एक कविता, अनेक भारत [ViA Tagore]

अरुण माहेश्‍वरी ➡ पिछले दिनों कृष्ण कल्पित की कविता की एक पंक्ति ने चौंका दिया था, मैं चाहे कबूतर की सूखी हुई बीट हूं, पर मैं कवि नहीं हूं…, आज मुकेश कुमार की पूरी कविता, हां हम सब हरामजादे हैं… ने, जिसमें वे कहते हैं, मैं एतद द्वारा घोषणा करता हूं, हम सब हरामजादे हैं। रवींद्रनाथ की जग-प्रसिद्ध कविता भारत तीर्थ की इन पंक्तियों के साथ इस कविता को पढ़ें। देखिए आज के कवि में हमारे कविगुरू कैसे बैठे हैं…

कोई नहीं जानता, किसके आह्वान पर
कितने लोगों की दुर्वार धारा कहां से आयी,
और इस सागर में खो गयी!
आर्य, अनार्य, द्रविड़, चीनी, शक, हूण, पठान, मुगल
सब यहां एक देह में लीन हो गये!

हे आर्य, हे अनार्य आओ, आओ हिंदू-मुसलमान
आज आओ तुम अंग्रेज, ख्रीष्टान आओ
मन को पवित्र कर आओ ब्राह्मण, सबके हाथ पकड़ो –
हे पतित, आओ, अपमान का सब भार उतार दो

मां के अभिषेक के लिए शीघ्र आओ
सबके स्पर्श से पवित्र किये हुए तीर्थ-जल से
मंगल-घट तो अभी भरा ही नहीं गया है –
इस भारत के महामानव के सागर-तट पर।

[No one knows at whose call
How many streams of humanity
Came from where, in irresistible currents,
And lost their identity in this (India’s) ocean (of men).
Here Aryan, hero non-Aryan,
Here Dravid and Cheen,
Hordes of Saka, Huna, Pathan and Mughal

Come O Arynan, come, non-Aryan,
Hindu-Mussalman,
Come, come today, you English,
Come, come, O Christian.
Come, Brahmana, purifying your mind, [17]
Clasp the hands of all,
Come, O ye outcasted and ‘fallen’,
May the burden of all ignominy
Be taken off your backs.
Come, hasten to the Mother’s anointing;
For the auspicious vessel has not yet been filled
With water from all shrines,
Purified by the touch of all
(castes, creeds and classes).]

♦ उदय प्रकाश

मुकेश कुमार की कविता हम सब हरामजादे हैं को शेयर करते हुए अरुण माहेश्‍वरी जी ने रवींद्रनाथ टैगोर की इस बहुत ही प्रासंगिक कविता को उद्धृत किया है। भारतीयता की जनसांख्‍यिकी को समझने के लिए टैगोर की यह कविता बहुत लंबे समय से लोकप्रिय रही है। संभवत: ‘भारत तीर्थ’ शृंखला में 1910 में गहरी राष्ट्रीय भावना के साथ लिखी गयी वह कविता है : Here the Arya, here the Anarya, here the Dravida and here the Chin, Saka, Hun, Pathan, Moghul, All merged to form one single body …’ ये पंक्तियां भारत में रहने-बसने वाले मनुष्यों की जैविक-सूत्रीय अंतरक्रिया और परस्पर सम्मिश्रण के सत्य की समझ के आधार पर लिखी गयी। महान राष्ट्रीय तमिल कवि सुब्रह्मण्यम भारती ने भी इस देश को ‘तीस करोड़ चेहरों पर एक ही हृदय’ का देश कहा था। महत्वपूर्ण यह है कि ऐसी कविता और कवि की भावुकता की पृष्ठभूमि में एक ऐसा वैज्ञानिक तथ्य था, जिसे स्वीकारने का साहस इसलिए बहुत कम सामने आता था क्योंकि इससे शताब्दियों से गढ़ी-बनायी गयी नस्ल-जाति-धर्म-संप्रदाय की अनगिनत विभाजक धारणाएं चूर-चूर हो जातीं थीं। नस्लगत या जातिगत शुद्धतावाद की नींव दरक जाती थी। बाबा साहेब अंबेडकर ने भारतीय समाज और खासतौर पर ‘हिंदू’ कहे जाने वाले समाज में अस्पृश्यता और छुआ-छूत तथा जातिगत श्रेष्ठता के सामने भौतिक नृ-वैज्ञानिक (Physical Anthropology) के आंकड़ों और तथ्यों को अपने वक्तव्यों-लेखों में कई बार प्रस्तुत किया और इसी के माध्यम से उन्होंने भारतीय समाज के जातिवादी भेद के विरुद्ध उनकी एकता के सूत्रों को उजागर करते हुए, उनकी एकता को स्थापित किया। इसलिए कह सकते हैं कि अंबेडकर जहां टैगोर और सुब्रह्मण्‍यम भारती की परंपरा को संपुष्ट करते हैं और भारतीय मनुष्यों के बीच एकता का अकाट्य तार्किक आधार प्रस्तुत करते हैं, वहीं जातिगत ऊंच-नीच, नस्ली श्रेष्ठता-हीनता की धारणाओं को अपनाने और प्रसारित-प्रचारित करने वाले स्वयं भारतीय सामंजस्य और जैविक एकता को छिन्न-भिन्न करते हुए, विघटनकारी हो जाते हैं।

“Most of the Indian populations are of the mixed type। India has truly been a melting pot or a fishing net in to which have been drawn almost all racial types and mingled through the process of admixture and a smooth and unhindered gene flow…!”

यदि आप दोस्तों ने ‘पीली छतरी वाली लड़की’ पढ़ रखी हो, तो वह इसी 13 प्रतिशत से लेकर 87 प्रतिशत तक के जैविक सम्मिश्रण का तथ्य रखते हुए जातिवाद के धुर्रे बिखेरता आख्यान है। ‘हिंदी’ इस्टेब्लिशमेंट में उसके तीखे विरोध का कारण भी यही था। ‘हरामजादा’ के स्थान पर ‘वर्णसंकर’ या ‘जारज’ रख देने से कोई सात्विक अभिजन शालीनता भले ही आ जाए और कविता कुछ अधिक तरल-मृदुल हो जाए, मानविकी के जैविक संबंधों का सत्य तो शब्द बदलने से नहीं बदलता। यह जीव-सूत्रीय इंसानी रिश्ता, जिसके कारण ही सभ्यताएं विकसित और विस्तृत होती हैं, मुकेश कुमार की यह ‘उत्तेजक’ कविता उसी का संकेत करती एक गंभीर अर्थपूर्ण कविता भी है। कम से कम यह संविधान की धारा 153 (ए) 250 और 500 का उल्लंघन तो नहीं करती, जो कि साध्वी मंत्री के बयान में संभव है।

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