आज एक बरस और बीत गया उसके बिना

♦ सैयद एस तौहीद

धुनिक शायरी की मकबूल शख्सियत अहमद फराज अदब के नुमाया सितारे थे। शायरी को इजहार का सरमाया बनाने वाले फराज में कारगर कलामों की दिलचस्प ताकत रही। सामाजिक-सयासती-शकाफती हवालों को उन्होंने शायरी व गजल की फनकारी से हम तक पहुंचाया। आपकी गजलों में नाकाम मुहब्बत व मिलन की सदाएं कमाल के अंदाज-ए-बयान में मिलती हैं। गजल के दीवाने उन्हें खास चयन व शायरी में मु्कतलिफ सदाओं के लिए याद करते हैं।

आज एक बरस और बीत गया उसके बिना
जिसके होते हुए होता था जमाना मेरा

फराज के कलामों के बिना गजल गायिकी के सितारे थोड़े अधूरे मालूम पड़ते हैं। गजल के बहुत से फनकारों की आवाज होने का मौका उन्हें नसीब हुआ था। फराज की यह शख्सियत फैज व हबीब जालिब जैसे नुमाया शायरों के साये में जवां हुई। इस तरह यह कहना जोखिम नहीं कि फराज का तसव्वुर करना दरअसल फैज व जालिब की विरासत को पहचानना भी है। तरक्कीपसंद तहरीक में इन लोगों का यादगार दखल इतिहास से मिटाया नहीं जा सकता। अब वह फैज हों या फराज या फिर हबीब जालिब, सभी ने अपने जमाने की सियासत और सामाज पर खुलकर लिखा।

निसार तेरी गलियों पे ऐ वतन
के जहां चली है रस्‍म कि कोई न सर उठा के चले

फराज के चले जाने से तरक्कीपसंद तहरीक को भारी नुकसान उठाना पड़ा। फराज व कैफी साहेब तकरीबन एक ही वक्त दुनिया से कूच कर गये। गम पर सरहद की लकीरों का कब अख्तियार हुआ है। फराज के लिए हिंद तो कैफी के लिए पाकिस्तान रोया। कहना लाजिमी होगा कि इनके बाद शायरी की महफिल में उदासी थी। एक तरह से तरक्कीपसंद शायरी का फन हाशिये पर चला गया। नयी पीढी में जुनून जरूर था, लेकिन अब फराज व कैफी की कमी खल रही थी।

सिवाए तेरे कोई भी दिन रात न जाने मेरे
मगर तू कहां है ऐ दोस्त पुराने मेरे

फराज के न होने से उर्दू शायरी के वो कलाम खामोश पड़ गये, जिसे आने वाले मुस्तकबिल को लिखना था। कैफी व फराज दोनों में तरक्कीपसंद शायरी की एकता थी। फराज की शायरी किसी भी जमीनी सरहद के कब्जे में नहीं रही, हिंदुस्तान व पाक में वो एक जैसे मशहूर रहे। फन को किसी हद या सरहद में कैद नहीं किया जा सकता, यही वजह है कि फराज हिंदुस्तान तो कैफी पाकिस्तान में मकबूल हुए। फन का जादू सियासी सरहदों को मिटा दिया करता है। फराज के कलामों में सामाजिक इंसाफ की तरक्कीपसंद आवाज शिद्दत से निखर कर आयी थी। उनके किस्म की शायरी अपनी तहजीब की आखिरी कड़ि‍यों में थी। तरक्कीपसंद शायरी की बात करें तो यह तहरीक जोश मलीहाबादी व इकबाल से शुरू होकर अली सरदार जाफरी, साहिर लुधियानवी और मजरूह की कोशिशों से पूरी हुई। फैज व कैफी की सोच ने शायरी की इस विरासत को आगे भी जारी रखा। फिर हबीब जालिब, फहमीदा रियाज, फराज अपने कलामों के जरिये यह नेक काम करते रहे। इन फनकारों की बदौलत बीसवीं सदी के उर्दू अदब को नया मुकाम मिला। इस नुमाया तहरीक को लेखकों के संगठन से काफी हिम्मत मिली। फन की मु्कतलिफ किस्मों के जरिये सामाजिक असंगति को खत्म करने की लड़ाई जारी थी।

अब तो शायर पर भी कर्ज मिट्टी का है
अब कलम में लहू है सयाही नहीं

रूमानी शायर के रूप में फराज ने कलाम को फारसी व उर्दू की विरासत से तराशा। उनकी रूमानी शायरी में मीर की संवेदना और गालिब का फलसफा खूबसूरती से शामिल है। फराज फारसी के महान शायर बेदिल से काफी प्रभावित रहे। एक मायने में शायरी का हौसला उन्हें बेदिल व गालिब से मिला था। एक तरफ जहां फराज तरक्कीपसंद शायरी के पुरोधा रूप में मशहूर हुए, वहीं उनके रूमानी कलामों की खूबसूरती से भी इंकार नहीं किया जा सकता। फारसी व उर्दू की विरासत में डूबी फराज की रूमानी शायरी में शायरों की सोच जिंदा रही। फिर भी जब कभी लिखा उसमें हालात का होना जरूरी था। विरासत से होकर आज व आने वाले कल के बीच पेशकश का पुल बनाया। फैज के बाद के शायरों में फराज को उनकी विरासत का सच्चा तलबगार कहा जा सकता है। नजरिये को रूमानियत के साथ मिलाकर शायरी की नयी किस्म बनाने में कामयाब हुए थे। रूमानी होकर भी असलियत का एक पहलू दिखाने के लिए दिलचस्प प्रयोग किये।

जो भी बिछडे हैं कब मिले हैं फराज
फिर भी तू इंतजार कर शायद

फराज का रुखसत होना दिल को मंजूर नहीं हुआ। वो दुनिया से कूच कर गये, फिर भी कलामों के जरिये हमेशा बने रहेंगे। आम आदमी को इंसाफ का हकदार बनाने के लिए शायरी का जागरूक इस्तेमाल यहां देखने को मिला। फराज की शायरी हक की लड़ाई को समझने की तरफ बेहतरीन कोशिश होगी। उनका शुक्रगुजार हूं कि रूमानी होकर भी सियासत को समझता हूं।

मैंने देखा है बहारों में चमन को जलते
है कोई ख्वाब की ताबीर बतानेवाला

हालांकि शुरुआती सफर रूमानी उर्दू शायरी के नजदीक था, लेकिन सत्तर के दशक तक आकर उसमें तब्दीली देखने को मिली। अब वो जिंदगी की कड़वी असलियत से रूबरू तरक्कीपसंद शायर की शख्सियत जीने लगे थे। फराज की शायरी कामयाब रही, क्योंकि आपके कलामों ने जिंदगी की हकीकतों को भी नजरअंदाज नहीं किया। जब कभी शायरी का जिक्र आएगा, तो दीवाने फराज के सिलसिले में ‘हुई शाम तो आंखों में बस गया फिर तू, कहां गया है मेरे सेहर का मुसाफिर तू’ को याद करेंगे।

Saiyad S Tauheed
(सैयद एस तौहीद। जामिया मिल्लिया से स्नातक। सिनेमा केंद्रित पब्लिक फोरम की लोकप्रिय साईट से लेखन की शुरुआत। आजकल सिनेमा व संस्कृति विशेषकर हिंदी फिल्मों पर लेखन। उनसे passion4pearl@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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