वे सब हमारे थे, जो अब उनके हैं! ❝☺❞

हरि अनंत हरि कथा अनंता। इससे पहले एक पोस्‍ट में हमने विश्‍वगुरु जंबूद्वीप के कुछ अवशेष दिखाये थे। फेसबुक के पुरातत्‍व-विज्ञानियों ने जानकारी दी कि जंबूद्वीप की खुदाई में जिस पुरातत्‍वविद का सबसे अहम योगदान है, उनका नाम कृष्‍ण कांत है। हमने कृष्‍ण कांत जी से संपर्क किया, तो उन्‍होंने खुदाई में मिली पांडुलिपि में से कुछ और कहानियां हमें भेजी। इन कहानियों से पता चला कि इस धरती के लगभग समस्‍त महान वैज्ञानिक भारतखंड की देन थे। उनमें से कुछ कहानियां हम यहां जारी कर रहे हैं: मॉडरेटर

➧ अल्‍फ्रेड नोबल

ल्फ्रेड नोबेल वह महान भारतीय है, जिसने दुनिया में भारत का नाम रोशन किया। उसका असली नाम अली फरीद नींबूवाला था और वह एक महान गुजराती था। दूसरी सदी में जब रमेश पोखरियाल निशंक जी परमाणु आयोग के अध्यक्ष बने, तो उनके निर्देशन में महर्षि कणाद ने परमाणु परीक्षण किया था। तब अली फरीद नींबूवाला कणाद मुनि का रिसर्च स्कॉलर था। बाद में बाबा रामदेव के पतंजलि आकाशीय वायुविकार शोध संस्थान ने गेंदा और गुलाबों से एक वायुयान बनाया, तो उसी वायुवान पर लाद कर भारत से विश्वगुरु निर्यात होने लगे। इस विमान सेवा का नाम था — पतंजलि गेंदा गुलाब एयरवेज। इसी पर बैठकर अली फरीद गुजरात से स्वीडन गया और भारतीय ज्ञान का प्रसार किया। अली फरीद ने दानवों के विनाश के लिए आग्नेयास्त्र बनाया था, जिसका नाम रखा दानवमीत। कमबखत फिरंगियों ने अली फरीद नींबूवाला का नाम अल्फ्रेड नोबेल रख दिया और दानवमीत नामक आग्नेयास्त्र का नाम डायनामाइट रख दिया। यह सिलसिला अब भी चल रहा है। पाणिनि और पतंजलि दोनों के आदिगुरु बाबा रामदेव के आविष्कार योग को फिरंगियों ने योगा बना दिया।

➧ नील आर्मस्‍ट्रांग

प्राचीन जंबूदीप में एक महाप्रांत हुआ करता था, अमर कलिका। कमबखत नामुराद फिरंगियों ने जब इस इस प्रांत पर आधिपत्य जमा लिया, तो अमर कलिका प्रांत का नाम बदलकर अमेरिका कर दिया। यहां पर कई तपस्वी और महर्षियों के आश्रम हुआ करते थे। इस तपोस्थली का इतना प्रताप था कि देवलोक के देवता यहां का वीजा पाने के लिए तरसते रहते थे। देवलोक स्थित जंबूदीप दूतावास में हर रोज सैकड़ों देवताओं की भीड़ हुआ करती थी और तमाम राजनीतिक दांवपेंच लगाये जाते थे। सभी देवता अपने-अपने गेंदा-गुलाब विमानों से यहां विहार करने आते थे। इसके चलते इन ऋिषियों का भी आकाश में आना जाना हो गया।

इस महाप्रांत के एक प्रतापी ऋषि थे नीलबाहु अमरतरंग। उनकी भुजाएं बहुत बलिष्ठ और नीले वर्ण की थीं और उनकी देह से रेडियोएक्टिव तरंगें फूटती रहती थीं। इन तरंगों के सहारे ही वे देवलोक से संपर्क किया करते थे। देवलोक से उनका संपर्क इतना बढ़ गया कि एक बार वे स्वयं देवलोक जा पहुंचे। इसी देवलोक टूर में वे चांद पर भी गये। पहली बार पृथ्वी से चांद पर जाने का यह कीर्तिमान भारत के नाम है। लेकिन जब फिरंगियों ने जंबूदीप पर कब्जा किया, तो ऋषि नीलबाहु तरंग जी को अपना आदमी कहना शुरू किया और उनका नाम रख दिया नील आर्मस्ट्रांग। उनके विमान का नाम था ‘कपाल खोलो एकादश’, जिसे फिरंगियों ने बदलकर अपोलो 11 कर दिया। यहां तक कि वह अमर कलिका प्रांत की वैज्ञानिक शोधशाला, जिसका नाम ‘नाश की आसा’ था, फिरंगियों ने बदल कर नासा कर दिया।

अभी हाल में अंतरिक्ष टूर पर गया एक भारतीय है दानपाल पतित। उसने अपने वैदिक कैमरे से तमाम सुंदर छायाचित्र भेजे। उसे भी फिरंगी अपना आदमी कह रहे हैं और उसका नाम बताते हैं, डॉन पेटिट। दुनिया भर में बिखरे पड़े इस भारतीय ज्ञान की यदि घर वापसी हो जाए, तो समझिए कि हम विश्वगुरु अब बने कि तब बने।

➧ आईजैक न्‍यूटन

शवाक नूतन यानी आईजैक न्यूटन। देखा? ये शातिर फिरंगियों ने कैसे हमारी मौलिकता का सत्यानाश कर डाला? इस महान भारतीय हिंदू वैज्ञानिक का नाम तक शुद्ध संस्कृत में था, ईशवाक नूतन, जिसे बदल कर आईजैक न्यूटन किया गया।

हमारे इस हिंदू महर्षि ने दुनिया भर में जो भी ज्ञान विज्ञान बांटा, वह सब वेदों से निकला था। बाबा बत्रा रचित ऋग्वेद के शिवसंकल्प सूक्त में यह सारी बातें लिखी हुई हैं। उसमें लिखा है कि जब नूतन ध्यान की मुद्रा में बैठा था, उसी समय एक जंबू फल उसके कपार पर गिरा और इस कारण उसे ज्ञान की प्राप्ति हुई। इस घटना के बाद तो ब्रह्मांड के तमाम रहस्यों का पता चल गया। बाद में फिरंगियों ने इस जंबू वृक्ष को सेब के पेड़ के रूप में प्रचारित किया। यह जंबू वृक्ष आदि देव बाबा रकमदेव के उसी आश्रम में था, जिसे देशद्रोही कांग्रेस की सरकार ने पिछले साल फिरंगियों के कहने पर सील कर दिया था। नूतन बाबा रकमदेव के आश्रम में स्वयंसेवक था।

➧ अल्‍बर्ट आइंस्‍टीन

लबर्ट आइंस्टीन भारतीय थे। उनका असली नाम था अलंव्रत ईश्वरदीन। आदरणीय ईश्वरदीन जी जहां पैदा हुए थे, वह भूभाग विशाल भारत का हिस्सा था। वहां जमुना नदी बहा करती थी, इसलिए उस भूभाग का नाम जमुनीपुर था। बाद में फिरंगियों ने उस प्रदेश पर कब्जा कर लिया तो जमुनीपुर का नाम बदलकर जर्मनी और अलंव्रत ईश्वरदीन जी का नाम अलबर्ट आइंस्टीन कर दिया।

ईश्वरदीन जी के भारतीय होने का सबसे बड़ा प्रमाण है कि वे महात्मा गांधी नामक विराट हिंदू से बहुत प्रभावित थे। ईश्वरदीन जी गांधी की बहुत तारीफ करते थे। हमेशा उन्हें ताम्रपत्र पर पाती लिखा करते थे और उनसे मिलने को बेताब रहते थे। आग्नेयास्त्र उर्फ परमाणु बम का विकास तो भारत में हुआ ही था। यह ज्ञान इसी धरती से ब्रम्हांड भर में फैला। यहीं से यह तकनीक एलियन्स को भी मिली और अलंव्रत ईश्वरदीन भी परमाणु बम नामक आग्नेयास्त्र के विशेषज्ञ थे।

ईश्वरदीन जी को इस्राइल से द्वितीय राष्ट्रपति बनने का आमंत्रण मिला तो उन्होंने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया था, क्योंकि उनके संस्कार जंबूद्वीप के त्याग और वैराग्य के संस्कार थे। त्याग की भावना उनमें कूट—कूटकर भरी थी। यह भारतीय संस्कार ही था कि वे एक क्षुद्र भूभाग के राष्ट्रपति नहीं बने क्योंकि वे तो ‘पूरी धरतिए हमरा परिवार है’ टाइप महसूस करते थे। ईश्वरदीन जी फिरंगियों की संगत में पड़ कर ईश्वर और धर्म के आलोचक हो गये थे, वरना तो उनका नाम ही अलंव्रत ईश्वरदीन था। जब तक वे भारतीय ऋषियों की संगत में थे, तब तक बहुतै संस्कारी थे। रोज सुबह उठकर हवन करते थे और उससे आग्नेयास्त्र बनाने की प्रेरणा लेते थे। इन सब तथ्यों से सिद्ध होता है कि अलंव्रत ईश्वरदीन उर्फ अलबर्ट आइंस्टीन विराट हिंदू वाला विशाल हृदय रखते थे।

[नोट: मेरे इस अतुलनीय ज्ञान का अभीष्ट किसी जीवित या मृत आहतातुर को आहत करना नहीं है। कृपया आहत न हों। बाकी हत हो जाने वाले को कोई रोक नहीं सकता। यह नश्वर संसार का विधान है। मुझ क्षुद्र मनुष्य की क्या बिसात।]

Krishna Kant
(कृष्‍ण कांत। इलाहाबादी। दिल्‍ली में पत्रकारिता। छात्र दिनों में आइसा से जुड़ाव। इन दिनों कवि-लेखक अशोक कुमार पांडेय के साथ आगाज पत्रिका के संपादक मंडल से जुड़े हैं। उनसे krishna.kant.771@facebook.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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