फिर फिर शमशानी, भूखी पीढ़ी [अ‍कविता]

♦ अरुण माहेश्‍वरी

क्‍या हिंदी साहित्य में फिर एक बार साठोत्तरी वाली अकविता, श्मशानी और भूखी पीढ़ी की पद-ध्वनि सुनाई देने लगी है? हालात तो बिल्कुल वैसे ही हैं। साठ के जमाने के नेहरू युग में साहित्य-कला के सभी सरकारी, गैर-सरकारी उच्चासनों पर प्रगतिशीलों का पूर्णाधिकार कायम हो गया था। प्रतिवाद की भाषा नेहरू के गुलाब की खुशबू के मद में डूब चुकी थी। जबकि जनता में मोहभंग की तीव्र कसमसाहट थी।

यही वह समय था, जब बांग्ला में भी प्रगतिशीलों के माध्यम से रवींद्र चेतना का पुनरुत्थान हो रहा था। सुभाष मुखोपाध्याय के स्वर बदल गये थे। प्रगतिशीलों की ‘परिचय’ पत्रिका के लेखक रवींद्रनाथ की ‘परलोक चर्चा’ पर मुग्ध हो रहे थे। जीवनानंद दास से विष्णु दे, समर सेन, अमित मित्र आदि की बारीक अनुभूतियों की कताई की एक दूसरी धारा चल रही थी। ऐसे में जनआक्रोश की अभिव्यक्ति का एक रूप बांग्ला में गिन्सबर्ग से प्रभावित मलय रायचौधुरी, शक्ति चट्टोपाध्याय और सुनील गांगुली के जुगुप्सा की हद तक जाते भूखी पीढ़ी के साहित्य में हुई थी। उसी की ध्वनि-प्रतिध्वनि हिंदी में श्मशानी पीढ़ी-भूखी पीढ़ी के राजकमल चौधरी, दूधनाथ सिंह, शरद देवड़ा आदि में सुनाई दी थी।

आज भी हिंदी साहित्य के सभी सिंहासनों पर सरकारी संरक्षण प्राप्त अध्यापक वर्गीय प्रगतिशील साहित्यकारों का पूर्ण वर्चस्व है। जन-जीवन से कोसों दूर साहित्यकारों का यह तबका पुरस्कारों से लदा-फदा साहित्य में न जाने किन बारीकियों की कताई में रमा हुआ है, जबकि जनता हर स्तर पर बुरी तरह त्रस्त है। एक ऐसे उबलते सामाजिक परिदृश्य में आत्मरति में डूबी हिंदी कविता साहित्य में वैसा ही उबाऊ वातावरण तैयार कर रही है जैसा कि कभी साठ के जमाने में रहा होगा।

ऐसे में कल्बे कबीर (कृष्‍ण कल्पित) जैसे कवियों के हर रोज दिखाई दे रहे तीखे अनियंत्रित तंज, पीठाधीशों को उनकी खुली चुनौतियां और धर्माधिकारी शासकों की अश्लीलता के जवाब में मुकेश कुमार की कविता हां, हम सब हरामजादे हैं किस बात के संकेत हैं? क्या यह फिर एक बार साठोत्तरी कविता के करुण दुखांत की प्रहसनात्मक पुनरावृत्ति है?

Arun Maheshwari
(अरुण माहेश्‍वरी। मार्क्‍सवादी आलोचक। राजनीतिक टिप्‍पणीकार और स्‍तंभ लेखक। कई किताबें प्रकाशित, जैसे – साहित्‍य में यथार्थ : सिद्धांत और व्‍यवहार, पाब्‍लो नेरुदा : एक कैदी की खुली दुनिया, आरएसएस और उसकी विचारधारा, पश्चिम बंगाल में मौन क्रांति, नयी आर्थिक नीति कितनी नयी, एक और ब्रह्मांड, सिरहाने ग्राम्‍शी। उनसे arunmaheshwari1951@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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