोरी नसीम और उसके दादा की भी है। बुजुर्ग दादा की भूमिका में शायर कैफी आजमी ने प्रशंसनीय अभिनय किया है। यह किरदार कैफी साहब का एक यादगार स्क्रीन अवतार है।

कहानी में परिवार की पुरानी यादें हैं। दादाजी मरहूम बीवी को याद करते हुए अक्‍सर आगरा की पुरानी यादों में चले जाते हैं। मुस्लिम परिवारों में एक से अधिक निकाह करने का चलन है, किंतु इस परिवार में यह रस्‍म नहीं। जवानी में अहलिया की मौत बाद भी नसीम के दादा ने दूसरी शादी का तसव्वुर नहीं किया। नसीम दादा से जानना चाहती है कि उन्होंने भला ऐसा क्यूं नहीं किया? दादा का जवाब देखिए… फरमाते हैं, ‘इस मामले में डर यह था कि वो नहीं बल्कि उनकी अहलिया उन्हें छोड़ कर चली जाएगी’… दादा के मासूम जवाब पर नसीम हंस पड़ती है। एक गंभीर विषय पर बनी फिल्म में हलके-फुलके लम्हे ले आना काबिले तारीफ है। लेकिन मुश्किल दिन हंसी-खुशी के पलों के दुश्मन से होते हैं। टीवी प्रसारण देखकर नसीम के पिता झल्ला कर बोल पड़े, ‘हम यहां जीना चाहते हैं, हमें बाहर क्यूं भेजना चाहते हो?’ वतन छोड़ कर कहीं और चले जाने के उन सभी मशवरों व दलीलों से नाखुश आदमी। इसी बीच त्योहार की रस्‍म अदाएगी भी मुहाने पर खड़ी है।

इदुल-फितर की घड़ी में सभी बुजुर्ग दादा को त्योहार की मुबारकबाद देने जाते हैं। वह फैज की पंक्तियों को सुना रहे हैं। बीच में कुछ लाइनें भूलने लगे, तो नसीम का साथी युवा जफर (के के मेनन) उसे तल्ख आवाज में पूरा करता है। जफर कहता है कि आज फैज की लाइनों के मायने बदल गये हैं। फिरकापरस्त माहौल में लोग खून के प्यासे हो गये हैं… एक दूसरे को काट रहे हैं। जफर मुस्लिम समाज में व्याप्त असुरक्षा से उपजी कड़वी आवाज है। उसे पीड़ि‍त समुदाय की नुमाइंदा कहा जा सकता है। पर उस तंग माहौल में हर मुसलमान जफर जैसा नहीं है। दादा उस कठिन माहौल में भी व्यवस्था को लेकर आश्वस्त हैं। अब जबकि बाहर की आबो-हवा (नफरत व फसाद) घर में भी दाखिल है (अतिवादी किरदारों की शक्ल में), नसीम के पिता अब्बा से पूछ्ते हैं कि ‘बंटवारे बाद यहां रुकने का फैसला क्यूं लिया?’ कैफी साहेब ने हल्की आवाज में जवाब दिया, ‘तुम्हें आगरा के घर में लगाया वो दरख्त याद है? उसे मैंने और तुम्हारी अम्मी ने बडी मेहनत से सींचा है।’ अब्बा की बातों को सुनकर वह गुस्से में बड़बड़ाते हुए बाहर चले जाते हैं। कुछ देर बाद नसीम दादाजान से मासूमियत में पूछती है, ‘क्या वाकई सिर्फ दरख्त ही वतन को गैर ना करने की वजह थी?’ वह इसे कुबूल करते हैं!

कुछ दिनों बाद दादा जी का इंतकाल हो जाता है। इत्तेफाक से वो बाबरी शहादत के दिन अल्लाह को प्यारे हो जाते हैं। मुश्किल भरी फिजा में अमन की उम्मीद को बड़ा नुकसान होता है। बदलते माहौल में दादा देश के सांस्कृतिक मूल्यों के नुमाइंदा थे। सरफिरा जफर उनके जनाजे को देख ठंडी आवाज में बड़बड़ाता है, ‘आपके रुखसत होने का यह माकूल दिन है’। वाकई वो एक तरह से जायज बात कह रहा था! बाबरी विधवंस एक पेराडाइम शिफ्ट नहीं था?

Naseem | 1995 | On Request | Hindi DVDRip | E-Subs | Phantom (Size: 514.63 MB)

Saiyad S Tauheed
(सैयद एस तौहीद। जामिया मिल्लिया से स्नातक। सिनेमा केंद्रित पब्लिक फोरम की लोकप्रिय साईट से लेखन की शुरुआत। आजकल सिनेमा व संस्कृति विशेषकर हिंदी फिल्मों पर लेखन। उनसे passion4pearl@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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